रविवार, 31 मई 2020

ये उस समय की बात है...


सब्जियों वाले बगीचे में कुएं के किनारे मेरा भी एक छोटा सा हिस्सा था, जिसके बगल में मुख्य माली की झोपड़ी थी, जिसमें वो रहता था। मुझे अपनी इन उगाए गयी चीजों पर गर्व था और एक दिन जब मैनें देखा कि मेरे पेड़ों को पानी की जरुरत हैं और जब मैने इस संबंध में कदम उठाया तो फिर भारत की जाति व्यवस्था का पता चला।... कुएं के बगल में पानी से भरा बर्तन था। मैने उसे उठाया , लेकिन मुख्य माली ने जिसे मैं अपना दोस्त और सलाहकार समझती थी, उसने उसे छीन लिया और जमीन पर पटक दिया। मैने अविश्वास से उसे घूरा लेकिन उसके चेहरे पर जबरदस्त गुस्से को देखकर अपने बंगले और मां के पास दौड़ी चली गयी। हांलाकि उनके लिए मुझे पूरी तरह से समझाना असमभंव था कि कुछ हिंदू यह समझते हैं कि यदि किसी गैर-हिंदू ने उनके खाने या खाने के बर्तनों को छुआ तो वो अब अपवित्र हो जाते हैं और उनका फिर से उपयोग नहीं हो सकता। इसका किसी के गरीब या अमीर होने से मतलब नहीं है, इसका मतलब इस बात से हैं कि आपने किस जाति में जन्म लिया है। आप हिंदू नहीं बन सकते , आप हिंदू बनकर जन्म लेते हैं। महाराज जो कि मिलिनेयर थे और माली जो कि काफी गरीब था, दोनों ही जन्म से ब्राह्मण थे। हमारे घरेलू नौकर जो कि निचली जाति के थे, खासकर स्वीपर और हालांकि उन्हें माली की तुलना में ज्यादा मेहनताना मिलता था लेकिन वो उसके द्वारा नीची निगाहों से देखे जाते थें।

( जोआन एलन की किताब मिस्सी बाबा टू बड़ा मैम- द लाइफ ऑफ अ प्लांटर्स डॉटर गल नॉर्दर्न इंडिया, 1913-1970  का एक अंश )



जोआन एलेन आगे लिखती है कि महाराज अपने गैर-हिंदू अतिथियों की शानदार खातिरदारी करते थे और खाने की मेज पर उनके साथ बैठते भी थे , लेकिन न तो वे खाने को छूते थे और न ही उनके सामने खाना खाते थे।

जोआन के पिता जॉन हेनरी दरभंगा महाराज के स्वामित्व वाले पंडौल एस्टेट के मैनेजर थे और फिर दरभंगा महाराज ने जब कलकत्ता के मैनेजिंग एजेंट्स के साथ मिलकर पंडौल से केवल छह मील की दूरी पर चीनी का कारखाना लगाने का फैसला किया तो उन्होंने जॉन हेनरी को चीनी कारखाने का मैनेजर बनाया।

जोआन की लिखी इस किताब की शुरुआत होती है सन 1896 से जब जोआन के पिता अलस्ट्र, ब्रिटेन से भारत के लिए रोजगार के सिलसिले में निकले। नील की खेती से जुड़े लेकिन फिर अफ्रीका में चल रहे बोअर युद्ध के लिए भारत से निकल अफ्रीका पहुंच गए। यहां बताता चलूं कि महात्मा गांधी भी इस कालखंड में अफ्रीका में थे और बोअर युद्ध में अंग्रेजों की मदद के लिए उन्हें केसर-ए-हिंद का तमगा भी मिला था, जिसे जालियांवाला बाग नरसंहार के बाद उन्होंने लौटा दिया था। बोअर युद्ध से वापस लौटने के बाद दरभंगा महाराज ने उन्हें पंडौल एस्टेट का मैनेजर नियुक्त किया और फिर मुजफ्फरपुर में होने वाले सालाना मीट में मेबल यानि की अपनी होने वाली पत्नी से भी मुलाकात हुई।

जोआन का जन्म सन 1913 बिहार में हुआ में और शादी दरभंगा में ज्यॉफ्री एलेन से हुई जो कि दरभंगा राज के ही मुलाजिम थे, जो बाद में उनके पिता की ही तरह पंडोल एस्टेट के मैनेजर भी बने। ज्यॉफ्री ने द्वितीय विश्व युद्ध में भाग लिया और युद्धबंदी बने। फरार होकर किसी तरह अपनी जान बचाई और फिर भारत में उत्तर-पूर्व के मोर्चे पर जापानियों के विरुद्ध लड़ाई के लिए भी गए। ज्यॉफ्री फिर पॉलिटिकल सर्विस में आए । एलेन दंपति आजादी के बाद भी काफी लंबे समय तक भारत में रहे... ज्यॉफ्री पहले भारत सरकार के मुलाजिम के तौर पर और भी चाय बगानों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था इंडियन टी असोशिएशन के अधिकारी के तौर पर।.... और फिर 1970 में भारत छोड़कर एलेन दंपत्ति ब्रिटेन चले गए।




जोआन एलेन की यह किताब सन 1913 से 1970 तक उनके किशोरावस्था/युवावस्था के कुछ सालों को सालों को छोड़कर भारत में उनके द्वारा बिताए गए समय और अनुभव का विवरण है। ब्रिटेन से हजारों मील दूर बिहार के सुदूर इलाके में , जबकि मीलों दूर तक कोई यूरोपीय परिवार नहीं हो, जोआन एलन का बचपना बीता, शादी हुई और फिर बच्चे हुए। यह किताब उस समय के ऐसे यूरोपीय परिवारों-लोगों के मनोभावों, उनके और स्थानीय भारतीय समुदाय के बीच के डायनेमिक्स, स्थानीय सामाजिक स्थिति को जानने का दस्तावेज भी है।

किताब में सन 1934 में बिहार में आए विनाशकारी भूंकप से जुड़े अनुभवों का भी उल्लेख है। जोआन ने लिखा है कि 15 अगस्त 1934 ई. का दिन हमारे लिए काफी डरावना था, उस दिन दोपहर के करीब 2 बजकर 13 मिनट पर भूंकप आया था। "...यह मेरे पिता औऱ मेरे लिए दोपहर के आराम का समय था। उन्होंने लिखा है कि मैं अपने बिस्तर से बाहर जाने के लिए भागी लेकिन जमीन रोलर-कोस्टर की तरह बर्ताव कर रही थी। सामने का लॉन समुद्र की तरह था। वहां घास की सतह की बजाय उसमें तेज लहरें चल रही थी। दो कार जो गैराज के बाहर थे नृत्यरत जोड़े की तरह आगे-पीछे हो रहे थे और जैसे ही नजर उनपर गयी, उसी समय मेरे पैरों के नीचे की जमीन फट गयी, मेरे अगल-बगल दरारें पड़ गयी और इनसे काफी ऊंची गर्म कीचड़ निकलने लगी। मेरे पिता ने हाल ही क्रिसमस में रोलीफ्लैक्स कैमरा दिया था और मैनें सोचा की इसकी तस्वीर लेनी चाहिए और फिर भय की परवाह न करते हुए अंदर जाकर मैं कैमरा ले आई। हालांकि तब तक जमीन से निकल रहे ऊंचे गर्म कीचड़ की तीव्रता काफी कम हो गयी थी।..."



किताब में एवरेस्ट के ऊपर उड़ान भरने के अभियान के पायलट फ्लाइट लेफ्टिनेंट मैक्आइंटर का भी जिक्र है। त्योहारों और दूसरे मौकों पर पंडौल और दूसरे एस्टेट से सभी हाथियों को दरभंगा लाया जाता, जहां महाराज अपने महलों में रहते। महाराज की अगुआई में शहर के सभी ईलाकों में जुलूस निकलता और उच्चाधिकारियों को साथ चलने का आमंत्रण देकर उन्हें सम्मानित किया जाता। जोआन भी जब ऐसे ही एक जुलूस में हाथी की सवारी कर रही थी तो उनके साथ फ्लाइट लेफ्टिनेंट मैक्आइंटर थे जो कि एवरेस्ट के ऊपर उड़ान भरने के अभियान के पायलट थे। दरभंगा महाराज ने हिमालय की तलहटियों में पूर्णिया में अपने एक महल को बेस के तौर पर इस्तेमाल करने के लिए इस अभियान दल को दिया था, जहां से वे एवरेस्ट की फोटोग्राफी के लिए उड़ान भरते।

जब-जब जो जो होना है, तब-तब सो सो होना है । जोआन एलन की किताब - मिस्सी बाबा टू बड़ा मैम- द लाइफ ऑफ अ प्लांटर्स डॉटर इन नॉर्दर्न इंडिया, 1913-1970 की खुद के हाथों में कहानी का सारांश भी यही है।

बिहार में यूरोपीय व्यापारियों-प्रशासकों-यात्रियों के अनुभवों-चित्रों से गुजरते हुए एक रोचक शीर्षक पर जाकर ठिठक गया । किताब का शीर्षक था- मिस्सी बाबा टू बड़ा मैम- द लाइफ ऑफ अ प्लांटर्स डॉटर इन नॉर्दर्न इंडिया. 1913-1970। शीर्षक कुछ हटकर था । किताब की इंंटरनेटी समंदर में तलाश शुरु कर दी । ई-कॉमर्स साइटों पर किताब नदारद थी। ... सोचा सीधे पब्लिशर से ही पता करुं । जोआन एलेन की लिखी इस किताब को प्रकाशित किया है बक्सा, लंदन ने।





बक्सा यानि कि ब्रिटिश असोशिएशन ऑफ सीमेट्रीज इन साउथ एशिया । बक्सा का मकसद दक्षिण एशिया और एशिया की दूसरी जगहों पर पहले की यूरोपीय लोगों की कब्रिस्तानों के रखरखाव और संरक्षण के साथ-साथ इससे जुड़े सौंदर्यीकरण और इसके संबंध में जागरुकता लाने का है। बक्सा की साइट पर इसके द्वारा प्रकाशित किताबों की एक सूची भी है। नजर दौड़ायी तो तो विलियम आर्चर औऱ मिल्फ्रैड आर्चर की सन 1931 से भारत की आजादी तक उनके द्वारा बिहारे में बिताए गए समय से जुड़ी उनकी आत्मकथा ने भी मुझे आकर्षित किया। दोनों ही किताबों के लिए बक्सा से संपर्क किया। जेब हल्की ही रहती है तो किताब सबसे सस्ते पोस्टल सर्विस से भेजेने को कहा। किताब की खरीद राशि का भुगतान करने के लिए पेपाल पर अपना खाता भी खोला । बक्सा वाले बंधु ने कहा कि किताब डिलिवर हो जाए तो भुगतान करिएगा।... लेकिन किताबें डाक-व्यवस्था की रपटीली राहों पर रास्ता खो बैठी।  बक्सा वालों से संपर्क किया तो धैर्य धारण करने की सलाह मिली और साथ में ढ़ाढ़स भी । समय-समय पर डाकखाने की परिक्रमा औऱ डाकिया महोदय से भी दरख्वास्त करता रहा। लेकिन शायद उन किताबों की मंजिल ही कुछ और थी। दुखद यह थी कि बक्सा वालों के पास भी इंडिया सर्व्ड एंड ऑब्जर्व्ड की आखिरी कॉपी ही थी। दुख और ज्यादा गहरा हो गया। महीनों इस तरह गुजर गए , लेकिन उम्मीद का दामन अब भी नहीं छोड़ा सा मैने । कुछ महीनों बाद अचानक से आमेजन पर जोआन एलन की किताब नजर आयी और फिर मैने झट से समय गंवाए बगैर किताब का ऑर्डर कर दिया।

अब बात किताब के रोचक शीर्षक पर। दरअसल मिसी बाबा का संबोधन यूरोपीय किशोरियों-युवतियों के लिए उनके भारतीय नौकरों द्वारा प्यार से किया जाता था, वही बड़ा मैम यरोपीय परिवारों की बड़ी मेमसाहिबों के लिए।

शनिवार, 23 मई 2020

मुड़-मुड़ के ...


कोई भी किताब हाथ लगी और शीर्षक पढ़ने के बाद थोड़ी सी भी उम्मीद झलकी तो सबसे पहले इंडेक्स वाले पन्नों को पलटता हूं । दलसिंहसराय, समस्तीपुर, दरभंगा, बिहार, पटना की तलाश करता हूं... या कुछ और शब्द जो इसके इर्द-गिर्द मंडराते हों। अपने इलाके के अतीत को जानने की जिज्ञासा और कुलबुलाहट किसे नहीं रहती। इतिहास और राजनीति-विज्ञान वैसे भी स्नातक में मेरे विषय रहे हैं। ऐसे में यह जिज्ञासा तो नैसर्गिक है । इधर आजादी से पहले बिहार में समय बिता चुके कई विदेशियों के संस्मरण पढ़े हैं, कुछ अंग्रेज अधिकारियों के अनुभवों को भी पढ़ा है। आमेजन, फ्लिपकार्ट पर भी गाहे-बेगाहे किताबों को ढ़ूंढ़ता रहता हूं।

कुछ सालों पहले इंटरनेट पर विचरते महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह कल्याणी फाउंडेशन की वेबसाइट पर जा पहुंचा। मन प्रसन्न हो गया । कितना कुछ, कितने ही कोनों में हमारे आस-पास होता रहता है और हम उससे अनजान रहते है । वेबसाइट पर फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित किताबों की एक अच्छी-खासी सूची थी और उस पर से तुर्रा यह कि सारी किताबें अपने ही इलाके से जुड़ी । फटाफट कुछ किताबों को दरभंगा से मंगवाने का जुगाड़ भिड़ाया।... और इन्हीं किताबों में से एक है- ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ बिहार – यूरोपियन डिस्कोर्सेस, जिसके लेखक हैं कलकत्ता विश्वविद्यालय में इस्लामिक इतिहास और संस्कृति विभाग में प्रोफेसर रहे श्री अनिरुद्ध रे। किताब में इंट्रोडक्शन यानि परिचय लिखा है पटना विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग में प्रोफेसर रहे श्री सुरेंद्र गोपाल ने।



किताब क्या था...  रहस्यमयी तिलिस्म की चाबी थी या फिर अपने अतीत की पोटली.... आईना था विदेशियों की नजर से सत्रहवीं से उन्नींसवीं सदी के बिहार को जानने का। अग्रेंज, फ्रेंच, जर्मन अधिकारियों, यात्रियों, व्यापारियों, पुजारियों की नजर से देखा गया बिहार । कोई भी विषय, व्यक्ति , स्थान, संस्कृति एकांगी नही होती, बहुपक्षीय होती है। सबकी अपनी-अपनी दृष्टि , अपनी-अपनी पसंदगी-नापंसदगी, अपने-अपने बायसेस ।

लेखक के शब्दों में किताब का उद्देशय सोलहवीं सदी से उन्नीसवीं सदी के शुरुआती सालों में यूरोपीय यात्रियों के लिखे पर नजर डालना है । किताब के शुरुआती अध्याय में बिहार में गतिविधियों के केंद्र के बिहारशरीफ से हटकर फिर से पटना के केंद्र बन जाने की कहानी है। बिहारशरीफ की ओर मुड़ने वाली गंगा नदी की शाखा सिकुड़ रही थी और पटना हुगली से नदी मार्ग और दिल्ली और आगरा से संड़क मार्ग से भी जुड़ा था। ... और फिर पटना शोरा और अफीम के उत्पादन-केंद्र और व्यावसायिक गतिविधियों के केंद्र के तौर पर उभरकर सामने आया।... और हां पटना का बाजार केवल अफीम, शोरे और सिल्क के लिए ही मशहूर नही था, दुसरी जरुरी चीजों के लिए भी यह खरीद-बिक्री के केंद्र के रुप में उभरकर सामने आया था। यह दौर ऐसा था जब आर्मेनियाई व्यापारियों के साथ-साथ डच, पुर्तगाली, अग्रेंज, फ्रेंच व्यापारी पटना के कारोबारी कोने में शोरा, अफीम, सिल्क के लिए एक दूसरे के कंधे से कंधा टकरा रहे थे, जब तक कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने पहले प्लासी और फिर बक्सर के युद्ध के बाद अपनी एकछत्र सत्ता नहीं स्थापित कर ली।

किताब में दिलचस्प जानकारियां है और रोचक प्रसंग हैं। यात्रा के कष्ट, कारोबारी अनिश्चितता और अनदेखी दुनिया का आकर्षण है। कई ऐसे मौकों का भी जिक्र है जबकि वैश्विक राजनीति का असर पटना के कारोबारी कोने पर दिखा , जैसे कि तुर्की के बादशाह के अनुरोध पर मुगल सत्ता ने यूरोपीय कंपनियों के पटना के बाजार से शोरा खरीदने पर पाबंदी लगा दी। और किस प्रकार से यूरोपीय देशों के आपस में बनते-बिगड़ते रिश्तों ने पटना के बाजार पर भी अपना असर दिखाया। किताब पटना की बसावट और बुनावट के बारे में भी बहुत कुछ कहती है। सत्रहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में पटना से सटे इलाकों का जिक्र करते हुए निकोलस डी ग्राफ ने लिखा है कि पटना शहर घने जंगलों से घिरा है, जिसमें राइनोसेरॉस(गैंडें) और दूसरे भारी-भरकम जंगली जानवर पाए जाते हैं।

यह भी कम दिलचस्प नही कि पटना के सूबेदार के बुलावे पर पुर्तगाली फादर परेरा जब पटना पहुंचे और नवाब मुकर्रब खान  से उनकी मुलाकात हुई तो उन्हें पता चला कि नवाब कैथोलिक थे। दरअसल मुकर्रब खान को जब खंभात का गवर्नर बनाया गया तो उसी दरम्यान 1610 ई में फादर पीमेंटा ने ज्यां टुटेफॉइस के नाम के साथ उसे बैप्टाइज किया था । हालांकि दस सालों बाद वो ईसाई तौर-तरीकों से दूर था। सार्वजनिक रुप से वो खुद को मुस्लिम बताता था जबकि निजी तौर पर खुद को ईसाई बताता था।

किताब में समरु का भी जिक्र है... वाल्टर रिनहार्ड सोम्बर उर्फ समरु... स्विस मूल का जर्मन। कलकत्ता में फोर्ट ऑफ विलियम में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के समय हुई ब्लैकहॉल की घटना से तो हम परिचित है, लेकिन पटना के इस ब्लैकहॉल से कम ही लोग परिचित होगें। मीर कासिम और अंग्रेजों के बीच जंग छिड़ गयी थी। मीर कासिम आगे-आगे और अंग्रेज दस्ता पीछे-पीछे। जब अंग्रेज दस्ता पटना के लिए लिए आगे बठा तो मीर कासिम ने समरु को बंदी बनाए गए कंपनी के अंग्रेज अधिकारियों और कर्मचारियों को मौत के घाट उतारने का आदेश दिया। किताब में तीन समकालीन फ्रांसिसीयों की इस संबंध में लिखे का उल्लेख है- जेंटिल, रेने मेडेक और काउंट ऑफ मोडावे। इनमें से ही एक जेंटिल का लिखा विवरण, जो इसी किताब से लिया गया है -

...उसी समय समरु आया। कुछ दूरी से नवाब को सलाम करने के बाद हमलोगों से थोड़ी दूरी पर वो बैठ गया। कासिम अली ने उसे करीब आने को कहा। उसके बैठते ही नवाब ने मुझे जाने को कहा... जैसे ही मैं नवाब के खेमे से निकला , समरु उठा उसने नवाब को सलाम किया और अंगर्जों के कत्लेआम की तैयारी के लिए चला गया।। एक फ्रांसिसी चैट्य्यू ने समरु के आदेश को मानने से इंकार कर दिया... फिर समरु खुद नवाब के आदेश पर अमल करने के लिए निकल गया।... खुले में खाना खा रहे अंग्रेजों पर उसने गोली चलानी शुरु कर दी... पैंतालीस अधिकारी और कर्मचारी इस दुखद घटना में मारे गए। ... - जेंटिल, फ्रांसिसी चश्मदीद

सबसे दाएं-  पटना में मृत अंग्रेजों की याद में स्तंभ, कलाकार- सीताराम (कंपनी कलम)
समरु

किताब को पढ़ते समय मेरी नजर सिंघिया पर जाते ही बरबस अटक गयी। नानीघर रोसड़ा की ओर जब भी जाना होता , सिंघिया से गुजरकर ही जाना होता। सिंघिया तक बस पहुंचती तो दिल को ठंडक मिलती कि चलो बस अब मिनटों की ही बात है। आगे गंडक नदी ... और फिर कुछ मिनटों में रोसड़ा। सन 1731 में डूप्ले जब चंद्रनगर में फ्रेंच कंपनी का डायरेक्टर बनकर आया तो फ्रांसिसी कारोबार को विस्तार देने में जुट गया। सन 1733 ई में उसने पटना में फैक्ट्री लगाने का फैसला किया और फिर ग्रोइस्ले को पटना स्टेशन की कमान सौंपी। दरअसल डूप्ले का मकसद पटना से अच्छी किस्म का शोरा कम कीमत पर खरीदना और फ्रांसिसी सामग्रियों की पटना में बिक्री का था। पटना बंगाल और दिल्ली के साथ भूटान, तिब्बत जैसे दूर-दराज के इलाकों के लिए भी व्यापारिक केंद्र था। बिहार में फ्रांसिसी कारोबार की और ज्यादा पैठ के लिए शोरा खरीदने के लिहाज से ग्रोइस्ले ने छपरा और सिंघिया में फ्रांसिसी लॉज शुरु करने की सिफारिश की। हालांकि ये सिंघिया मेरे नानीघर के करीब वाला सिंघिया ही है या नही है, यह अब भी मेरे लिए रहस्य ही है।

अनिरुद्ध रे की इस किताब को पढ़ने का एक फायदा यह हुआ कि बिहार में अपना समय बिताने वाले और यात्रा करने वाले यूरोपीय लोगों की लिखी किताब की एक लंबी सूची अपने हाथ लग गयी । गाहे-बेगाहे इंटरनेट पर इन किताबों को तलाशता रहता हूं।

भविष्य, वर्तमान, अतीत समरेखीय क्रमिक बिंदु होते हैं। अतीत का निरपेक्ष पाठक स्वाभाविक रुप से ज्योतिषी बन जाता है। आखिर भविष्य के भवन की बुनियाद अतीत पर ही तो खड़ी होती है। ऐसे में इतिहास का अध्ययन न केवल दिलचस्प होता है, बल्कि बेहद जरुरी भी।

खैर अब इस किताब के पीछे का किस्सा । हुआ यूं कि 1998 में दरभंगा में कामेश्वर सिंह स्मृति व्याख्यान देने के लिए डॉ अनिरुद्ध रे को बुलाया गया। रे साहब ने अठाहरवीं सदी में बिहार में आए फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी के अनुभवों और विचारों पर अपना भाषण `थ्री यूरोपियंस इन लेट मेडाइवल बिहार` दिया। ऐसे में जबकि बिहार के इतिहास पर काम करने वाले इतिहासकारों ने फ्रेच श्रोतों पर खासा ध्यान नहीं दिया है , कल्याणी फाउंडेशन ने रे साहब को फ्रेंच और दूसरे अन्य युरोपीय श्रोतों के जरिए बिहार के इतिहास पर काम करने का जिम्मा सौंपा।... और उसकी ही परिणति है - `ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ बिहार – यूरोपियन डिस्कोर्सेस`।


सोमवार, 14 अक्टूबर 2019

शोरा कितना सोना था !!!

शोरा शब्द से परिचित तो था लेकिन रट्टूमल तोते की तरह। विद्यार्थी जीवन में इतिहास की गली से गुजरता तो शोरा शब्द से कई बार दो-चार होता, लेकिन कुछ भी भेजा भिड़ाने के बजाय छलांग मारकर इस शब्द को लांघ जाता। ...आखिर शोरा होता क्या है- फल, फूल, खनिज या खाद्यान्न ? ठोस है या तरल ? मुझे नही लगता सौ में निन्यानवे विद्यार्थी यह जानते होगें। ज्ञान ज्यादातर मामलों में हमारे यहां निगलने, उगलने, और उल्टी करने की सामग्री होती है। मैं सालों तक किराने की दुकान में टिन में मिलने वाले लिसलिसे से पदार्थ छोआ को ही शोरा समझता रहा । मेरी बुद्धि में यह बात कैसे समायी... मालूम नही, लेकिन शोरा पढ़ते ही दिमाग में छोए का आगमन हो जाता।

  सालों भर बाद पता चला कि शोरा कोई ऐरी-गैरी चीज नही, बल्कि धमाकेदार वस्तु है...  शोला पैदा करने वाली सामग्री है... और एक जमाना ऐसा भी था कि जब बिहार के शोरे को लेकर ब्रिटिश, फ्रैंच, डच और अमीर आर्मेनियाई कारोबारी आपस में भिड़े पड़े थे। यूरोप के जंगी इतिहास में बिहार के शोरे ने भी कम चिंगारियां पैदा नही की। दुनिया जब यूरोपीय ताकतों की जंगी कुश्ती का अखाड़ा बन गयी थी, उनकी ताकत लगातार पसर रही थी तो बिहारी शोरे ने उनको बारुदी बरकत दी।

बारूद बनाने के लिए सब से आवश्यक रसायन है शोरा। शोरा वैसे तो फारसी भाषा का शब्द है, लेकिन अंग्रेजीदां लोग इसे साल्टपीटर,  हिन्दी वाले क्षार(खार) और विज्ञान की भाषा बोलने वाले इसे पोटैशियम नाइट्रेटकहते हैं। शोरा एक प्रकार से नमक का खार होता है, जिसे मिट्टी से प्राप्त किया जाता है। वैसे आजकल इसे सोडियम नाइट्रेट और पोटैशियम क्लोराइड से बनाया जाता है । बारूद 3  रसायनों गंधक, शोरा और लकड़ी के कोयले के चूरे को आपस में मिलाकर बनाया जाता था।

यूरोपीय ताकतों का भारत के प्रति आकर्षण केवल मसालों, अफीम, कपड़ों तक ही सीमित नहीं था, उन्हें अपने पसरते साम्राज्य और प्रतियोगी ताकतों से मुकाबले के लिए भरपूर शोरा भी चाहिए था। सत्रहवीं शताब्दी की शुरुआत से  कई यूरोपीय ताकतों जैसे कि पुर्तगाली, डच, अंग्रेज, फ्रेंच, डेनिश ने पूरब से शोरे के आयात के लिए कारोबारी कंपनियां बना डाली थी। ... और फिर यह कारोबार फलता-फूलता गया। बिहार में शोरा उत्पादन का मुख्य केंद्र- हाजीपुर, तिरहुत, सारण , पूर्णिया थे। कंपनी के कारिंदे बिहार के अंदरुनी इलाकों से शोरा को इक्ट्ठा करते और फिर कंपनी की फैक्ट्रियों में इसे और ज्यादा रिफाइन किया जाता। बैलगाड़ियों और नावों में लदकर पहले यह पटना और फिर बड़ी नौकाओं को जरिए हुगली पहुंचता। हुगली बिहार से यूरोप के बीच शोरे के इस सफर का एक बड़ा पड़ाव था।यह जानकारी भी कम रोचक नहीं कि कलकत्ता को बसाने के लिए जाने जाने वाले जॉब चारनॉक ने 1665 ई. में साल्टपीटर यानि शोरे के स्टोरेज के लिए पटना में ईस्ट इंडिया कंपनी के पहले वेयरहाउस का निर्माण करवाया।


बिहार पीजेंट लाइफ- जॉर्ज अब्राहम ग्रीयरसन
दरअसल उत्तर बिहार की जलवायु शोरा उत्पादन के लिए माकूल थी । पशुपालन प्रधान क्षेत्र होने के कारण गांवों के आस-पास की जमीनों में जैवीय नाइट्रेट की अधिकता होती थी। इस जमीन में नाइट्रीकारी जीवाण तेजी से बढ़ते जो अमोनिया को पहले नाइट्रस और फिर बाद में नाइट्रिक अम्ल में तब्दील कर देते। । सूखी घास, लकड़ियां और गोबर बरसात के दिनों में सड़कर जमीन में समाहित हो जाते थे। बरसात के बाद जब जमीन का निर्जलीकरण प्रारंभ होता तब केशकीय क्रियाओं के द्वारा इनका रसायन उभरकर जमीन की ऊपरी परत पर आकर जमा हो जाता है। जमीन या मिट्टी की दीवारों पर सफेद-सफेद सा पदार्थ जम जाता है, जिसे नोनी कहते हैं। जैवीय नाइट्रोजन इस प्रकार पोटेशियम नाइट्रेट में परिवर्तित होकर शोरा बन जाता है।
बिहार पीजेंट लाइफ- जॉर्ज अब्राहम ग्रीयरसन
बिहार में इस शोरा उत्पादन के पीछे थे- बड़ी संख्या में शोरा उत्पादन से जुड़ी नोनिया जाति के लोग। आखिर ये नोनिया है कौन ?  नोनिया जाति के लोगों का पारंपरिक व्यवसाय इसी नोनी मिट्टी को इक्ट्ठा कर इसे परिसंस्करित कर नून यानि नमक बनाने का था। नोनिया न केवल नमक का कारोबार करते थे बल्कि कपड़ों की सफाई के लिए जरुरी नोनी मिट्टी भी लोगों को उपलब्ध कराते थे। (कुछ महीनों पहले यह खबर भी सुनने को मिली कि बिहार सरकार ने मल्लाह और निषाद जाति के साथ नोनिया जाति को अनुसूचित जाति में शामिल करने के लिए एक एथनोग्राफिक अध्ययन के साथ केंद्र सरकार से इस संबंध में अनुशंसा की )

एक कहावत मशहूर थी- बरसा परलो, नोनिया मरलो। कहावत के पीछे की वजह यह थी कि बरसात का पानी जमीन या मिट्टी की दिवारों पर जमा नोनी को अपने साथ बहा ले जाता ।शोरे की मिट्टी इकट्ठा करने और उसे तैयार करने का काम नोनिया करते थे। चूंकि यह मिट्टी नोनी मिट्टी कहलाती थी इसलिए इसे इकट्ठा और कच्चा शोरा तैयार करने वालों को नोनिया कहते थे। मिट्टी की दीवारें पुरानी होने पर नोनी पड़ने से कमजोर हो जाती थी। नोनिया इसे समेट कर ले जाते थे... और फिर इसके परिसंस्करण के बाद शोरा तैयार होता था। कई जगहों पर भी इन अवांछित रसायनों के कारण ऊपर की परत सफेद होती थी, जिस पर कोई फसल उगाना संभव नही था। बड़ी संख्या में नोनिया लोगों की मौजूदगी भी ऐसे में न केवल किसानी के लिए फायदेमंद होती बल्कि नमक जैसी जरुरी और बारुद जैसे विस्फोटक के लिए कच्चा माल बटोरने में भी मददगार होती।

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

जय जय जीएसटी

सुनने में आ रहा है कि जीएसटी लागू होते ही रेलगाड़ियां खुद-ब-खुद समय पर दौड़ने लगी... जो बच्चें कल तक स्कूल का नाम सुनते ही चिल्ल-पौं मचाने लगते थे, आज सुबह उठकर खुद ही स्कूल जाने की जिद करने लगे... अस्पताल में मरीजों की हालत में आश्चर्यजनक सुधार देखा गया ... और जो खाज-खुजली-अपरस-एक्जीमा ग्रस्त थे वे अचानक से पूरी तरह दुरुस्त हो गए... मुंह के छाले, दांतो का दर्द और गले की खराश तो जीएसटी के उच्चारण मात्र से ही गायब हो रहे हैं।
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कल रात करीब साढ़े बारह बजे ऑफिस से वापस घर आ रहा था। मंडावली के पास एक आइसक्रीम वाले का ठेला अभी भी जगा हुआ था। अचानक से टैक्सी ड्राइवर ने अपना दिव्य ज्ञान उड़ेला कि अब तो जीएसटी के बाद सब को जल्दी ही नींद आ जाया करेगी। दिमाग थका हुआ था लेकिन इस दिव्य ज्ञान ने इसके बावजूद उसमें सक्रियता की धारा प्रवाहित कर दी। फिर उसने कुछ इस अंदाज में कि मानो यह ज्ञान उसके पास एक्सक्लूसिव हो, बताया कि जीएसटी के बाद सबको रोटी मिलेगी... फिर क्या है... सब जल्दी सो जाएंगें। मेरे एक सहयात्री भी थोड़े-बहुत जीएसटी विशेषज्ञ निकले... उन्होंने कहा कि इतना तो मुझे नही पता है... लेकिन यह तो तय है कि दिल्ली में भीड़-भाड़ कम हो जाएगी। मेरी जिज्ञासा अब पूरी तरह जाग गयी थी। मैने उनसे पूछ ही लिया- आखिर कैसे ? उन्होंने तत्काल छूटते ही जवाब दिया कि -- जब लोगों को दिल्ली वाली कीमत पर सामान उनके दरवाजे पर ही मिलेगी तो कोई दिल्ली क्यूं आएगा ? जीएसटी के फायदों की फेहरिस्त उतनी ही लंबी है जितनी की इसके विशेषज्ञों के नामों वाली लिस्ट ... वैसे सुनने में तो यह भी आ रहा है कि जीएसटी इस बार मानसून पर अल-नीनो के प्रभाव को बेदम कर देगा... लेकिन जो सबसे बड़ा फायदा सुनने को मिल रहा है वो यह है कि जीएसटी लागू होने के बाद पत्नियों ने अपने-अपने पतियों की बातों पर ध्यान देना और कहीं-कहीं तो मानना भी शुरु कर दिया है।
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(जीएसटी पर मेरे दो फेसबुक पोस्ट)

"उसने कहा था" ...

चंद्रधरशर्मा गुलेरी जी के जन्मदिन के मौके पर आज डीडी भारती पर उनकी मशहूर कहानी `उसने कहा था` पर बनी टेलीफिल्म आ रही थी।... फ्रांसीसी मोर्चे पर जर्मनों से मुकाबले के बीच लहना सिंह(किरण कुमार) जख्मी पड़ा था। टांग और छाती में गोली लगी थी, लेकिन लहना सिंह की जान अपने सूबेदार हजारा सिंह(रजा मुराद) और उसके बेटे भोला में अटकी हुई थी। आखिर सूबेदारनी और 'अपनी लाजो' से लाम पर जाने से पहले उसने एक वादा जो किया था। बचपन में देश की धरती पर जन्मा प्रेम का रंग परदेश में और गाढ़ा हो रहा था। साथी सिपाही वजीरा(पेंटल) फ्रांस की भीषण ठंड के बीच लहना सिंह की कुर्बानी पर जब भी उसे टोकता तो लहना सिंह का जवाब होता- तुम नही समझोगे।
टेलीफिल्म का एक दूसरा दृश्य : लहना सिंह की चाची जब लाम पर जाने की खबर से डर जाती है तो लहना सिंह का जवाब होता है- फौजी को देश की रक्षा वास्ते जंग पर जाना पड़ता है । वहीं नजदीक के गांव में ही सूबेदारनी भी लाम पर जा रहे पति और बेटे को लेकर चिंता में डूबी है। सूबेदार हजारा सिंह का ठसक भरा जवाब होता है- उनका नमक खाया है तो नमकहलाली तो करनी ही पड़ेगी।
टेलिफिल्म के इन दृश्यों से गुजरते हुए बरबस ही उस फेसबुक पोस्ट की याद आ गयी, जिसमें प्रधानमंत्री की इजरायल यात्रा के दौरान उनके हैफा स्मारक जाने की आलोचना की गयी थी। टिप्पणी करने वाले का विरोध इस बात को लेकर था कि हैफा में जर्मनों और तुर्की के सैनिकों के खिलाफ मुकाबले में मरे ब्रिटिश भारतीय सैनिक अग्रेंजों की तरफ से लड़ रहे थे।
क्या देश, राष्ट्र , धर्म, नमक की परिभाषाएं स्पष्ट, स्थिर, निरपेक्ष और ठोस है ? क्या सौ साल पहले और अब इन शब्दों के मायने एक से हैं ? वर्तमान की आंखों से क्या अतीत को न्यायपूर्ण तरीके से देखा जा सकता है ? मुझे लगता है कि हैफा में मरे ब्रिटिश भारतीय सिपाहियों को नीची निगाहों से देखने वालों को ' उसने कहा था' एक बार जरुर देखनी चाहिए।... फिर भी वे नही समझ पाये तो ऐसे में लहना सिंह का जवाब ही दोहराया जा सकता है कि- तुम नही समझोगे।

शनिवार, 3 जून 2017

पुस्तकालय... अनंत संभावनाओं का आकाश

अब जबकि किसी भी किताब की उपलब्धता बस आपके क्लिक करने भर की दूरी और देरी पर है, लोग पैसा भी पहले से ज्यादा खुलकर खर्च करने लगे हैं , फेसबुक-व्हाट्स एप पर काफी कुछ कच्चा-पक्का लोग पढ़ लेते हैं , गुगल महाराज चौबीसों घंटो हुक्म बजाने को तैयार हैं, पुस्तकालय की स्थिति इन नई परिस्थितियों में क्या है। अभी ज्यादा दिन पहले की बात नही है कुछ जागरुक लोगों ने दिल्ली में बंद होते एक पुस्तकालय को आंदोलन के जरिए बचाया था। गाहे-बेगाहे खबर मिलती ही रहती है फलां लाइब्रेरी बंद हो गयी या होने वाली है। क्या पुस्तकालय की कोई जरुरत नही रह गयी है और क्या पुस्तकालय केवल जरुरत भर के लिए है।

 लाइब्रेरी दरअसल है क्या ... क्या केवल किताबों का जखीरा है जो चंद आलमारियों में सिमटी-सजी रहती है। जब हम लाइब्रेरी के खानों को टटोल रहे होते हैं क्या ज्ञात के साथ अज्ञात से भी संवाद करने की कोशिश नही करते हैं। हमारी नजर गाडीं में जुते उस घोड़े के माफिक नही होती जिसके आंखों के बगल में पट्टी लगी होती है, जो केवल और केवल सीधा देखे। हम अपने काम या कोर्स की किताबों के अलावा उन किताबों पर भी एक नजर मार ही लेते है जिनके टाइटल रोचक होते है , आकर्षक होते हैं। इसी दरम्यान किसी ऐसी किताब से भी मुठभेड़ हो जाती है जो आपको वशीभूत है और आप भूल जाते हैं कि आप तो किसी और ही मोती की तलाश में समंदर में गोता लगाने आए थे।

   लाइब्रेरी क्या केवल किताबों का एक ठिकाना भर है, जहां आप किताबों के लिए आए और फिर फुर्र हो गए। मैनें न जाने कितने प्रेम-प्रसंगों को यहां की बेंचों पर जवान होते देखा और दम तोड़ते भी देखा है। प्रेम और पढ़ाई का ऐसा शानदार विलयन यहां तैयार होता है कि उसकी पृथकता की कल्पना कोई कूढ़ मगज ही कर सकता है। विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी के कुछ दैनिक उपभोक्ता तो बस प्रेम की तलाश में ही यहां पर्यटन करने आते थे। फिर प्रेम पनपा नही कि उड़नछू। ऐसे भी जोड़े बनते देखे जिन्होंने आगे चलकर साथ-सात अग्नि के चारों और चक्कर भी लगाए। मुझे लगता है कि इनकी अगली पीढ़ियों को लाइब्रेरी की इन बेंचों का शुक्रगुजार होना चाहिए और कम से कम चार साल में कुंभ की तर्ज पर तीर्थयात्रा पर यहां जरुर आना चाहिए। वैसे बॉलीवुड पर भी इन लाइब्रेरियों का कम अहसान नही है। जब नायक-नायिका प्री-प्रेम स्टेज पर ही होते हैं तो एक दूसरे की नजर बचाते हुए यहां की रैकों और किताबों के बीच छुप्पन-छुपाई खेलते हैं। रैको में सजी किताबें लुका-छिपी का जरिया बन जाती है। यहीं कोई नायिका जानबूझकर अपना रुमाल भूल जाती है जिसे नायक छूटते ही लपक लेता है।

   वैसे कई बार यह भी देखने को मिलता है कि कुछ किताबें जिनकी आपको बेसब्री से तलाश होती है, जो किसी भी वेबसाइट पर अवेलेवल नही होती, दुकानों से गायब होती है, जो आखिरी बार सालों पहले छपी होती है वो लाइब्रेरी के किसी कोने में दुबकी पड़ी होती है।

  लाइब्रेरी से मेरा प्रथम परिचय तब हुआ जब छठी क्लास में हाई स्कूल में पहुंचा, लेकिन तब यह केवल दर्शन भर मामला था। सैकड़ों किताबे लोहे की जाली के पीछे आलमारियों में धूल खाती दिखती लेकिन शायद ही किसी को मैने जाली के उस पार किताबों के करीब पांच सालों के दरम्यान देखा होगा। जब दसवीं में था तो कुछ उत्साही लड़कों ने रीडिंग रुम शुरु किया जहां कभी-कभार जाता रहता था। लेकिन वहां किताबों के नाम पर मोटा-मोटी पुस्तक महल प्रकाशन की कुछ किताबें थी। जहां तक मुझे याद है खाड़ी युद्ध के बारे में और विश्व की 101 कुख्यात हसीनाओं के बारे में भी पहली बार वहीं पढ़ा था।

  सही मायने में पहली बार लाइब्रेरी को पहली बार निहारा मैने पटना में , जब मैट्रिक परीक्षा देने के बाद पढ़ाई के लिए पटना गया। खुदाबख्श लाइब्रेरी में अंदर जाने की तो कभी हिम्मत तो नही जुटा पाया लेकिन उसी परिसर में कर्जन रीडिंग रुम मेरी पसंदीदा जगह बन गयी। दर्जनों की संख्या में अखबार और मैग्जीन ... समंदर ही था मेरे लिए। पहली बार टाइम और न्यूजवीक मैग्जीन वहीं मेरे हाथों में आयी। मई-जून की गर्मी में भी मुसल्लहपुर हाट के नजदीक अपने कमरे से अक्सर कर्जन रीडिंग रुम के लिए निकल पड़ता। बीएचयू आने के बाद तो सेट्रल लाइब्रेरी पसंदीदा ठिकाना बन गया मेरे लिए । हालांकि ऑफिस की लाइब्रेरी तो है ही , लेकिन साहित्य अकादमी लाइब्रेरी की मेंबरशिप भी ली हुई है।

  दरअसल पुस्तकालय संभावनाओं का अनंत आकाश है, जिसमें कोर्स और कार्यालय की सीमितता नही होती। वह एक सार्वजनिक स्पेस होता है जहां हम अपनी सीमाओं को चुनौती देते हैं । इतिहास, संस्कृति, साहित्य, विज्ञान की सैकड़ों धाराएं वहां प्रवाहमान होती है, समंदर सृजित करती है।


शनिवार, 27 मई 2017

अतीत से हमारी बेरुखी का स्मारक है हमारे संग्राहलय ...

संग्रहालय का जिक्र होते ही जो पहली तस्वीर मेरे दिमाग पर उभरती है वो है पटना संग्रहालय में चट्टान हो चुके एक विशाल पेड़ की। हजारों साल पहले का एक पेड़ कैसे चट्टान में बदल गया होगा, दिमाग सोच-सोच कर ही कुलबुलाने लगा था। फिर इस जिज्ञासा पर शायद तभी लगाम लगी जब अपने कोर्स की किताब में कहीं पढ़ा कि कोयला भी एक चट्टान है। हिस्ट्री जब साइंस में घुसपैठ करने लगी तो दिमाग ने फौरी तौर पर राहत पायी। दीदारगंज की यक्षिणी की प्रतिमा भी देखी। देखा तो और भी बहुत कुछ, लेकिन जो दिमाग में बच पाया वो बस इन दोनों की याद ही है। .... वैसे शायद मोहनजोदड़ो में मिले टेराकोटा के बर्तनों को भी देखा था। मेरे बड़े भाई जब दरभंगा में पढ़ रहे थे तो वहां भी एक संग्रहालय में जाना हुआ । ऐतिहासिक महत्व की चीजें उपेक्षित हालत में बिखरी हुई के अंदाज में पड़ी थीं। खैर जब वर्तमान ही बिखरा ही पड़ा हो तो अतीत को वो क्या खाकर छोड़ेगा । मुझे तब तक पता नही था कि मेरे जिले समस्तीपुर में भी कोई संग्राहलय है। संग्राहलय शुरु से ही कुछ इलीट टाइप का मालूम होता था, यानि बड़े शहरी की चीज या चोंचला। वैसे कुछ सालों पहले गूगलिंग की तो पता चला कि अपने जिले में भी एक म्यूजियम यानि संग्राहलय है।

  वैसे इतिहास-वर्तमान-भविष्य तो हर चीज और जगह का होता है। लेकिन मेरे शहर दलसिंहसराय का इतिहास भी कोई कम पुराना और रोचक नही। किवदंतियों की माने तो लाक्षागृह में दुर्योधन की साजिशों को चमका देकर पांडवों ने सुरंग की राह पकड़ी तो सीधे अब के दलसिंहसराय शहर से कुछ ही किलोमीटर दूर पांड में निकले।... और वो राक्षस बकासुर इधर ही कहीं लोगों को परेशान करता था , जिसे भीम ने अपनी बलिष्ठ भुजाओं की चपेट में ले लिया। गाहे-बेगाहे इस इलाके से पुरातात्विक खुदायी की खबरें भी आती रहती हैं। हालांकि भीम की गदा या अर्जुन का धनुष जैसी कोई चीज तो नही मिली है लेकिन नियोलिथिक युग से लेकर बाद के गुप्त-कुषाण काल के अवशेष जरुर मिले है। मन के किसी कोने में एक उम्मीद अभी भी बैठी हुई है कि भविष्य में इस अतीत को वर्तमान अपनी जगह देगा और शायद दलसिंहसराय या समस्तीपुर या खुदाई की जगह के आस-पास कोई बढ़िया संग्रहालय बने।

  खैर म्यूजियम की याद अचानक से इसलिए आ गयी कि कुछ दिनों पहले कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क चरखा म्यूजियम देखने गया। छोटा सा लेकिन काफी खूबसूरत। परिसर में अंदर जाते ही महात्मा गांधी की प्रतिमा और परिसर में ही स्टेनलेस स्टील से बना एक विशाल चरखा और तीन चिर-परिचित बंदर। एक आंखों को बंद किए, एक मुंह को और एक कानों को। बुरा मत देखो, बुरा मत बोलो, बुरा मत सुनो। म्यूजियम भवन के अंदर इतिहास की एक छोटी सी शाखा प्रवाहित हो रही थी । आजादी का आंदोलन , गांधी जी औऱ चरखा... लोग वहां इतिहास से दो चार होते दिखे। भारत सरकार ने लोगों से पुराने चरखे म्यूजियम के लिए डोनेट करने को कहा थे और लोगों द्वारा डोनेट किए भांति-भांति के पुराने चरखे इस म्यूजियम की शोभा बढ़ा रहे हैं।

  जब भी जहां भी मौका मिलता है म्यूजियम घूमने की कोशिश जरुर करता हूं, भले ही कुछ देर के लिए सही। ... लेकिन यह काफी अखरता है कि जब आप म्यूजियम में इक्का-दुक्का लोगों को ही पाते हैं। लोगों की बेरुखी तो देखने को मिलती ही है , अक्सर यह भी देखने को मिलता है कि म्यूजियम का प्रबंधन भी सही स्तर का नहीं होता है। अभी साल भर पहले ही मंडी हाउस के नजदीक नेशनल म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री आग की चपेट में आ गया।
चरखा म्यूजियम

चरखा म्यूजियम

 वैसे म्यूजियम का जिक्र आता है और यदि आप दिल्ली में है तो अक्सर हमारे जेहन नेशनल म्यूजियम ही तैरता दिखता है, लेकिन एक बार गिनती शुरु की जाय तो दोनों हाथों की अंगुलियां कम पड़ने लगती है। ...मंडी हाउस में मेरे कार्यालय दूरदर्शन भवन को अगर केंद्र माने तो इससे तीन-चार किलोमीटर की परिधि में कितने म्यूजियम होंगें... आपको क्या लगता है ? नेशनल म्यूजियम तो खैर है ही लेकिन इतने सारे म्यूजियम होंगें, मैनै सोचा भी न था। दूरदर्शन भवन के ठीक सामने म्यूजियम ऑफ म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंटस है। नेशनल म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री और चरखा म्यूजियम का जिक्र तो पहले ही कर चुका हुं। दूरदर्शन भवन के बगल में भगवान दास रोड पर बढ़ें तो फिर सुप्रीम कोर्ट म्यूजियम की तख्ती टंगी मिलेगी। अगर मंडी हाउस से पटेल चौक मेट्रो पर जाएं तो वहां मेट्रो म्यूजियम की सैर कर सकते हैं। यदि दूरदर्शन भवन के पास भगवान दास रोड पर न जाकर अगले कट पर आगे बढ़ जाए तो आईटीओ पर आपको शंकर डॉल्स म्यूजियम जा सकते हैं। पटेल चौक मेट्रो स्टेशन से कुछ ही दूरी पर फिलाटेली म्यूजियम की और इशारा करता ट्रेफिक वालों का बोर्ड नजर आएगा। सुप्रीम कोर्ट से थोड़ा आगे प्रगति मैदान के पास नेशनल हैंडीक्राफ्टस एंड हैंडलूम्स म्यूजियम है। वैसे दिल्ली में कितने म्यूजियम है इसकी सही-सही जानकारी चाहते है तो फिर आपको गूगल बाबा की शरण लेगी। नेशनल रेलवे म्यूजियम, नेहरू मेमोरियल म्यूजियम, गांधी स्मृति , इंडियन एयर फोर्स म्यूजियम, संस्कृति केंद्र टेराकोटा एंड मेटल म्यूजियम, पुराना किला म्यूजियम, नेशनल पुलिस म्यूजियम, नेशनल चिल्ड्रंस म्यूजियम, इंडिया वार मेमोरियल म्यूजियम, नेशनल एग्रीकल्चरल साइंस म्यूजियम, इलेक्शन म्यूजियम, गालिब म्यूजियम और भी न जाने कितने म्यूजियम है दिल्ली में । और हां दिल्ली में सुलभ इंटरनेशनल म्यूजियम ऑफ ट्वायलेट्स भी है।

शनिवार, 20 मई 2017

घूमते रहो ...

स्लिप डिस्क की गिरफ्त से कमोबेश निकलने के बाद दिल्ली से बाहर की यात्रा का यह पहला अनुभव था । हर अनुभव व्यक्तित्व को समृद्ध ही करता है। स्लिप डिस्क से दो महीनो तक लगातार जूझना भी काफी कुछ सिखा गया । शरीर भले ही बिस्तर पर पड़ा रहता हो लेकिन मन को तो नही बांधा जा सकता । मन की उड़ान पर कौन सी बंदिश लग पाती है। दरअसल हम हर क्षण हर पल किसी यात्रा पर ही होते है ।

    हम एक साथ न जाने कितनी यात्राओं को खुद में समेटे हैं- ज्ञात-अज्ञात । हमारी जिंदगी भी असंख्य समांतर और आरी-तिरछी प्रवाहित यात्राओं में से एक है या कहें तो यात्राओं का समुच्चय है, गुच्छा है । यात्रा अनगढ़ को गढ़ने की, तराशने की प्रक्रिया है । हरिद्वार के पास गंगा की कई धाराएं है, जिनमें कुछ के तल सूखे है ,भांति-भाति के आकार-प्रकार के छोटे-छोटे गोलाकार चिकने पत्थरों से पटे हुए। इन पत्थरों के चिकनेपन और आकार-प्रकार के साथ इनकी यात्रा भी चिपकी हुई है । अनगढ़, रुखे पत्थरों ने गंगा की लहरों के साथ एक लंबी यात्रा की यात्रा के बाद हरिद्वार में सुस्ताने के क्रम में गंगा में अपनी परछाई देखी होगी तो उन्हें भी अपने बदले कलेवर पर अचंभा हुआ होगा।

   यात्रा के दौरान जीवन के विभिन्न और नए-नए आयामों से हम परिचित होते हैं। नदियों की गति, पहाड़ की ऊंचाई, समंदर की गहराई , धूप की तपिश, जंगलों की नरमाई सब यात्रा के विभिन्न पड़ावों पर हमसे दो-चार होते हैं और हमें नए अनुभवों से लबालब कर जाते हैं। जीवन को अनन्त यात्रा ही कहा गया है...  और मनुष्य का इतिहास यात्राओं का इतिहास ही तो है । बचपन से लेकर मृत्यु तक हम यात्रा ही तो करते हैं,  पुत्र से पति और फिर पिता में तब्दील हो जाते हैं। यात्रा की इस अनवरत प्रक्रिया में हमेशा कुछ ग्रहण करते हैं और कुछ त्यागते हैं, और यही जोड़-घटाव ही तो जीवन है।

   दिल्ली से हरिद्वार रिषिकेश के लिए निकल रहा था तो आइटीनरी में कुछ चीजें पहले से तय थी- मसलन हर की पौड़ी पर की आरती का अनुभव करना, चोटीवाले के यहां खाना खाना, राम झूला-लक्ष्मण झूला पर चहलकदमी करना। हरिद्वार पहुंचते-पहुंचते लगभग दिन का एक बज गया। प्लान बना कि चलो सीधे रिषिकेश चोटीवाले के यहां ही चला जाय। सालों पहले गया था और अनुभव ठीक-ठाक ही था। लेकिन इस बार चोटीवाले ने दिल पर चोट कर दिया । खाना औसत से भी खराब और पैसा कहीं से भी कम नही ।मन मार कर और खाने को पेट में झोंक कर बाहर निकले। बस संतोष इस बात का था कि बाहर बैठे चोटीवाले के साथ दो-तीन सेल्फी ले ली। कितना मन बनाकर गया था लेकिन मन मसोस कर बाहर निकलना पड़ा।

   चोटीवाला के यहां से  बाहर निकलकर घाट के किनारे लग गया। मां गंगा अपनी पूरी रफ्तार पर थी। धूप ठीक-ठाक थी लेकिन पानी में ठंडक थी। हम भी पैर लटकाकर इस ठंडक को बटोरने में जुट गए, जब तक कि धूप ने हमें उठने को विवश न कर दिया। कुछ देर तक लोगों को मोटरबोट के जरिए इधर से उधर जाते देखता रहा। कभी-कभी निगाह दूर राफ्टिंग करते लोगों पर चली जाती । फिर मन में पिछली बार की राफ्टिंग की सुनहरी यादें खुद-ब-खुद तैरने लगी । अभी-अभी तो स्लिप डिस्क को मैने बाय-बाय ही किया था ऐसे में राफ्टिंग के बारे में सोचना भी गुनाह से कम न था।

    घाट से उठकर हम राम झूला की तरफ चल गए। लोहे की रस्सियों से तना यह पुल रह-रह कर हिलने लगता , लेकिन डरने जैसी कोई बात नही। दूर लोगों का एक झुंड किस विदेशी जोड़े को पकड़ कर उसके साथ फोटो खिंचवाने में जुटा थ। प्लीज फोटो... वन फोटो। चेहरे की चमक इतनी मानो फोटो खिंचवाने की बजाय कोई मेडल मिलने वाला हो। पता नही हम भारतीयों की यह आदत कब सुधरेगी । रिषिकेश में अभी भी वो सीमेंट की बेंचें दिखी जिसपर लिखा होता है कि कि फलां ने फलां की स्मृति में इसका निर्माण किया। पिछली बार भी इसे नोटिस किया था। अब के समय मे इस तरह का दान-पुण्य होता है क्या ?  
    
   रिषिकेश के बाद सीधे होटल और फिर फ्रेश होकर सीधे गंगा किनारे। रास्ते में बारिश होने लगी और माहौल थोड़ा खुशगवार हो गया। हर की पौड़ी के नजदीक ही एक भवन पर लिखा देखा –बाबरी भवन। इसके पीछे की कहानी जानने की जिज्ञासा तो हुई लेकिन आरती छूट जाने के डर से वहां ठिठक ही पाया, रुक नही पाया। जिज्ञासा को पीछे झटककर आगे बढ़ना पड़ा।  (क्रमश:)

मंगलवार, 9 मई 2017

"दुनिया में कितना गम है, मेरा गम कितना कम है ..."

दो महीने पहले स्लिप डिस्क की चपेट में आ गया। फिर क्या था ... न उठ पा रहा था, न बैठ पा रहा था। लग रहा था कमर पे छिली हुई नुकीली हड्डी लगातार चुभ रही हो। आना-जाना तो दूर चार कदम भी चार कोस से कम नही था मेरे लिए । इन्ही दिनों विमहांस जाना हुआ। डॉक्टर को दिखाकर हॉस्पीटल के लॉन में खून और एक्स-रे की रिपोर्ट का इंतजार कर रहा था। वहां तमाम तरह के मरीज अपनी किस्म-किस्म की बीमारियों और समस्याओं के साथ मौजूद थे। कुछ ठंड के आखिरी दिनों में ताजा-ताजा धूप खाने में लगे थे तो कुछ एक्सरसाइज जैसा कुछ कर रहे थे। पेनकिलर खाने के बावजूद दर्द की तरंगें रह-रहकर मुझे डांवाडोल भी कर जाती थी। लेकिन इसी बीच मेरी नजर करीब तेईस-चौबीस साल के लड़के पर चली गयी। उसका पूरा का पूरा एक टांग गायब था। शक्ल-सूरत और पहनावे से वो अफगानिस्तान या फिर किसी और देश का ही मालूम हो रहा था। शायद किसी विस्फोट की जद में आ गया था या फिर किसी दुर्घटना का शिकार हो गया हो। उसके दो-तीन रिश्तेदार या परिचित कुछ-कुछ देर में उसे कृत्रिम पैर के जरिए चलने में मदद करते। मेरा ध्यान रह-रहकर उसके चेहरे पर चला जाता। मेरा खुद का दर्द कुछ समय के लिए मानो गायब सा हो गया और यह सोच-सोच कर ही मैं सिहर जाता कि उसके दिमाग में क्या-क्या चल रहा होगा, उस पर क्या बीत रही होगी । कई लोगों को उसके परिचितों से बात करते भी देखा, लोग-बाग उससे अपनी सहानुभूति भी प्रकट कर रहे थे खासकर महिलाएं। मेरी किसी से कुछ पूछने की हिम्मत नही हुई। सालों पहले किसी किताब के शुरु के पन्ने पर 'गांधी जी का जंतर' शीर्षक वाली एक छोटी सी टिप्पणी पढ़ी थी, अचानक से उसकी याद आ गयी।... वैसे स्लिप डिस्क का अच्छा-खासा असर अब भी है, लेकिन वो अभी उतार पर है। शायद दो-तीन हफ्तों में चलने-फिरने लायक हो सकूं।

“किताबें करती हैं बातें...”

डीडी भारती पर एक कार्यक्रम आता था –किताबनामा। जिसमें किताबों और लेखकों की बातें होती। मुझे जो सबसे अच्छी चीज लगी वो थी उसका टाइटल-ट्रैक। जिसकी एक खुबसूरत पंक्ति थी- किताबें करती हैं बातें। सफदर हाशमी की लिखी ये लाइन जब भी कानों में घुलती, मन सच में काफी प्रसन्न हो उठता। किताबों से की गयी खुद की बातें जेहन में कौंधने लगती।

   जब भी कोई पाठक किसी कहानी, उपन्यास , कविता को डूबकर पढ़ता है तो एक तरीके से वो उस किताब को कुछ समय के लिए जीने लगता है। उसके पात्रों से संवाद करता है, खुद को उन पात्रों के रुप में कल्पना करने लगता है। कहानी में पात्रों की गति-दुर्गति के अनुरुप हंसने-रोने लगता है। उनकी किंकर्तव्यविमूढ़ता पर क्रोधित होता है । रोमांटिक उपन्यास हो तो पाठक प्रेम में डूबा नायक बनकर डूबता-उतरता है और आजादी के आंदोलन की पृष्ठभूमि हो तो उसकी भुजाएं फड़कने लगती है। कभी-कभार ऐसा भी होता है कि कहानी-उपन्यास तो वह कब का पढ़ चुका होता है लेकिन उससे निकलने में उसे एक अरसा लग जाता है। ऐसा भी नही ह सब कुछ कल्पना के स्तर पर ही होता है, उसका कुछ रिस-रिस कर हमारे व्यक्तित्व की परतों में भी समाहित होता जाता है।  हम अक्सर सफल व्यक्तियों के लेख पढ़ते हैं जिसमें वो जिक्र करते हैं कि किस तरह से कुछ किताबों ने उनकी जिंदगी पर गहरा असर डाला।

    किताबों का चस्का मुझे शुरु से रहा। चस्का कब और कैसे लग गया, मालूम नही। जरुरी नही कि हर चीज समझ में आए ही फिर भी कोई नयी किताब दिखने पर हाथ में ले ही लेता हूं। पहली किताब जो हाथ में आयी वो शायद मनोहरपोथी ही होगी। जहां तक याद हैं उसमें वर्णमाला का बोध कराने वाले शब्द थे, चित्र के साथ। बचपन में अक्सर नई किताबें कम ही हाथ में आती। बच्चें जब अपने से बड़ी वाली क्लास में जाते तो पुराने क्लास की किताबों को अधिया यानि कि अंकित मूल्य से आधे पर उन बच्चों को बेच देते जो कि उस क्लास में प्रवेश करते। पैसा तब अफारात में नही था इसलिए अभिभावक भी अधिया या तिहाई में ही बच्चों के लिए किताब खरीदने की कोशिश करते। नई किताबें तब ही खरीदी जाती जब पुरानी किताबें उपलब्ध नही होती, जिसके मौके कम ही आते थे। एक बार हुआ ऐसा कि पुरानी किताब के शुरु के कुछ पन्नें गायब थे। पापा ने फिर किसी और बच्चे के किताब से उन अध्यायों को सफेद पन्नों पर लिखा और उन पन्नों को पुरानी किताब के बाकी बचे पन्नों के साथ सील दिया।

    कोर्स की किताबों और कॉमिक्स के अलावा किताबों के नाम पर हमारा एक रुपए वाली क्वीज की किताबों से ही पाला पड़ा था। अक्सर बस या मिनी बस में जाते हुए या मेले-ठेले में यह किताब अवतरित होता। इस क्वीज बुक के सवाल भी अजीबोगरीब होते, मसलन- किस मछली के शरीर से करंट निकलता है, किस मछली के दो ह्रदय होते हैं, कौन सा पेड़ रात में चलता है टाइप। किताब बेचने वाला भीषण गर्मी में तरबतर इन इन सवालों की ऐसी मुनादी करता मानो कि अफ्रीका के रेगिस्तान से लेकर प्रशांत महासागर की लहरों के बीच से होकर अभी-अभी टाटा407 में अवतरित हुआ हो।

   एक बार हमारे मोहल्ले के बच्चों को बुक बाइंडिंग का शौक लगा। बुक बाइंडिंग एक तरीके से मोहल्ले में सक्रांमकता की हद तक फैल गया। कोई भी किताब दिखती हम उसे बाइडिंग की कैंद में जकड़ने को व्याकुल हो उठते। कपड़े की दुकान से कूट लेकर आते और फिर आटे से लेई बनाते। बड़ी सुई के सहारे किताब और कूट में स्ट्रेटेजिक प्वाइंट पर छेद किया जाता और मजबूत धागों को उनसे गुजारा जाता। फिर किताब की तीन तरफ से कटिंग , लेई और खास कपड़े से उसकी बाइंडिंग की जाती । किताबों से जुड़ी इतनी सारी यादें और बातें हैं कि उनके जिक्र की देर भर होती है कि यादें भरभराकर आंखों के सामने जमा होने लगती हैं। (क्रमश: )
   

गुरुवार, 4 मई 2017

“लिखते-लिखते लव हो जाय...”

मुझे लिखना पसंद है... कलम से लिखना । मैं तब भी लिखता रहता हूं, जब लिखने की कोई जरुरत नही होती, कोई मतलब नही होता ...और कुछ नही तो अखबारी किनारे के खाली जगहों पर कुछ भी लिखता रहता हूं ,जिसका कोई औचित्य नही होता। अब तो वैसे भी कलम से लिखने का कोई ज्यादा स्कोप नही बचता। दफ्तरों में आजकल साइन और नोटिंग करने के अलावा अधिकांश काम-काज कंप्यूटर पर ही हो जाता है। हालांकि ऐसा नही है कि बाजार से कलम गायब हो गए हैं। स्टेशनरी की दुकानों पर दर्जनों ब्रांड और टाइप के कलम सजे जरुर मिलते हैं और खूब बिकते भी हैं। लेकिन लोगों को लिखने की आदत और जरुरत को कम होते देखकर मैं अक्सर सोचता हूं कि कलम के भीतर की इतनी सारी स्याही कहां खर्च होती होगी। मुझे तो अक्सर लगता है कि लोग ऊब कर दूसरी नयी कलम खरीद लेते होंगें या फिर रखे-रखे कलम का इंक जम जाता होगा या फिर आदतन वो इंक शर्ट या पैंट की जेबों में बह जाते होगें।

    पहली कलम कौन सी मेरे हाथों में आई यह तो याद नही लेकिन पहले चॉक वाली पेंसिल और फिर कठपेंसिल के जरिए हमने लिखना सीखा, यह जरुर याद है। शुरु में इस्तेमाल किए जाने गए पेनों यानि कलम के जो पहले ब्रांड की मुझे याद आती हैं- वह है ओपल के पेन। दूसरे साधारण से दिखने वाले पेनों की जगह ओपल के पेन खुबसूरत लगते। ज्यादातर हरे या कत्थई रंग के । अभी के उलट उस समय कोई भी लीड या रिफील किसी और पेन में लग जाती। यदि रिफील के लिए ज्यादा पैसे नही होते तो डेम्पों और लोकल ब्रांड की रिफील, नही तो आपको शानदार अनुभव चाहिए तो फिर लिंक 1500 । डेम्पो के साथ खासियत यह थी कि वो बीच-बीच में सुस्ताने लगती फिर उसे दोनों हथेलियों के बीच रखकर रगड़ना पड़ता जबकि लिंक 1500 पन्नों पर सरपट भागती रहती। डेम्पो बेचारा सस्ते में यानि पचास पैसे में और लिंक 1500 एक या सवा रुपए का होता। फिर एक बार लिखो-फेंको कलम भी खूब ट्रेंड में आया।... और टीप-टपुआ पेन को कौन भूल सकता है भला । टीप-टपुआ पेन भी दो प्रजाति के थे। एक जो केवल लिखने के लिए इस्तेमाल में आते थे और एक वो जो लिखने के साथ-साथ खाली समय में हम बच्चों के हथियार में तब्दील हो जाते। टीपने यानि उनके ऊपर वाले सिरे को दबाने के बाद उनमें ऊपर के सिरे पर ही खाली जगह बन जाती और फिर बच्चे उसमें कागज ठूंस देते। फिर क्या था पेन वाली स्वीच दबाने के साथ ही कागज में संचित स्थैतिज उर्जा गतिज उर्जा में परिवर्तित हो जाती और फिर यह गतिज उर्जा विपक्षी खेमे पर जमकर आघात करती।

   हालांकि इंक वाले पेन भी थे, जिसकी नीब अक्सर असावधानी की वजह से खराब हो जाती। पहले सुलेखा ब्रांड के इंक और फिर चेलपार्क के इंक से हम इंकड्रॉप के सहारे कलम के पेट मे उसकी खुराक डालते। समस्या तब आती जब इंक के पेन चलने से इंकार करने लगते और हम उसे झटककर उसे चलते रहने को मजबूर करते। पेन तो चलना फिर से शुरु कर देती लेकिन अक्सर खुद के शर्ट-पैंट खराब हो जाते तो कभी साथियों के शर्ट-पैंट उसकी जद में आ जाते।

   फिर अचानक से एक झोंका ऐसा आया कि डेम्पो, ओपल, लिखो-फेंको, सुलेखा, चेलपार्क सब उसकी चपेट में आ गए। रिनॉल्डस, लिखते-लिखते लव हो जाय वाला रोटोमेक, मोनटेक्स , मित्सुबिशी, खुशबू वाला टुडे दर्जनों ब्रांड और टाइप-टाइप के हमें देखने को मिलने लगे। हर कलम की अपनी खूबी थी। मसलन मित्सुबुसी पेन के पेट के आखिरी सिरे पर रुई जैसा कुछ ठूंसा हुआ होता, रोटोमेक का पेन चलते-चलते उल्टी करना शुरु कर देता, टूडे के पेन काफी कलरफुल होते। हालांकि बताता चलूं कि हमारे सीएच स्कूल में जहां से मैनें मैट्रिक की, वहां के बेंचों में लोहे की छोटी टोपियां लगी हुई थी, जिसमें किसी जमाने में विद्यार्थी इंक रखकर सरकंडे की कलम से लिखा करते होंगें। लड्डू बाबू हमारे हिंदी के टीचर थे। हम भी अच्छी हैंडराइटिंग के लिए उन टोपियों में इंक डालकर सरकंडे की कलम कम से कम एक पन्ना सुलेख लिखते और लड्डू बाबू को दिखाते।

  वैसे स्कूल के दौरान हमारे क्लास में बच्चों की अपनी-अपनी पसंद थी और वो अपनी-अपनी पसंद से डिगने को कतई तैयार नही थे। हमारे क्लास में कुछ रिनॉल्डस के खेमे में थे तो कुछ रोटोमेक के खेमे में तो कुछ अभी भी पुरानी डेम्पो-ओपल वाली परंपरा के वाहक थे ।कोई भी अपनी पसंदीदा पेन की बुराई सुनने को तैयार नही होता और सुनना ही पड़ता तो चट से बोल पड़ता कि अब तो इस पर हाथ बैठ गया है। मैं अपनी बात करूं तो शुरुआत में मैंने मोनटेक्स के कलम का आसरा लिया फिर रिनॉल्डस के 045 का और फिर मैट्रिक-इंटर-ग्रैजुएशन तक 045 और रिनॉल्डस जेटर के आस-पास ही चक्कर काटता रहा। हालांकि शायद ग्रैजुएशन तक सैलो प्वॉयनटेक का आगमन हो चुका था, जिसकी कुछ सालों तक मुझे लत लग गयी। फिर काफी दिनों तक सैलो ग्रीपर का इस्तेमाल किया। वैसे अभी की बात की जाय तो ज्यादातर पायलट हाइ-टेक प्वाइंट ,रिनॉल्डस ट्राइमेक्स और रिनॉल्डस 045 के बीच झूलता रहता हूं।

रविवार, 15 जनवरी 2017

जाने कहां गए वो दिन...

जिंदगी के हाइवे पर काफी कुछ पीछे छूटता जा रहा है । भागमभाग वाली जिंदगी में जबकि दुनिया के सारे तार एक दूसरे से जुड़ते दिख रहे हैं पर्व-त्योहार भी सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट वाली थ्योरी के चपेट में आते दिख रहे हैं। कितने त्योहार हैं बचपन के, जो अब अतीत का हिस्सा होते जा रहे हैं। जूड़शीतल, अनंत चतुर्दशी , तिल सकरात यानि मकर संक्रांति जैसे त्यौहार जिंदगी की आपाधापी में पीछे छूट रहे हैं। होली-दिवाली-दुर्गापूजा तो खैर बाजार की चहेती हैं लेकिन बाकी त्योहारों का दिवाला निकलता दिख रहा है।

   जमाना इंस्टेंट का है, यानि सब कुछ तुरंत का। अब किसे फुरसत है मकर संक्रांति से दसियों दिन पहले चावल, चूड़ा, तिल , मक्का, मूंगफली लाने और फिर कंसार जाकर उसे भुनवाने का। हम बच्चे मकर संक्रांति का साल भर इंतजार करते। हमारे स्कूल के बगल में ही कंसार हुआ करता, हम बच्चे किसी बर्तन, सूप या दौड़ी में चावल,चूड़ा, मक्का समेट कर कंसार पहुंच जाते और अपनी-अपनी बारी का इंतजार करते है। कंसार में एक बड़ा सा मिट्टी का चूल्हा रहता जिस पर एक ही साथ कई मिट्टी के बर्तनों में चावल-चूड़ा आदि भूने जा रहे होते। कंसार को चलाने वाली महिला कभी चूड़ा-चावल पर ध्यान देती तो कभी धीमी पड़ती आग को बढ़ाने के लिए और सूखी लकड़ी और पत्ते चूल्हे के हवाले करती। जब तक वह भूना नही जाता हम बच्चों की पूरी मौज होती। मकर-संक्राति के दो-तीन पहले से ही लाय और तिलवा बनना शुरु हो जाता। बाजार से गुड़ लाया जाता और फिर चूल्हे या गैस पर उसको गलाया जाता। नजदीक में रहने वाली बुआ या फिर रिश्तेदार की या पड़ोंस की महिलाएं भी आती। फिर पिघले गुड़ में भूने चावल-चूड़ा-मक्का को मिलाया जाता। हम बच्चों को इस मिक्सचर को मुट्ठी में भर कर लाय बनाने में खूब मजा आता। कई शामें हमारी ऐसी ही गुलजार रहती। लाय बनाने का यह क्रम तो कभी-कभी मंकर-संक्रांति के दिन तक जारी रहता।

     मकर-संक्रांति की शुरुआत सुबह-सुबह नहाने से होती। मम्मी सुबह पांच-छह बजे ही हमारी नींद की दुश्मन हो जाती। हम फिर काफी लानत-मलामत के बाद कुंए और फिर बाद के दिनों में ट्यूब-वेल के पास जल्दी-जल्दी नहाकर अपना कर्तव्य निभाते । नहाने के साथ ही हम झट से दादी वाली मिट्टी की बनी बोरसी की शरण में आ जाते ,जिसमें लकड़ी या कोयला जल रहा होता और हम आग तापने में जुट जाते। फिर हम घर के बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद लेते और उनके हाथों से तिल लेकर आग में तिल का दान करते, जिसे हमारे यहां तिल बहाना कहा जाता। मम्मी फिर गया का तिलकुट, खुशबू से लबालब तुलसीफूल चूड़ा और स्वादिष्ट सब्जी और भांति-भांति के लाय हमारे लिए लेकर आती। फिर तो पूरा दिन ही अपना होता। पूरी दोपहर अपने चाचाओं और करीबी रिश्तेदारों के घर हम चौकड़ी भरते,  तिल बहाने के बाद लाय और तमाम चीजें हमें खाने को मिलती। दोपहर ढ़लते ही घर पर कार्टून पैक होना शुरु हो जाता। सभी तरह के लाय, चूरा और तिलकुट कार्टून में पैक होते है। फिर हम और हमारे चचेरे भाईओं का जत्था कार्टून से लैस होकर बुआओं के घर के लिए कूच कर जाता।

    घर से दूर बुआ के घर हम बच्चों की खूब धमा-चौकड़ी होती। अब घर से दूर दिल्ली में मकर संक्राति का त्योहार यादों की परिधि में सिमटती जा रही है।  सच में... कहां गए वो दिन...।


रविवार, 19 जून 2016

उपन्यास, अजनबी, आंसू ... और जवान होता रिश्ता...

ऊंघते दिनों में जबकि दोपहर सर पर होता ,ग्राहक गली से बाहर आने से परहेज करते, मैं कई दुकानदारों को मोटी-मोटी किताबों में सर घुसाए हुए देखता । पढने के उनके सामर्थ्य और ललक को देखकर चौंधिया जाता । हम ठहरे विद्यार्थी... बस्ते में किताब होना हमारी मजबूरी ठहरी। दोपहर की घंटती बजती तो सीधे मैदान में... और दोपहर शुक्रवार का हो तो फिर पूछिए मत, खेला पूरे डेढ़ घंटे चलता। गेंद फेंका-फेंकी से लेकर पिट्टो तक सारे खेल खेल-खेल कर पस्त होकर ही वापस लौटते। पढाई उतनी ही करते जितनी क्लास में मास्टर साहब पढ़ा देते और ट्यूशन वाले मास्टर साहब से डांट नही सुननी पड़ती।  लेकिन इन पढ़ाकों के हौसले और जज्बे को देखकर सलाम करने को मन करता। कई बार पान की गुमटी और तंबाकू की दुकानों पर ऐसी भारी-भरकम किताबें पड़ी मिलती। लगता कि पढ़ाई-लिखाई का ठौर-ठिकाना केवल स्कूल ही नही है। इसी जिज्ञासा का परिणाम था कि उपन्यास शब्द ने मेरे शब्दकोष में अपनी जगह बनायी। आकर्षण अभी बाल्यावस्था में ही था कि उपन्यास के जन्म-जन्मांतर के शत्रु अपने-अपने बिलों से बाहर निकलते मिले। किसी ने कहा-निठल्ला पुराण है तो किसी ने बेरोजगारी से इसका द्वंद्व समास यानि लोटा-डोरी वाला रिश्ता बताया। यानि कुल मिलाकर विरोधी पक्ष की बातों का सार यह था कि यह कोढ़ का कारण तो है ही उसका लक्षण भी है। उपन्यास के प्रति उपजा आकर्षण गर्भ में ही मृत हो गया ... हालांकि यह भी कह सकते हैं कि सुसुप्त हो गया। (बाद में पता चल इन भारी-भरकम पोथों को लुग्दी साहित्य भी कहते हैं।)

       साहित्य के नाम पर पाठ्यपुस्तकों से इतर दसवीं तक मैने कोई झांका-झांकी नही की। किताब-पत्रिका की दुकान पर पाठ्यपुस्तकें जहां आलमारियों में गरिमामयी अंदाज में जमी रहती, वहीं इंडिया टूडे, माया, प्रतियोगिता दर्पण से लेकर सरस सलिल आगे मेज पर पड़ी रहती। एकाध बार कनखियों से सरस सलिल को देखा जरुर था। तब तक सरस-सलिल बदनाम पत्रिका के तौर पर युवा और अधेड़ जगत में अपनी प्रतिष्ठा पा चुकी थी। उड़ती-उड़ती चर्चाएं तो खूब सुन रखी थी लेकिन उसके पन्नों तक पहुंचने से पहले ही हिम्मत जबाव दे देती, ऊंगलियां खुद-ब-खुद सिकुड़ जाती और फिर पड़ोस में लटके इंडिया टूडे को इस प्रकार टटोलने लगती कि किसी को मेरी मंशा पर सुई भर का भी शक न हो।

       हालांकि छठी से लेकर दसवीं तक की बिहार बोर्ड की पाठ्यपुस्तकों में मशहूर लेखकों की कहानियां और कविताएं पढ़ी थी। नागार्जुन की 'अमल-धवल गिरी के शिखरों पर बादल को घिरते देखा है' वाली कविता पाठ्यपुस्तक का हिस्सा थी, सुदर्शन की कहानी 'हार की जीत' को छठी क्लास में चाव से न जाने कितनी बार पढ़ा था। हिंदी के हमारे टीचर थे- लड्डू चौधरी । क्लास में खड़ा करवा-करवा कर हर किसी से एक-एक पैरा पढ़ने को कहते । मुझे याद है कि सातवीं क्लास में किसी कहानी के एक पैरा की शुरुआत में डार्लिंग शब्द था और क्लास के बच्चे इस जुगत में थे कि इस पैरा को पढ़ने के लिए उनका ही नंबर आए। वैसे पढ़ने के लिए तो लालू-चालीसा भी पढ़ा था- 'कुंदन राय मरछिया देवी, के संतान, जगत तुम खेवी'। लेकिन मोटे तौर पर यह था कि मेरे लिए साहित्य से संबंध पाठ्यपुस्तकों की परिधि में ही गोल-गोल घूमता रहा।

      बारहवीं के बाद पटना से बनारस पहुंचने के बाद उपन्यास से पुनर्परिचय हुआ ... और इस बार जो रिश्ता बना वो समय के साथ और-और जवान होता जा रहा है। हुआ यूं कि बीए फर्स्ट ईयर के शुरुआती दिन थे। पहली बार घर से दूर एकदम छूट्टा टाइप हुए थे। कोई रोकने-टोकने वाला नही। दिन में क्लास जाओ और शाम में कॉमन-रुम में टीवी भकोसो। फिल्म,न्यूज,गाना जो भी चले भकोसते रहो। रात के खाने के बाद तमाम तरह की फिल्में कॉमन रुम में चलती । चलती तो फिर रुकने का नाम न लेती। कुछ वीर-बांकुरे सुबह गोधूलि-बेला तक फिल्म का पान करते। ऐसे ही दिनों में एक मित्र जो कभी-कभार होस्टल में आतिथ्य फरमाते गुनाहों का देवता लेकर अवतरित हुए। हम भी पूरे फ्री थे। संयोग से मांगने पर उन्होंने अपनी आदत के विपरित वो किताब दे भी दी। एक बार जो बैठे उठा ही नही गया। सुधा, विनती, चंदर में ही घूमने लगे। अक्षय कुमार, विपाशा बसु वाली फिल्म अजनबी कॉमन रुम में चलनी शुरु हो चुकी थी। अगल-बगल के कमरे खाली हो गए थे ... और मैं रोया जा रहा था । सुधा और चंदर का दुख मेरे अंदर धंस सा गया। शुक्र था कि पूरी की पूरी लॉबी वीरान थी और कोई संयोगवश भी मेरे कमरे में नही आया । किसी ने यह नही पूछा कि मेरा कोई स्वर्ग सिधार गया है क्या।  यह उपन्यास से मेरे रिश्ते की शुरुआत थी। उपन्यासों के अजनबी पात्र अब अपने लगने लगे।