जाने कहां गए वो दिन...

रजनीश प्रकाश | 0 टिप्पणियां
जिंदगी के हाइवे पर काफी कुछ पीछे छूटता जा रहा है । भागमभाग वाली जिंदगी में जबकि दुनिया के सारे तार एक दूसरे से जुड़ते दिख रहे हैं पर्व-त्योहार भी सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट वाली थ्योरी के चपेट में आते दिख रहे हैं। कितने त्योहार हैं बचपन के, जो अब अतीत का हिस्सा होते जा रहे हैं। जूड़शीतल, अनंत चतुर्दशी , तिल सकरात यानि मकर संक्रांति जैसे त्यौहार जिंदगी की आपाधापी में पीछे छूट रहे हैं। होली-दिवाली-दुर्गापूजा तो खैर बाजार की चहेती हैं लेकिन बाकी त्योहारों का दिवाला निकलता दिख रहा है।

   जमाना इंस्टेंट का है, यानि सब कुछ तुरंत का। अब किसे फुरसत है मकर संक्रांति से दसियों दिन पहले चावल, चूड़ा, तिल , मक्का, मूंगफली लाने और फिर कंसार जाकर उसे भुनवाने का। हम बच्चे मकर संक्रांति का साल भर इंतजार करते। हमारे स्कूल के बगल में ही कंसार हुआ करता, हम बच्चे किसी बर्तन, सूप या दौड़ी में चावल,चूड़ा, मक्का समेट कर कंसार पहुंच जाते और अपनी-अपनी बारी का इंतजार करते है। कंसार में एक बड़ा सा मिट्टी का चूल्हा रहता जिस पर एक ही साथ कई मिट्टी के बर्तनों में चावल-चूड़ा आदि भूने जा रहे होते। कंसार को चलाने वाली महिला कभी चूड़ा-चावल पर ध्यान देती तो कभी धीमी पड़ती आग को बढ़ाने के लिए और सूखी लकड़ी और पत्ते चूल्हे के हवाले करती। जब तक वह भूना नही जाता हम बच्चों की पूरी मौज होती। मकर-संक्राति के दो-तीन पहले से ही लाय और तिलवा बनना शुरु हो जाता। बाजार से गुड़ लाया जाता और फिर चूल्हे या गैस पर उसको गलाया जाता। नजदीक में रहने वाली बुआ या फिर रिश्तेदार की या पड़ोंस की महिलाएं भी आती। फिर पिघले गुड़ में भूने चावल-चूड़ा-मक्का को मिलाया जाता। हम बच्चों को इस मिक्सचर को मुट्ठी में भर कर लाय बनाने में खूब मजा आता। कई शामें हमारी ऐसी ही गुलजार रहती। लाय बनाने का यह क्रम तो कभी-कभी मंकर-संक्रांति के दिन तक जारी रहता।

     मकर-संक्रांति की शुरुआत सुबह-सुबह नहाने से होती। मम्मी सुबह पांच-छह बजे ही हमारी नींद की दुश्मन हो जाती। हम फिर काफी लानत-मलामत के बाद कुंए और फिर बाद के दिनों में ट्यूब-वेल के पास जल्दी-जल्दी नहाकर अपना कर्तव्य निभाते । नहाने के साथ ही हम झट से दादी वाली मिट्टी की बनी बोरसी की शरण में आ जाते ,जिसमें लकड़ी या कोयला जल रहा होता और हम आग तापने में जुट जाते। फिर हम घर के बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेते और उनके हाथों से तिल लेकर आग में तिल का दान करते, जिसे हमारे यहां तिल बहाना कहा जाता। मम्मी फिर गया का तिलकुट, खुशबू से लबालब तुलसीफूल चूड़ा और स्वादिष्ट सब्जी और भांति-भांति के लाय हमारे लिए लेकर आती। फिर तो पूरा दिन ही अपना होता। पूरी दोपहर अपने चाचाओं और करीबी रिश्तेदारों के घर हम चौकड़ी भरते,  तिल बहाने के बाद लाय और तमाम चीजें हमें खाने को मिलती। दोपहर ढ़लते ही घर पर कार्टून पैक होना शुरु हो जाता। सभी तरह के लाय, चूरा और तिलकुट कार्टून में पैक होते है। फिर हम और हमारे चचेरे भाईओं का जत्था कार्टून से लैस होकर बुआओं के घर के लिए कूच कर जाता।

    घर से दूर बुआ के घर हम बच्चों की खूब धमा-चौकड़ी होती। अब घर से दूर दिल्ली में मकर संक्राति का त्योहार यादों की परिधि में सिमटती जा रही है।  सच में... कहां गए वो दिन...।


लेखक : रजनीश प्रकाश

तारीख : Sunday, January 15, 2017

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