घूमते रहो ...

रजनीश प्रकाश | 0 टिप्पणियां
स्लिप डिस्क की गिरफ्त से कमोबेश निकलने के बाद दिल्ली से बाहर की यात्रा का यह पहला अनुभव था । हर अनुभव व्यक्तित्व को समृद्ध ही करता है। स्लिप डिस्क से दो महीनो तक लगातार जूझना भी काफी कुछ सिखा गया । शरीर भले ही बिस्तर पर पड़ा रहता हो लेकिन मन को तो नही बांधा जा सकता । मन की उड़ान पर कौन सी बंदिश लग पाती है। दरअसल हम हर क्षण हर पल किसी यात्रा पर ही होते है ।

    हम एक साथ न जाने कितनी यात्राओं को खुद में समेटे हैं- ज्ञात-अज्ञात । हमारी जिंदगी भी असंख्य समांतर और आरी-तिरछी प्रवाहित यात्राओं में से एक है या कहें तो यात्राओं का समुच्चय है, गुच्छा है । यात्रा अनगढ़ को गढ़ने की, तराशने की प्रक्रिया है । हरिद्वार के पास गंगा की कई धाराएं है, जिनमें कुछ के तल सूखे है ,भांति-भाति के आकार-प्रकार के छोटे-छोटे गोलाकार चिकने पत्थरों से पटे हुए। इन पत्थरों के चिकनेपन और आकार-प्रकार के साथ इनकी यात्रा भी चिपकी हुई है । अनगढ़, रुखे पत्थरों ने गंगा की लहरों के साथ एक लंबी यात्रा की यात्रा के बाद हरिद्वार में सुस्ताने के क्रम में गंगा में अपनी परछाई देखी होगी तो उन्हें भी अपने बदले कलेवर पर अचंभा हुआ होगा।

   यात्रा के दौरान जीवन के विभिन्न और नए-नए आयामों से हम परिचित होते हैं। नदियों की गति, पहाड़ की ऊंचाई, समंदर की गहराई , धूप की तपिश, जंगलों की नरमाई सब यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर हमसे दो-चार होते हैं और हमें नए अनुभवों से लबालब कर जाते हैं। जीवन को अनन्त यात्रा ही कहा गया है...  और मनुष्य का इतिहास यात्राओं का इतिहास ही तो है । बचपन से लेकर मृत्यु तक हम यात्रा ही तो करते हैं,  पुत्र से पति और फिर पिता में तब्दील हो जाते हैं। यात्रा की इस अनवरत प्रक्रिया में हमेशा कुछ ग्रहण करते हैं और कुछ त्यागते हैं, और यही जोड़-घटाव ही तो जीवन है।

   दिल्ली से हरिद्वार रिषिकेश के लिए निकल रहा था तो आइटीनरी में कुछ चीजें पहले से तय थी- मसलन हर की पौड़ी पर की आरती का अनुभव करना, चोटीवाले के यहां खाना खाना, राम झूला-लक्ष्मण झूला पर चहलकदमी करना। हरिद्वार पहुंचते-पहुंचते लगभग दिन का एक बज गया। प्लान बना कि चलो सीधे रिषिकेश चोटीवाले के यहां ही चला जाय। सालों पहले गया था और अनुभव ठीक-ठाक ही था। लेकिन इस बार चोटीवाले ने दिल पर चोट कर दिया । खाना औसत से भी खराब और पैसा कहीं से भी कम नही ।मन मार कर और खाने को पेट में झोंक कर बाहर निकले। बस संतोष इस बात का था कि बाहर बैठे चोटीवाले के साथ दो-तीन सेल्फी ले ली। कितना मन बनाकर गया था लेकिन मन मसोस कर बाहर निकलना पड़ा।

   चोटीवाला के यहां से  बाहर निकलकर घाट के किनारे लग गया। मां गंगा अपनी पूरी रफ्तार पर थी। धूप ठीक-ठाक थी लेकिन पानी में ठंडक थी। हम भी पैर लटकाकर इस ठंडक को बटोरने में जुट गए, जब तक कि धूप ने हमें उठने को विवश न कर दिया। कुछ देर तक लोगों को मोटरबोट के जरिए इधर से उधर जाते देखता रहा। कभी-कभी निगाह दूर राफ्टिंग करते लोगों पर चली जाती । फिर मन में पिछली बार की राफ्टिंग की सुनहरी यादें खुद-ब-खुद तैरने लगी । अभी-अभी तो स्लिप डिस्क को मैने बाय-बाय ही किया था ऐसे में राफ्टिंग के बारे में सोचना भी गुनाह से कम न था।

    घाट से उठकर हम राम झूला की तरफ चल गए। लोहे की रस्सियों से तना यह पुल रह-रह कर हिलने लगता , लेकिन डरने जैसी कोई बात नही। दूर लोगों का एक झुंड किस विदेशी जोड़े को पकड़ कर उसके साथ फोटो खिंचवाने में जुटा थ। प्लीज फोटो... वन फोटो। चेहरे की चमक इतनी मानो फोटो खिंचवाने की बजाय कोई मेडल मिलने वाला हो। पता नही हम भारतीयों की यह आदत कब सुधरेगी । रिषिकेश में अभी भी वो सीमेंट की बेंचें दिखी जिसपर लिखा होता है कि कि फलां ने फलां की स्मृति में इसका निर्माण किया। पिछली बार भी इसे नोटिस किया था। अब के समय मे इस तरह का दान-पुण्य होता है क्या ?  
    
   रिषिकेश के बाद सीधे होटल और फिर फ्रेश होकर सीधे गंगा किनारे। रास्ते में बारिश होने लगी और माहौल थोड़ा खुशगवार हो गया। हर की पौड़ी के नजदीक ही एक भवन पर लिखा देखा –बाबरी भवन। इसके पीछे की कहानी जानने की जिज्ञासा तो हुई लेकिन आरती छूट जाने के डर से वहां ठिठक ही पाया, रुक नही पाया। जिज्ञासा को पीछे झटककर आगे बढ़ना पड़ा।  (क्रमश:)

"दुनिया में कितना गम है, मेरा गम कितना कम है ..."

रजनीश प्रकाश | 0 टिप्पणियां
दो महीने पहले स्लिप डिस्क की चपेट में आ गया। फिर क्या था ... न उठ पा रहा था, न बैठ पा रहा था। लग रहा था कमर पे छिली हुई नुकीली हड्डी लगातार चुभ रही हो। आना-जाना तो दूर चार कदम भी चार कोस से कम नही था मेरे लिए । इन्ही दिनों विमहांस जाना हुआ। डॉक्टर को दिखाकर हॉस्पीटल के लॉन में खून और एक्स-रे की रिपोर्ट का इंतजार कर रहा था। वहां तमाम तरह के मरीज अपनी किस्म-किस्म की बीमारियों और समस्याओं के साथ मौजूद थे। कुछ ठंड के आखिरी दिनों में ताजा-ताजा धूप खाने में लगे थे तो कुछ एक्सरसाइज जैसा कुछ कर रहे थे। पेनकिलर खाने के बावजूद दर्द की तरंगें रह-रहकर मुझे डांवाडोल भी कर जाती थी। लेकिन इसी बीच मेरी नजर करीब तेईस-चौबीस साल के लड़के पर चली गयी। उसका पूरा का पूरा एक टांग गायब था। शक्ल-सूरत और पहनावे से वो अफगानिस्तान या फिर किसी और देश का ही मालूम हो रहा था। शायद किसी विस्फोट की जद में आ गया था या फिर किसी दुर्घटना का शिकार हो गया हो। उसके दो-तीन रिश्तेदार या परिचित कुछ-कुछ देर में उसे कृत्रिम पैर के जरिए चलने में मदद करते। मेरा ध्यान रह-रहकर उसके चेहरे पर चला जाता। मेरा खुद का दर्द कुछ समय के लिए मानो गायब सा हो गया और यह सोच-सोच कर ही मैं सिहर जाता कि उसके दिमाग में क्या-क्या चल रहा होगा, उस पर क्या बीत रही होगी । कई लोगों को उसके परिचितों से बात करते भी देखा, लोग-बाग उससे अपनी सहानुभूति भी प्रकट कर रहे थे खासकर महिलाएं। मेरी किसी से कुछ पूछने की हिम्मत नही हुई। सालों पहले किसी किताब के शुरु के पन्ने पर 'गांधी जी का जंतर' शीर्षक वाली एक छोटी सी टिप्पणी पढ़ी थी, अचानक से उसकी याद आ गयी।... वैसे स्लिप डिस्क का अच्छा-खासा असर अब भी है, लेकिन वो अभी उतार पर है। शायद दो-तीन हफ्तों में चलने-फिरने लायक हो सकूं।

“किताबें करती हैं बातें...”

रजनीश प्रकाश | 2 टिप्पणियां
डीडी भारती पर एक कार्यक्रम आता था –किताबनामा। जिसमें किताबों और लेखकों की बातें होती। मुझे जो सबसे अच्छी चीज लगी वो थी उसका टाइटल-ट्रैक। जिसकी एक खुबसूरत पंक्ति थी- किताबें करती हैं बातें। सफदर हाशमी की लिखी ये लाइन जब भी कानों में घुलती, मन सच में काफी प्रसन्न हो उठता। किताबों से की गयी खुद की बातें जेहन में कौंधने लगती।

   जब भी कोई पाठक किसी कहानी, उपन्यास , कविता को डूबकर पढ़ता है तो एक तरीके से वो उस किताब को कुछ समय के लिए जीने लगता है। उसके पात्रों से संवाद करता है, खुद को उन पात्रों के रुप में कल्पना करने लगता है। कहानी में पात्रों की गति-दुर्गति के अनुरुप हंसने-रोने लगता है। उनकी किंकर्तव्यविमूढ़ता पर क्रोधित होता है । रोमांटिक उपन्यास हो तो पाठक प्रेम में डूबा नायक बनकर डूबता-उतरता है और आजादी के आंदोलन की पृष्ठभूमि हो तो उसकी भुजाएं फड़कने लगती है। कभी-कभार ऐसा भी होता है कि कहानी-उपन्यास तो वह कब का पढ़ चुका होता है लेकिन उससे निकलने में उसे एक अरसा लग जाता है। ऐसा भी नही ह सब कुछ कल्पना के स्तर पर ही होता है, उसका कुछ रिस-रिस कर हमारे व्यक्तित्व की परतों में भी समाहित होता जाता है।  हम अक्सर सफल व्यक्तियों के लेख पढ़ते हैं जिसमें वो जिक्र करते हैं कि किस तरह से कुछ किताबों ने उनकी जिंदगी पर गहरा असर डाला।

    किताबों का चस्का मुझे शुरु से रहा। चस्का कब और कैसे लग गया, मालूम नही। जरुरी नही कि हर चीज समझ में आए ही फिर भी कोई नयी किताब दिखने पर हाथ में ले ही लेता हूं। पहली किताब जो हाथ में आयी वो शायद मनोहरपोथी ही होगी। जहां तक याद हैं उसमें वर्णमाला का बोध कराने वाले शब्द थे, चित्र के साथ। बचपन में अक्सर नई किताबें कम ही हाथ में आती। बच्चें जब अपने से बड़ी वाली क्लास में जाते तो पुराने क्लास की किताबों को अधिया यानि कि अंकित मूल्य से आधे पर उन बच्चों को बेच देते जो कि उस क्लास में प्रवेश करते। पैसा तब अफारात में नही था इसलिए अभिभावक भी अधिया या तिहाई में ही बच्चों के लिए किताब खरीदने की कोशिश करते। नई किताबें तब ही खरीदी जाती जब पुरानी किताबें उपलब्ध नही होती, जिसके मौके कम ही आते थे। एक बार हुआ ऐसा कि पुरानी किताब के शुरु के कुछ पन्नें गायब थे। पापा ने फिर किसी और बच्चे के किताब से उन अध्यायों को सफेद पन्नों पर लिखा और उन पन्नों को पुरानी किताब के बाकी बचे पन्नों के साथ सील दिया।

    कोर्स की किताबों और कॉमिक्स के अलावा किताबों के नाम पर हमारा एक रुपए वाली क्वीज की किताबों से ही पाला पड़ा था। अक्सर बस या मिनी बस में जाते हुए या मेले-ठेले में यह किताब अवतरित होता। इस क्वीज बुक के सवाल भी अजीबोगरीब होते, मसलन- किस मछली के शरीर से करंट निकलता है, किस मछली के दो ह्रदय होते हैं, कौन सा पेड़ रात में चलता है टाइप। किताब बेचने वाला भीषण गर्मी में तरबतर इन इन सवालों की ऐसी मुनादी करता मानो कि अफ्रीका के रेगिस्तान से लेकर प्रशांत महासागर की लहरों के बीच से होकर अभी-अभी टाटा407 में अवतरित हुआ हो।

   एक बार हमारे मोहल्ले के बच्चों को बुक बाइंडिंग का शौक लगा। बुक बाइंडिंग एक तरीके से मोहल्ले में सक्रांमकता की हद तक फैल गया। कोई भी किताब दिखती हम उसे बाइडिंग की कैंद में जकड़ने को व्याकुल हो उठते। कपड़े की दुकान से कूट लेकर आते और फिर आटे से लेई बनाते। बड़ी सुई के सहारे किताब और कूट में स्ट्रेटेजिक प्वाइंट पर छेद किया जाता और मजबूत धागों को उनसे गुजारा जाता। फिर किताब की तीन तरफ से कटिंग , लेई और खास कपड़े से उसकी बाइंडिंग की जाती । किताबों से जुड़ी इतनी सारी यादें और बातें हैं कि उनके जिक्र की देर भर होती है कि यादें भरभराकर आंखों के सामने जमा होने लगती हैं। (क्रमश: )
   

“लिखते-लिखते लव हो जाय...”

रजनीश प्रकाश | 0 टिप्पणियां
मुझे लिखना पसंद है... कलम से लिखना । मैं तब भी लिखता रहता हूं, जब लिखने की कोई जरुरत नही होती, कोई मतलब नही होता ...और कुछ नही तो अखबारी किनारे के खाली जगहों पर कुछ भी लिखता रहता हूं ,जिसका कोई औचित्य नही होता। अब तो वैसे भी कलम से लिखने का कोई ज्यादा स्कोप नही बचता। दफ्तरों में आजकल साइन और नोटिंग करने के अलावा अधिकांश काम-काज कंप्यूटर पर ही हो जाता है। हालांकि ऐसा नही है कि बाजार से कलम गायब हो गए हैं। स्टेशनरी की दुकानों पर दर्जनों ब्रांड और टाइप के कलम सजे जरुर मिलते हैं और खूब बिकते भी हैं। लेकिन लोगों को लिखने की आदत और जरुरत को कम होते देखकर मैं अक्सर सोचता हूं कि कलम के भीतर की इतनी सारी स्याही कहां खर्च होती होगी। मुझे तो अक्सर लगता है कि लोग ऊब कर दूसरी नयी कलम खरीद लेते होंगें या फिर रखे-रखे कलम का इंक जम जाता होगा या फिर आदतन वो इंक शर्ट या पैंट की जेबों में बह जाते होगें।

    पहली कलम कौन सी मेरे हाथों में आई यह तो याद नही लेकिन पहले चॉक वाली पेंसिल और फिर कठपेंसिल के जरिए हमने लिखना सीखा, यह जरुर याद है। शुरु में इस्तेमाल किए जाने गए पेनों यानि कलम के जो पहले ब्रांड की मुझे याद आती हैं- वह है ओपल के पेन। दूसरे साधारण से दिखने वाले पेनों की जगह ओपल के पेन खुबसूरत लगते। ज्यादातर हरे या कत्थई रंग के । अभी के उलट उस समय कोई भी लीड या रिफील किसी और पेन में लग जाती। यदि रिफील के लिए ज्यादा पैसे नही होते तो डेम्पों और लोकल ब्रांड की रिफील, नही तो आपको शानदार अनुभव चाहिए तो फिर लिंक 1500 । डेम्पो के साथ खासियत यह थी कि वो बीच-बीच में सुस्ताने लगती फिर उसे दोनों हथेलियों के बीच रखकर रगड़ना पड़ता जबकि लिंक 1500 पन्नों पर सरपट भागती रहती। डेम्पो बेचारा सस्ते में यानि पचास पैसे में और लिंक 1500 एक या सवा रुपए का होता। फिर एक बार लिखो-फेंको कलम भी खूब ट्रेंड में आया।... और टीप-टपुआ पेन को कौन भूल सकता है भला । टीप-टपुआ पेन भी दो प्रजाति के थे। एक जो केवल लिखने के लिए इस्तेमाल में आते थे और एक वो जो लिखने के साथ-साथ खाली समय में हम बच्चों के हथियार में तब्दील हो जाते। टीपने यानि उनके ऊपर वाले सिरे को दबाने के बाद उनमें ऊपर के सिरे पर ही खाली जगह बन जाती और फिर बच्चे उसमें कागज ठूंस देते। फिर क्या था पेन वाली स्वीच दबाने के साथ ही कागज में संचित स्थैतिज उर्जा गतिज उर्जा में परिवर्तित हो जाती और फिर यह गतिज उर्जा विपक्षी खेमे पर जमकर आघात करती।

   हालांकि इंक वाले पेन भी थे, जिसकी नीब अक्सर असावधानी की वजह से खराब हो जाती। पहले सुलेखा ब्रांड के इंक और फिर चेलपार्क के इंक से हम इंकड्रॉप के सहारे कलम के पेट मे उसकी खुराक डालते। समस्या तब आती जब इंक के पेन चलने से इंकार करने लगते और हम उसे झटककर उसे चलते रहने को मजबूर करते। पेन तो चलना फिर से शुरु कर देती लेकिन अक्सर खुद के शर्ट-पैंट खराब हो जाते तो कभी साथियों के शर्ट-पैंट उसकी जद में आ जाते।

   फिर अचानक से एक झोंका ऐसा आया कि डेम्पो, ओपल, लिखो-फेंको, सुलेखा, चेलपार्क सब उसकी चपेट में आ गए। रिनॉल्डस, लिखते-लिखते लव हो जाय वाला रोटोमेक, मोनटेक्स , मित्सुबिशी, खुशबू वाला टुडे दर्जनों ब्रांड और टाइप-टाइप के हमें देखने को मिलने लगे। हर कलम की अपनी खूबी थी। मसलन मित्सुबुसी पेन के पेट के आखिरी सिरे पर रुई जैसा कुछ ठूंसा हुआ होता, रोटोमेक का पेन चलते-चलते उल्टी करना शुरु कर देता, टूडे के पेन काफी कलरफुल होते। हालांकि बताता चलूं कि हमारे सीएच स्कूल में जहां से मैनें मैट्रिक की, वहां के बेंचों में लोहे की छोटी टोपियां लगी हुई थी, जिसमें किसी जमाने में विद्यार्थी इंक रखकर सरकंडे की कलम से लिखा करते होंगें। लड्डू बाबू हमारे हिंदी के टीचर थे। हम भी अच्छी हैंडराइटिंग के लिए उन टोपियों में इंक डालकर सरकंडे की कलम कम से कम एक पन्ना सुलेख लिखते और लड्डू बाबू को दिखाते।

  वैसे स्कूल के दौरान हमारे क्लास में बच्चों की अपनी-अपनी पसंद थी और वो अपनी-अपनी पसंद से डिगने को कतई तैयार नही थे। हमारे क्लास में कुछ रिनॉल्डस के खेमे में थे तो कुछ रोटोमेक के खेमे में तो कुछ अभी भी पुरानी डेम्पो-ओपल वाली परंपरा के वाहक थे ।कोई भी अपनी पसंदीदा पेन की बुराई सुनने को तैयार नही होता और सुनना ही पड़ता तो चट से बोल पड़ता कि अब तो इस पर हाथ बैठ गया है। मैं अपनी बात करूं तो शुरुआत में मैंने मोनटेक्स के कलम का आसरा लिया फिर रिनॉल्डस के 045 का और फिर मैट्रिक-इंटर-ग्रैजुएशन तक 045 और रिनॉल्डस जेटर के आस-पास ही चक्कर काटता रहा। हालांकि शायद ग्रैजुएशन तक सैलो प्वॉयनटेक का आगमन हो चुका था, जिसकी कुछ सालों तक मुझे लत लग गयी। फिर काफी दिनों तक सैलो ग्रीपर का इस्तेमाल किया। वैसे अभी की बात की जाय तो ज्यादातर पायलट हाइ-टेक प्वाइंट ,रिनॉल्डस ट्राइमेक्स और रिनॉल्डस 045 के बीच झूलता रहता हूं।

जाने कहां गए वो दिन...

रजनीश प्रकाश | 0 टिप्पणियां
जिंदगी के हाइवे पर काफी कुछ पीछे छूटता जा रहा है । भागमभाग वाली जिंदगी में जबकि दुनिया के सारे तार एक दूसरे से जुड़ते दिख रहे हैं पर्व-त्योहार भी सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट वाली थ्योरी के चपेट में आते दिख रहे हैं। कितने त्योहार हैं बचपन के, जो अब अतीत का हिस्सा होते जा रहे हैं। जूड़शीतल, अनंत चतुर्दशी , तिल सकरात यानि मकर संक्रांति जैसे त्यौहार जिंदगी की आपाधापी में पीछे छूट रहे हैं। होली-दिवाली-दुर्गापूजा तो खैर बाजार की चहेती हैं लेकिन बाकी त्योहारों का दिवाला निकलता दिख रहा है।

   जमाना इंस्टेंट का है, यानि सब कुछ तुरंत का। अब किसे फुरसत है मकर संक्रांति से दसियों दिन पहले चावल, चूड़ा, तिल , मक्का, मूंगफली लाने और फिर कंसार जाकर उसे भुनवाने का। हम बच्चे मकर संक्रांति का साल भर इंतजार करते। हमारे स्कूल के बगल में ही कंसार हुआ करता, हम बच्चे किसी बर्तन, सूप या दौड़ी में चावल,चूड़ा, मक्का समेट कर कंसार पहुंच जाते और अपनी-अपनी बारी का इंतजार करते है। कंसार में एक बड़ा सा मिट्टी का चूल्हा रहता जिस पर एक ही साथ कई मिट्टी के बर्तनों में चावल-चूड़ा आदि भूने जा रहे होते। कंसार को चलाने वाली महिला कभी चूड़ा-चावल पर ध्यान देती तो कभी धीमी पड़ती आग को बढ़ाने के लिए और सूखी लकड़ी और पत्ते चूल्हे के हवाले करती। जब तक वह भूना नही जाता हम बच्चों की पूरी मौज होती। मकर-संक्राति के दो-तीन पहले से ही लाय और तिलवा बनना शुरु हो जाता। बाजार से गुड़ लाया जाता और फिर चूल्हे या गैस पर उसको गलाया जाता। नजदीक में रहने वाली बुआ या फिर रिश्तेदार की या पड़ोंस की महिलाएं भी आती। फिर पिघले गुड़ में भूने चावल-चूड़ा-मक्का को मिलाया जाता। हम बच्चों को इस मिक्सचर को मुट्ठी में भर कर लाय बनाने में खूब मजा आता। कई शामें हमारी ऐसी ही गुलजार रहती। लाय बनाने का यह क्रम तो कभी-कभी मंकर-संक्रांति के दिन तक जारी रहता।

     मकर-संक्रांति की शुरुआत सुबह-सुबह नहाने से होती। मम्मी सुबह पांच-छह बजे ही हमारी नींद की दुश्मन हो जाती। हम फिर काफी लानत-मलामत के बाद कुंए और फिर बाद के दिनों में ट्यूब-वेल के पास जल्दी-जल्दी नहाकर अपना कर्तव्य निभाते । नहाने के साथ ही हम झट से दादी वाली मिट्टी की बनी बोरसी की शरण में आ जाते ,जिसमें लकड़ी या कोयला जल रहा होता और हम आग तापने में जुट जाते। फिर हम घर के बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेते और उनके हाथों से तिल लेकर आग में तिल का दान करते, जिसे हमारे यहां तिल बहाना कहा जाता। मम्मी फिर गया का तिलकुट, खुशबू से लबालब तुलसीफूल चूड़ा और स्वादिष्ट सब्जी और भांति-भांति के लाय हमारे लिए लेकर आती। फिर तो पूरा दिन ही अपना होता। पूरी दोपहर अपने चाचाओं और करीबी रिश्तेदारों के घर हम चौकड़ी भरते,  तिल बहाने के बाद लाय और तमाम चीजें हमें खाने को मिलती। दोपहर ढ़लते ही घर पर कार्टून पैक होना शुरु हो जाता। सभी तरह के लाय, चूरा और तिलकुट कार्टून में पैक होते है। फिर हम और हमारे चचेरे भाईओं का जत्था कार्टून से लैस होकर बुआओं के घर के लिए कूच कर जाता।

    घर से दूर बुआ के घर हम बच्चों की खूब धमा-चौकड़ी होती। अब घर से दूर दिल्ली में मकर संक्राति का त्योहार यादों की परिधि में सिमटती जा रही है।  सच में... कहां गए वो दिन...।


उपन्यास, अजनबी, आंसू ... और जवान होता रिश्ता...

रजनीश प्रकाश | 1 टिप्पणी
ऊंघते दिनों में जबकि दोपहर सर पर होता ,ग्राहक गली से बाहर आने से परहेज करते, मैं कई दुकानदारों को मोटी-मोटी किताबों में सर घुसाए हुए देखता । पढने के उनके सामर्थ्य और ललक को देखकर चौंधिया जाता । हम ठहरे विद्यार्थी... बस्ते में किताब होना हमारी मजबूरी ठहरी। दोपहर की घंटती बजती तो सीधे मैदान में... और दोपहर शुक्रवार का हो तो फिर पूछिए मत, खेला पूरे डेढ़ घंटे चलता। गेंद फेंका-फेंकी से लेकर पिट्टो तक सारे खेल खेल-खेल कर पस्त होकर ही वापस लौटते। पढाई उतनी ही करते जितनी क्लास में मास्टर साहब पढ़ा देते और ट्यूशन वाले मास्टर साहब से डांट नही सुननी पड़ती।  लेकिन इन पढ़ाकों के हौसले और जज्बे को देखकर सलाम करने को मन करता। कई बार पान की गुमटी और तंबाकू की दुकानों पर ऐसी भारी-भरकम किताबें पड़ी मिलती। लगता कि पढ़ाई-लिखाई का ठौर-ठिकाना केवल स्कूल ही नही है। इसी जिज्ञासा का परिणाम था कि उपन्यास शब्द ने मेरे शब्दकोष में अपनी जगह बनायी। आकर्षण अभी बाल्यावस्था में ही था कि उपन्यास के जन्म-जन्मांतर के शत्रु अपने-अपने बिलों से बाहर निकलते मिले। किसी ने कहा-निठल्ला पुराण है तो किसी ने बेरोजगारी से इसका द्वंद्व समास यानि लोटा-डोरी वाला रिश्ता बताया। यानि कुल मिलाकर विरोधी पक्ष की बातों का सार यह था कि यह कोढ़ का कारण तो है ही उसका लक्षण भी है। उपन्यास के प्रति उपजा आकर्षण गर्भ में ही मृत हो गया ... हालांकि यह भी कह सकते हैं कि सुसुप्त हो गया। (बाद में पता चल इन भारी-भरकम पोथों को लुग्दी साहित्य भी कहते हैं।)

       साहित्य के नाम पर पाठ्यपुस्तकों से इतर दसवीं तक मैने कोई झांका-झांकी नही की। किताब-पत्रिका की दुकान पर पाठ्यपुस्तकें जहां आलमारियों में गरिमामयी अंदाज में जमी रहती, वहीं इंडिया टूडे, माया, प्रतियोगिता दर्पण से लेकर सरस सलिल आगे मेज पर पड़ी रहती। एकाध बार कनखियों से सरस सलिल को देखा जरुर था। तब तक सरस-सलिल बदनाम पत्रिका के तौर पर युवा और अधेड़ जगत में अपनी प्रतिष्ठा पा चुकी थी। उड़ती-उड़ती चर्चाएं तो खूब सुन रखी थी लेकिन उसके पन्नों तक पहुंचने से पहले ही हिम्मत जबाव दे देती, ऊंगलियां खुद-ब-खुद सिकुड़ जाती और फिर पड़ोस में लटके इंडिया टूडे को इस प्रकार टटोलने लगती कि किसी को मेरी मंशा पर सुई भर का भी शक न हो।

       हालांकि छठी से लेकर दसवीं तक की बिहार बोर्ड की पाठ्यपुस्तकों में मशहूर लेखकों की कहानियां और कविताएं पढ़ी थी। नागार्जुन की 'अमल-धवल गिरी के शिखरों पर बादल को घिरते देखा है' वाली कविता पाठ्यपुस्तक का हिस्सा थी, सुदर्शन की कहानी 'हार की जीत' को छठी क्लास में चाव से न जाने कितनी बार पढ़ा था। हिंदी के हमारे टीचर थे- लड्डू चौधरी । क्लास में खड़ा करवा-करवा कर हर किसी से एक-एक पैरा पढ़ने को कहते । मुझे याद है कि सातवीं क्लास में किसी कहानी के एक पैरा की शुरुआत में डार्लिंग शब्द था और क्लास के बच्चे इस जुगत में थे कि इस पैरा को पढ़ने के लिए उनका ही नंबर आए। वैसे पढ़ने के लिए तो लालू-चालीसा भी पढ़ा था- 'कुंदन राय मरछिया देवी, के संतान, जगत तुम खेवी'। लेकिन मोटे तौर पर यह था कि मेरे लिए साहित्य से संबंध पाठ्यपुस्तकों की परिधि में ही गोल-गोल घूमता रहा।

      बारहवीं के बाद पटना से बनारस पहुंचने के बाद उपन्यास से पुनर्परिचय हुआ ... और इस बार जो रिश्ता बना वो समय के साथ और-और जवान होता जा रहा है। हुआ यूं कि बीए फर्स्ट ईयर के शुरुआती दिन थे। पहली बार घर से दूर एकदम छूट्टा टाइप हुए थे। कोई रोकने-टोकने वाला नही। दिन में क्लास जाओ और शाम में कॉमन-रुम में टीवी भकोसो। फिल्म,न्यूज,गाना जो भी चले भकोसते रहो। रात के खाने के बाद तमाम तरह की फिल्में कॉमन रुम में चलती । चलती तो फिर रुकने का नाम न लेती। कुछ वीर-बांकुरे सुबह गोधूलि-बेला तक फिल्म का पान करते। ऐसे ही दिनों में एक मित्र जो कभी-कभार होस्टल में आतिथ्य फरमाते गुनाहों का देवता लेकर अवतरित हुए। हम भी पूरे फ्री थे। संयोग से मांगने पर उन्होंने अपनी आदत के विपरित वो किताब दे भी दी। एक बार जो बैठे उठा ही नही गया। सुधा, विनती, चंदर में ही घूमने लगे। अक्षय कुमार, विपाशा बसु वाली फिल्म अजनबी कॉमन रुम में चलनी शुरु हो चुकी थी। अगल-बगल के कमरे खाली हो गए थे ... और मैं रोया जा रहा था । सुधा और चंदर का दुख मेरे अंदर धंस सा गया। शुक्र था कि पूरी की पूरी लॉबी वीरान थी और कोई संयोगवश भी मेरे कमरे में नही आया । किसी ने यह नही पूछा कि मेरा कोई स्वर्ग सिधार गया है क्या।  यह उपन्यास से मेरे रिश्ते की शुरुआत थी। उपन्यासों के अजनबी पात्र अब अपने लगने लगे।



“दुनिया वालों से दूर, जलने वालों से दूर ... “

रजनीश प्रकाश | 0 टिप्पणियां
कई महीनों से कहीं घूमने नही जा पाने की वजह से बीवी के निशाने पर था । घूमने के मुद्दे पर घमासान वार्ता चल ही रही थी कि अचानक एक क्षण ऐसा आया जब घूमने की तिथि पर न्यूनतम साझा सहमति बन गयी। हालांकि जाना कहां है, इस पर पक्के तौर पर मुहर नही लगी।

      इन्हीं दिनों हम कॉपरनिकस मार्ग के अपने ऑफिस से टहलते-टहलते सफदर हाशमी मार्ग के कोने पर खड़े हिमाचल भवन के करीब से गुजर ही रहे थे कि शिमला जाने का विचार अकस्मात उभरा। अंदर ही हिमाचल टूरिज्म वालों का एक छोटा सा ऑफिस है। हमारे दिए दिनों में उनके शिमला के होटलों में बस एक दिन की ही बुकिंग उपलब्ध थी । हिमाचल टूरिज्म वालों ने चैल जाने का विकल्प सुझाया - चैल पैलेस में बचे दूसरे दिन के लिए कमरा खाली था । छत्तीस के छत्तीस न सही लगभग बत्तीस-तैंतीस गुण तो मिल ही गए। बस-होटल की बुकिंग कर-कराकर ही हम वापस लौंटें ।
शिमला

चैल पैलेस


       कुछ ऐसा ही वाकया कुछ सालों पहले हुआ जब राजकुमार हिरानी की टीम को थ्री इडियट्स की शूटिंग के लिए इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज से अनुमति नही मिली तो चैल पैलेस विकल्प के तौर पर अचानक से उभरा और बेचारे रणछोड़ दास चांचड़ के बाप के भस्म में परिवर्तित होने के बाद के दृश्य यहां फिल्माए गए।
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज

चैल पैलेस


         वैसे कहने वाले तो यह कहते हैं कि पाटियाला के राजा भूपिंदर सिंह जब वायसराय की बेटी को शिमला से भगाकर ले गए तो शिमला उनके लिए दिल्ली-दूर हो गया । फिर चैल उनके लिए विकल्प के तौर पर उभरा। राजा साहब तो ठहरे राजा साहब .... उन्होंने चैल में अपना डेरा-डंडा जमा लिया। चैल है भी बेपनाह खूबसूरती समेटे, ऊपर से तुर्रा यह कि ऊंचाई भी शिमला से ज्यादा । ऊंचाई का जिक्र-ए-अंदाज ऐसा कि सुनाने वाले ने अभी-अभी इतिहास में छलांग लगायी हो राजा साहब के और चौड़े हुए सीने को अभी-अभी इंच-टेप से पैमाइश की हो या फिर वायसराय को उनकी बग्घी से ढ़केल कर अभी-अभी लौटा हो । कहने वाले तो ऐसे कहते हैं मानो राजा साहब उनके सामने ही वायसराय की सुपुत्री को लेकर चंपत हो गए हों। कुछ कहते हैं कि बेटी वायसराय की नही थी कमांडर-इन-चीफ लॉर्ड किचनर की थी। हालांकि ठोस इतिहास कहता है कि राजा साहब बमुश्किल एक साल के थे जब चैल पैलेस ने आकार लिया। हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट में स्कैंडल प्वांइट की लेखिका मंजू जेदका कहती है कि हो सकता है कि इस कहानी का जुड़ाव भूपिंदर सिंह से न होकर उनके पिता राजिंदर सिंह से हो। वो कहती है कि इस बात के प्रमाण है कि राजिंदर सिंह की एक अंग्रेज पत्नी थी , जिनसे उन्हें एक बेटा भी हुआ था । उनके मुताबिक भूपिंदर सिंह के इस कहानी का किरदार होने की वजह उनकी रंगीन तबियत हो सकती है।... वैसे 'वायसराय की बेटी और महाराजा की दंतकथा' ने किन परिस्थितियों में जन्म लिया , कब कौन सी करवट ली और कैसे वायसराय , लॉर्ड किचनर और चैल पैलेस इससे जुड़ते चले गए, यह जानना रोचक होगा। समय का समंदर कुछ चीजों को अपने पेटे में ले लेता है और कुछ को उछालकर किनारे पटक देता है। शायद कभी भविष्य में इस दंतकथा के पीछे की सत्यकथा भी उद्घाटित हो।

         शिमला की भीड़भाड़ से दूर हम चैल पैलेस पहुंचे तो समय ठहर सा गया । दिल्ली की भागमभाग और शिमला की चहल-पहल चैल पैलेस के चारों तरफ फैले विशालकाय देवदार पेड़ों को लांघ नही पायी । वर्तमान को पृष्ठभूमि में ठेलकर इतिहास मंच पर मुख्य भूमिका में था । अंदर रेस्तरां में फिल्म उजाला का गाना बज रहा था- दुनिया वालों से दूर , जलने वालों से दूर ... आ जा, आ जा चलें कहीं दूर ...। 

          चैल पैलेस की ऊंची छतों और एंटीक फर्नीचर वाले रेस्तरां में बैठे फिल्म दाग का राजेश खन्ना का वो डायलॉग भी याद आया – "इज्जतें , शोहरतें,चाहते, उल्फतें... कोई भी चीज दुनिया में रहती नही ... आज मैं हूं जहां कल कोई और था ...ये भी एक दौर है, वो भी एक दौर था ।" चैल की खूबूसरत सुरंग से होकर मैं अतीत, वर्तमान और भविष्य में एक साथ डुबकी लगाने लगा । .... मैं अपने-आप में सिमटता जा रहा था । चैल एक सुखद संयोग था, स्मृतियों में संजोने लायक । बताते चलें कि राजेश खन्ना, शर्मिला टैगोर और राखी अभिनीत हिट फिल्म दाग के कुछ दृश्य चैल में फिल्माए गए।


बरास्ते करांची : कभी दलसिंहसराय से लिपटी थी सफेद सिगरेटी चमड़ी...

रजनीश प्रकाश | 0 टिप्पणियां
स्कूल के दिनों में घर से बाहर निकलता तो लिखा देखता – “पनामा पीने वालों की बात ही कुछ और है “। साथ ही आधे उजले और आधे पीले डब्बे से कुछ सिगरटें बाहर खुली हवा में ताका-झांकी करती दिखती। अपनी सफेद काया में हर जाति-धर्म-उम्र के लोगों को अपनी ओर खींचने की अकुलाहट उनमें साफ-साफ दिखती। हालांकि खैनी और बीड़ी का जलवा तो था ही, लेकिन गोरेपन को ऐसे इलाके में कौन नकार सकता है जहां हर सास को अपनी बहू और हर संभावित पति को गोरी ही लड़की चाहिए ।

और लगभग यहीं कालखंड होगा जब गोपी बाबू से गणित, भौतिकी, रसायन की ट्यूशन के लिए हम मंसूरचक के रास्ते में उनके मकान की ओर हर शाम रुख करते। इसी रास्ते पर दलसिंहसराय स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 2 के समांतर एक बड़ी चहारदिवारी से घिरी एक जगह थी । बाहर से अंदर का कुछ भी नही दिखता ... सिवाय बड़े-बड़े पेड़ों के आसमान की ओर बढ़ते सर और धड़ । लोग कहते कि यह सिगरेट फैक्ट्री है। वैसे हमारे सामान्य ज्ञान वाली किताब में बिहार के कारखानों की सूची में इसका जिक्र नही था। पता चला कि काफी पहले ही बंद हो गयी।

वैसे तो हमारा इलाका मोटे तौर पर खैनी और बीड़ी टाइप का था, लेकिन शौकीन मिजाज सिगरेट का भी लुत्फ उठाते । जब भी 'सिगरेट फैक्ट्री के करीब से गुजरता जिज्ञासाएं स्वभाविक रुप से जाग जाती । आखिर दलसिंहसराय और सिगरेट के बीच आखिर रिश्ता क्या है, कैसा था ? कितना पुराना है ? क्या अब भी रिश्ते की कोई डोर बची रह गयी है या फिर समय ने सारे पुराने रिश्ते कतर दिए हैं।

फिर धीरे-धीरे समझ में आया कि दलसिंहसराय और सिगरेट के बीच का रिश्ता साधारण सा नही है, एतिहासिक है, और इस एतिहासिक रिश्ते में कोई अनहोनी नही थी । दरअसल सरैसा परगना के तंबाकू की प्रसिद्धि का अपना इतिहास रहा है। इंडियन सिविल सेवा से जुड़े एल एस एस ओ मैली ने 1907 के दरभंगा जिले के गजेटियर में लिखा है कि सरैसा परगना के तंबाकू की ख्याति उत्तर बिहार की सीमा की पाबंद नही थी। सरैसा जिले का सबसे बड़ा परगना था, मुजफ्फरपुर जिले के साथ-साथ मुख्य रुप से यह दलसिंहसराय और समस्तीपुर थाने की परिधि में था। उन्होंने लिखा है कि दरभंगा जिले में तंबाकू के कुल खेत के सात का पांचवा हिस्सा समस्तीपुर और दलसिंहसराय थाने में था।

हालांकि तंबाकू भारत की मौलिक वस्तु नही है, इसके दादा-परदादा विदेशी थे, समंदर पार के, जहां जाने का मतलब ही धर्म-भ्रष्ट हो जाना है। पुर्तगाली इसे लेकर आए और हालत अब ऐसी हो गयी कि किसी भी मोड़ और नाली के ऊपर बनी गुमटी पर तंबाकू की लड़ी, उसे कच-कच कर कतरने वाला यंत्र और प्लास्टिक-स्टिल की चिनौटी न दिखे तो समझिए कस्बा-गांव ही मरा हुआ है, सार्वजनिक बहस की परंपरा समाप्त हो गयी है , समानता खतरे मे हैं , अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित हो गयी है। हालांकि पोलिथीन-प्लास्टिक युग के प्रसार में अब खैनी और चूना भी पैकेटबंद हो चले हैं।

खैर हुआ यू कि साल 1902 में दुनिया के सबसे बड़े तंबाकू फर्मों में शुमार ‘द अमेरिकन टोबैको कंपनी’ और ‘इंपीरियल टोबैको कंपनी’ ने सालों से छिड़े कीमतों को लेकर होने वाली प्रतिस्पर्धा को खत्म करने का फैसला लिया तो उन्होंने अपने प्रभाव वाले इलाके को छोड़कर बाकी दुनिया के लिए एक नयी कंपनी ‘ब्रिटिश अमरिकन टोबैको कंपनी( बैट)’ बनायी, जो यूके और यूएसए से बाहर के इलाकों में अपना कारोबार जमाती । स्वाभाविक रुप से बैट की निगाह तब के ब्रिटिश उपनिवेश भारत पर भी गयी। बिहार उन महत्वपूर्ण केंद्रों में से एक था जहां बैट ने अपने तंबू गाड़े और फिर दलसिंहसराय की दखल तो अब स्वाभाविक ही थी।

भारत में सिगरेट ने सबसे पहले गोरे साहब की उंगलियों के बीच जगह बनायी, भीतर भूरे साहब इसकी चपेट में आए। कंपनी ने अभी ब्रिटिश प्रवासियों के दायरे से बाहर निकल कर भारतीयों के बीच सिगरेट के प्रचार-प्रसार की शुरुआत ही की थी कि उसे सबसे बड़ा धक्का लगा 1905 के स्वदेशी आंदोलन से। ऐसे में सिगरेट के आयात पर भी लगाम लगी। इन्हीं परिस्थितियों में भारत में सिगरेट उत्पादन के लिए बैट ने नंबवर 1905 में लंदन में पेनिनसुलर टोबैको कंपनी बनायी । जे टी विल्की के प्रबंधन में एक अस्थायी फैक्ट्री करांची में लगी, जिसने स्थानीय तौर पर प्राप्त तंबाकू पत्तों और बोनसाक मशीनों के जरिए जून 1906 में सिगरेट को बाजार के लिए उतारा। लेकिन कुछ समय बाद यह साफ हो गया कि तंबाकू पत्तों के भंडारण और सिगरेट उत्पादन से जुड़े दूसरे कामों के लिए करांची सही जगह नही है। ऐसे में कलकत्ता के करीब गंगा नदी के किनारे बिहार के मुंगेर में नजदीक के तंबाकू उत्पादन-क्षेत्र को देखते हुए मार्टिन एंड को के द्वारा बैट के लिए सिगरेट कारखाना बनाया गया । एफ.ए.पार्किंसन श्रीलंका (तब के सीलोन) से पेनिनसुलर के पहले प्रबंध निदेशक के तौर पर लाए गए।

बैट ने स्थानीय स्तर पर उत्पादित तंबाकू की खरीद के लिए 3 जुलाई 1912 को कलकत्ता में इंडियन लीफ टौबेको डेवलपमेंट कंपनी बनायी। जिसने एक अमरिकी रॉबर्ट सी. हैरीसन के नेतृत्व में काम करना शुरु किया। हैरिसन ने लोगों को ऐसी किस्म के तंबाकू उत्पादन को लिए प्रोत्साहित करना शुरु किया जो सिगरेट के लिहाज से ज्यादा बेहतर हो। हालांकि स्थानीय लोगों के द्वारा तंबाकू की क्यूरिंग या सुखाने की प्रक्रिया बहुत ही अपरिष्कृत थी , ऐसे में 1908 में शाहपुर पटोरी और खजौली के बेकार पड़े नील कारखानों में रिड्रांइग प्लांट स्थापित किए गए। फिर बाद में बढ़ती जरुरतों को देखते हुए साल 1912 में दलसिंहसराय में इन दोनों से काफी बड़ा रिड्रांइग प्लांट स्थापित किया गया। यही वह साल था जब मुंगेर फैक्ट्री के द्वारा स्थानीय स्तर पर उत्पादित तंबाकू से मदारी, बैटलएक्स और रेड लैंप ब्रांड के सस्ते सिगरेट का उत्पादन शुरु हो गया। (क्रमश: )

जर्मनी को जुकाम और दलसिंंहसराय की करवट ...

रजनीश प्रकाश | 0 टिप्पणियां
जर्मनी और दलसिंहसराय के बीच की दूरी कोई मामूली नही है। दलसिंहसराय से दिल्ली ही करीब सवा हजार किलोमीटर है। आखिर ऐसे में किसी जर्मन के दिमाग में कोई खुजली हो तो फिर दलसिंहसराय में बैठे शख्स को क्या शिकायत होगी या फिर उसकी क्या उत्सुकता होगी ? खैर अभी तो इंटरनेट है, पनिया जहाज से लेकर हवाई जहाज पर सवारी आसान हो गयी है। लेकिन सौ साल से भी पहले की सोचिए , जब समदंर पार का सफर भी पाप था, धर्म भ्रष्ट हो जाता था। तब किसी जर्मन के दिमाग की किस जुगाली ने दलसिंहसराय वालों की जिंदगी ही कमोबेश पलट कर रख दी हो, बड़ा बदलाव किया हो । शायद बात केवल दलसिंहसराय का ही नही बहुत कुछ इस विशाल देश की भी है । कह सकते है कि समय का एक चक्र होता है, चीजें बदलती रहती है। कहने वाले कह गए हैं – जो आया है सो जाएगा, राजा-रंक-फकीर। दलसिंहसराय भी गवाह बना एक बड़े वैश्विक चक्र का। जब यूरोपीय ताकतें एक दूसरे से ज्ञान-विज्ञान से लेकर रणभूमि में एक-दूसरे से उठापटक में लगी थी, हजारों मील दूर एक कोने में बलान नदी के किनारों पर भी हलचल हुई।

हालांकि जर्मनी और दलसिंहसराय के एक सदी से भी पुराने इस रिश्ते पर मेरी नजर पिछले करीब दो दर्जन से भी ज्यादा सालों में नही गयी थी। लेकिन इधर की कुछ हलचलों के बीच अचानक ही एक दिन इस रिश्ते का आभास हुआ, जब मैं आंखमूंदकर बेसब्री से नींद की तलाश में अतीत-वर्तमान-अनदेखे भविष्य की धमनियों-शिराओं में प्रवाहित हो रहा था। इधर के दिनों में मेरे कई नए-पुराने रिश्तेदारों के साथ कई मित्रों ने भी जर्मनी के विभिन्न शहरों म्यूनिख, बर्लिन, बॉन का रुख किया है ।

   खैर हुआ यूं कि उन्नीसवीं शताब्दी के अंत होते-होते जर्मनी ने कृत्रिम तरीके से नील बनाने में महारत हासिल कर ली और इसकी चपेट में दलसिंहसराय भी आने से बच न सका, जहां के नील की ख्याति कुछ कम नही थी। दलसिंहसराय प्राकृतिक नील उत्पादन का बड़ा केंद्र था इसके सबसे बड़े नील फैक्ट्रियों में से एक की क्षमता तो करीब 22 हजार क्यूबिक फीट की  थी। बर्नाड कोवेंट्री एक नीलहे साहब हुए जो यहां नील की खेती से जुड़े थे और दलसिंहसराय के नील से जुड़े उपक्रम में उनका मालिकाना हक भी था। ख्याति ऐसी कि कॉवेंट्री प्रोसेस कही जाने वाली प्रक्रिया से तैयार होने वाले उत्कृष्ट नील की वजह से नील जगत में दलसिंहसराय कलर-फैक्ट्री के रुप में जानी जाती थी। इस इलाके में और आस-पास ब्रिटिश प्लांटर्स यानि निलहे साहब किसानों से नील की खेती करवाते और भारी मुनाफा बटोरते। लेकिन सिंथेटिक नील की बढ़ती लोकप्रियता ने नीलहे साहबों को होने वाले मुनाफे का बंटाधार कर दिया। 

नील फैक्ट्री और दलसिंहसराय नील को मिले अवॉर्डों की तस्वीरें
 हालांकि नील इतना महत्वपूर्ण क्यूं है यह मैं आज तक समझ नही पाया। सिवाय बचपन से इन बातों के देखने कि यह सफेद बनियान को आकाशी रंग देता है और भक्क सफेद स्कूल वाले बुशर्ट को नीला बना देता है। हो सकता है और होगा ही कि इसके और भी ढ़ेर सारे काम होगें, लेकिन अपना पाला तो इन्हीं एक-दो मामलों में इससे पड़ा है। इतना याद है कि शायद पहले रॉबिन नील और फिर चार बूंदों वाले उजाला ने घर के एक अंधेरे कोने में अपनी जगह बना ली। हालांकि इस बात पर तो मेरा संदेह आज तक कायम है कि उजाला ने कभी मेरे बनियान-बुशर्ट में उजाले का संचार किया हो ।

नील की फैक्ट्री का एक दृश्य
खैर उन्नीसवीं शताब्दी के अंत होते-होते सिंथेटिक नील ने अपनी जगह बनानी शुरु कर दी और प्राकृतिक नील को कड़ी चुनौती मिलनी शुरु हो गयी , ठीक उसी तर्ज पर कि जब स्पिनिंग मशीन और पावरलूम के आविष्कार ने भारत को कपड़ों के निर्यातक की जगह उसका बड़ा आयातक बना डाला, कपड़ा उद्योग की कमर तोड़ दी । हालांकि ऐसा नही है कि प्राकृतिक नील ने सिंथेटिक नील के खिलाफ मुकाबले में दो-दो हाथ आजमाने से परहेज किया , लेकिन होनी को कौन टाल सकता है भला । दलसिंहसराय में ही कुछ नीलहे साहबों ने नील की फसल को और बेहतर बनाने के लिए साल 1899 के जुलाई महीने में बर्नार्ड कोवेंट्री साहब की देख-रेख में एक रिसर्च स्टेशन बनाया जहां नील की पैदावार और इसका प्रभाव बढ़ाने के लिए कई प्रयोग शुरु हुए। वैज्ञानिकों हैंकॉक, लीक और ब्लॉक्सम ने दलसिंहसराय के इस रिसर्च स्टेशन में नील से जुड़े अनुसंधान किए। नील से जुड़े नीलहे साहबों की लॉबी भी एक बड़ी वजह थी जिसकी वजह से इसी इलाके में पूसा में इंपीरियल एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट अस्तित्व में आया जो बाद में सन 1934 की भूकंप की वजह से आजकल इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट के रुप में दिल्ली के टोडापुर इलाके में विराजमान है। खैर नील की खेती को बेहतर बनाने के सिलसिले में पूर्वी एशिया में जावा द्वीप तक का चक्कर लगाया गया और नील की एक बेहतर किस्म को दलसिंहसराय और इसके आस-पास के इलाके में आजमाने की कोशिश की। यह रिसर्च स्टेशन आगे के कुछ सालों तक अनुसंधान में जुटा रहा और इससे कुछ निष्कर्षों तक पहुंच पाने में भी वैज्ञानिकों ने सफलता पायी थी। लेकिन सिंथेटिक नील से मुकाबला असंभव सा हो गया था।
बी कॉवेंट्री साहब के संबंध में 1915 में छपी जानकारी
हालांकि सिंथेटिक नील , पावरलूम जैसे आविष्कारों की वजह से ब्रिटिशों की नजर में भारत का महत्व किस परिमाण में छीजता जा रहा था और इसने सन 47 में उन्हें वापस अपने मुल्क लौटने के लिए कितना प्रेरित किया होगा, यह तो खैर इस मामले के विशेषज्ञ-विश्लेषक ही बता सकेंगें लेकिन मुझे लगता है कि इसका भी इसमें कुछ न कुछ अंशदान जरुर होगा , लेकिन इसमें कोई शक नही कि हजारों-हजारों मील दूर जर्मनी में अविष्कृत हुए सिंथेटिक नील ने दलसिंहसराय के इतिहास में एक नया मोड़ लाया होगा।

जगदलपुर- अनगिनत भारतीय संस्कृतियों का कटान-बिंदु

रजनीश प्रकाश | 0 टिप्पणियां
बचपन में गणित पढ़ने के दौरान हममे से शायद ही कोई होगा जिसने वृत न बनाया हो। एचबी पेंसिल थामे डिवायडर और सफेद कागज यानि कि कच्चा माल मिला नही कि खूबसूरत वृतों का उत्पादन झमाझम शुरु। अपनी रिपोर्टिंग के पंचवर्षीय काल में खूब घूमने-फिरने को मिला। तीन हजार किलोमीटर लंबे और कमोबेश इतने ही चौड़े भारत का केंद्र क्या हो, यह सवाल अक्सर इन यात्राओं या फिर कभी किसी एकांत क्षण में फूटता। गुगल महोदय से कई दौर में दरियाफ्त की , कुछ जानकारियां सामने आयी। मसलन कि अंग्रेज नागपुर को भारत का केंद्र घोषित कर गए और इस लिहाज का एक पत्थर भी इसके सीने पर टांक गए। मसलन की उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर की घड़ी पूरे भारत का समय बताती है। लेकिन भारत बस भूगोल नही है,भारत संस्कृतियों का समुच्चय भी है। चीन की दीवार छलांगने में बस अब गिनती के ही कुछ दिन है। यहां से खाद-पानी पाती सभ्यताओं का एक लंबा इतिहास और वर्तमान है। ऐसे में यह जिज्ञासा लाजिमी है कि भारत की परिधि में मौजूद विभिन्न साभ्यातिक वृतों का आपस में कटान बिंदु क्या हो ?
जीरो माइल- नागपुर

साल 2009, आधुनिक भारत का सबसे बड़ा त्यौहार चुनाव दिल्ली से करीब डेढ़ हजार किलोमीटर दूर छत्तीसगढ़ में अपने परवान पर था। जगदलपुर के चांदनी चौक पर होटल बस्तरिया में यह मेरा तीसरा सप्ताह था। दीपावली गुजर चुकी थी और छठ दरवाजा खटखटा रहा थी। आम तौर पर प्रवासी बिहारी छठ को वापस अपने शहर-गांव एक नजर मारने का मौका नही चूकते। लेकिन दिल्ली से बने रहने के ऑर्डर की नाफरमानी कैसे कर पाता। छठ के दिन की शाम चाय की अनगिनत प्यालियों के साथ होटल के कमरे में ही कट गयी। लेकिन बेइंतहा इंतजार वाली सुबह इस बार अपने नसीब में नही थी, लेकिन सालों की आदत जाती कहां है। ब्रह्ममुहुर्त में ही नींद के प्राण उखड़ गये । अंधेरा छटने के इंतजार में शरीर कसमसाने लगा। दूसरे दिनों की तरह भांति-भांति के अखबार कोंचियाए आने को ही था कि अच्छी खासी संख्या में लोग छठ वाली दौरी सर पर रखे लौटते दिखे। मन ही मन माथा ठोकने लगा कि छठ अटैंड करने का एक खूबसूरत मौका अपनी हाथों से मैने कैसे आसानी से निकल जाने दिया। वो कहते हैं न कि सावधानी हटी , दुर्घटना घटी। यह तो पता था कि बिहारी मूल के लोग ठीक ठाक संख्या में यहां हैं , लेकिन छठ की बात दिमाग से गुजर नही पायी।





बस्तर दशहरा
वैसे भारत के नक्शे पर गौर फरमाए तो यह अंदाज लगाने में ज्यादा मुश्किल नही होगी कि जगदलपुर भारत के उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम के चौहारे पर जमा है। बगल के कोरापुट से ओडियाभाषी इलाका शुरु हो जाता है वहीं बस्तर कमिश्नरी और तेलुगूभाषी खम्मम भी अड़ोस-पड़ोस में है। वैसे व्यापार के सिलसिले में आए और फिर बस गए जैन/माड़वाड़ी व्यापारी भी अच्छी खासी तादाद में जगदलपुर और बस्तर कमिश्नरी के दूसरे छोटे-मोटे कस्बों में है। और जहां तक आदिवासी संस्कृति की बात है तो बस्तर इसके कुछ अंतिम पते-ठिकानों में से है। यानि कि जगदलपुर शहर में आपको हिंदी भाषा भाषियों के साथ, तेलुगू, ओडिया, मराठी और आदिवासी समाज के अनगिनत भाषाओं को बोलने वाले एक साथ ही मौजूद मिलेंगें।

करीब एक महीना नागपुर में रहा हूं और अच्छा खासा समय महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश और इससे सटे भारत के मध्य के इलाके में गुजार चुका हूं । ऐसे में कोई जिज्ञासु तमाम भारतीय सभ्यताओं के कटान बिंदु के बारे में मेरी राय ले तो मैं नागपुर से करीब 500 किलोमीटर पूर्व जगदलपुर पर ही मुहर लगाउंगा।