बुधवार, 27 मई 2015

जर्मनी को जुकाम और दलसिंंहसराय की करवट ...

जर्मनी और दलसिंहसराय के बीच की दूरी कोई मामूली नही है। दलसिंहसराय से दिल्ली ही करीब सवा हजार किलोमीटर है। आखिर ऐसे में किसी जर्मन के दिमाग में कोई खुजली हो तो फिर दलसिंहसराय में बैठे शख्स को क्या शिकायत होगी या फिर उसकी क्या उत्सुकता होगी ? खैर अभी तो इंटरनेट है, पनिया जहाज से लेकर हवाई जहाज पर सवारी आसान हो गयी है। लेकिन सौ साल से भी पहले की सोचिए , जब समदंर पार का सफर भी पाप था, धर्म भ्रष्ट हो जाता था। तब किसी जर्मन के दिमाग की किस जुगाली ने दलसिंहसराय वालों की जिंदगी ही कमोबेश पलट कर रख दी हो, बड़ा बदलाव किया हो । शायद बात केवल दलसिंहसराय का ही नही बहुत कुछ इस विशाल देश की भी है । कह सकते है कि समय का एक चक्र होता है, चीजें बदलती रहती है। कहने वाले कह गए हैं – जो आया है सो जाएगा, राजा-रंक-फकीर। दलसिंहसराय भी गवाह बना एक बड़े वैश्विक चक्र का। जब यूरोपीय ताकतें एक दूसरे से ज्ञान-विज्ञान से लेकर रणभूमि में एक-दूसरे से उठापटक में लगी थी, हजारों मील दूर एक कोने में बलान नदी के किनारों पर भी हलचल हुई।

हालांकि जर्मनी और दलसिंहसराय के एक सदी से भी पुराने इस रिश्ते पर मेरी नजर पिछले करीब दो दर्जन से भी ज्यादा सालों में नही गयी थी। लेकिन इधर की कुछ हलचलों के बीच अचानक ही एक दिन इस रिश्ते का आभास हुआ, जब मैं आंखमूंदकर बेसब्री से नींद की तलाश में अतीत-वर्तमान-अनदेखे भविष्य की धमनियों-शिराओं में प्रवाहित हो रहा था। इधर के दिनों में मेरे कई नए-पुराने रिश्तेदारों के साथ कई मित्रों ने भी जर्मनी के विभिन्न शहरों म्यूनिख, बर्लिन, बॉन का रुख किया है ।

   खैर हुआ यूं कि उन्नीसवीं शताब्दी के अंत होते-होते जर्मनी ने कृत्रिम तरीके से नील बनाने में महारत हासिल कर ली और इसकी चपेट में दलसिंहसराय भी आने से बच न सका, जहां के नील की ख्याति कुछ कम नही थी। दलसिंहसराय प्राकृतिक नील उत्पादन का बड़ा केंद्र था इसके सबसे बड़े नील फैक्ट्रियों में से एक की क्षमता तो करीब 22 हजार क्यूबिक फीट की  थी। बर्नाड कोवेंट्री एक नीलहे साहब हुए जो यहां नील की खेती से जुड़े थे और दलसिंहसराय के नील से जुड़े उपक्रम में उनका मालिकाना हक भी था। ख्याति ऐसी कि कॉवेंट्री प्रोसेस कही जाने वाली प्रक्रिया से तैयार होने वाले उत्कृष्ट नील की वजह से नील जगत में दलसिंहसराय कलर-फैक्ट्री के रुप में जानी जाती थी। इस इलाके में और आस-पास ब्रिटिश प्लांटर्स यानि निलहे साहब किसानों से नील की खेती करवाते और भारी मुनाफा बटोरते। लेकिन सिंथेटिक नील की बढ़ती लोकप्रियता ने नीलहे साहबों को होने वाले मुनाफे का बंटाधार कर दिया। 

नील फैक्ट्री और दलसिंहसराय नील को मिले अवॉर्डों की तस्वीरें
                                                    तस्वीर : साभार-इंटरनेट
 हालांकि नील इतना महत्वपूर्ण क्यूं है यह मैं आज तक समझ नही पाया। सिवाय बचपन से इन बातों के देखने कि यह सफेद बनियान को आकाशी रंग देता है और भक्क सफेद स्कूल वाले बुशर्ट को नीला बना देता है। हो सकता है और होगा ही कि इसके और भी ढ़ेर सारे काम होगें, लेकिन अपना पाला तो इन्हीं एक-दो मामलों में इससे पड़ा है। इतना याद है कि शायद पहले रॉबिन नील और फिर चार बूंदों वाले उजाला ने घर के एक अंधेरे कोने में अपनी जगह बना ली। हालांकि इस बात पर तो मेरा संदेह आज तक कायम है कि उजाला ने कभी मेरे बनियान-बुशर्ट में उजाले का संचार किया हो ।

नील की फैक्ट्री का एक दृश्य
तस्वीर : साभार-इंटरनेट
खैर उन्नीसवीं शताब्दी के अंत होते-होते सिंथेटिक नील ने अपनी जगह बनानी शुरु कर दी और प्राकृतिक नील को कड़ी चुनौती मिलनी शुरु हो गयी , ठीक उसी तर्ज पर कि जब स्पिनिंग मशीन और पावरलूम के आविष्कार ने भारत को कपड़ों के निर्यातक की जगह उसका बड़ा आयातक बना डाला, कपड़ा उद्योग की कमर तोड़ दी । हालांकि ऐसा नही है कि प्राकृतिक नील ने सिंथेटिक नील के खिलाफ मुकाबले में दो-दो हाथ आजमाने से परहेज किया , लेकिन होनी को कौन टाल सकता है भला । दलसिंहसराय में ही कुछ नीलहे साहबों ने नील की फसल को और बेहतर बनाने के लिए साल 1899 के जुलाई महीने में बर्नार्ड कोवेंट्री साहब की देख-रेख में एक रिसर्च स्टेशन बनाया जहां नील की पैदावार और इसका प्रभाव बढ़ाने के लिए कई प्रयोग शुरु हुए। वैज्ञानिकों हैंकॉक, लीक और ब्लॉक्सम ने दलसिंहसराय के इस रिसर्च स्टेशन में नील से जुड़े अनुसंधान किए। नील से जुड़े नीलहे साहबों की लॉबी भी एक बड़ी वजह थी जिसकी वजह से इसी इलाके में पूसा में इंपीरियल एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट अस्तित्व में आया जो बाद में सन 1934 की भूकंप की वजह से आजकल इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट के रुप में दिल्ली के टोडापुर इलाके में विराजमान है। खैर नील की खेती को बेहतर बनाने के सिलसिले में पूर्वी एशिया में जावा द्वीप तक का चक्कर लगाया गया और नील की एक बेहतर किस्म को दलसिंहसराय और इसके आस-पास के इलाके में आजमाने की कोशिश की। यह रिसर्च स्टेशन आगे के कुछ सालों तक अनुसंधान में जुटा रहा और इससे कुछ निष्कर्षों तक पहुंच पाने में भी वैज्ञानिकों ने सफलता पायी थी। लेकिन सिंथेटिक नील से मुकाबला असंभव सा हो गया था।
बी कॉवेंट्री साहब के संबंध में 1915 में छपी जानकारी
                                                                तस्वीर : साभार-इंटरनेट
हालांकि सिंथेटिक नील , पावरलूम जैसे आविष्कारों की वजह से ब्रिटिशों की नजर में भारत का महत्व किस परिमाण में छीजता जा रहा था और इसने सन 47 में उन्हें वापस अपने मुल्क लौटने के लिए कितना प्रेरित किया होगा, यह तो खैर इस मामले के विशेषज्ञ-विश्लेषक ही बता सकेंगें लेकिन मुझे लगता है कि इसका भी इसमें कुछ न कुछ अंशदान जरुर होगा , लेकिन इसमें कोई शक नही कि हजारों-हजारों मील दूर जर्मनी में अविष्कृत हुए सिंथेटिक नील ने दलसिंहसराय के इतिहास में एक नया मोड़ लाया होगा।

मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

जगदलपुर- अनगिनत भारतीय संस्कृतियों का कटान-बिंदु

बचपन में गणित पढ़ने के दौरान हममे से शायद ही कोई होगा जिसने वृत न बनाया हो। एचबी पेंसिल थामे डिवायडर और सफेद कागज यानि कि कच्चा माल मिला नही कि खूबसूरत वृतों का उत्पादन झमाझम शुरु। अपनी रिपोर्टिंग के पंचवर्षीय काल में खूब घूमने-फिरने को मिला। तीन हजार किलोमीटर लंबे और कमोबेश इतने ही चौड़े भारत का केंद्र क्या हो, यह सवाल अक्सर इन यात्राओं या फिर कभी किसी एकांत क्षण में फूटता। गुगल महोदय से कई दौर में दरियाफ्त की , कुछ जानकारियां सामने आयी। मसलन कि अंग्रेज नागपुर को भारत का केंद्र घोषित कर गए और इस लिहाज का एक पत्थर भी इसके सीने पर टांक गए। मसलन की उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर की घड़ी पूरे भारत का समय बताती है। लेकिन भारत बस भूगोल नही है,भारत संस्कृतियों का समुच्चय भी है। चीन की दीवार छलांगने में बस अब गिनती के ही कुछ दिन है। यहां से खाद-पानी पाती सभ्यताओं का एक लंबा इतिहास और वर्तमान है। ऐसे में यह जिज्ञासा लाजिमी है कि भारत की परिधि में मौजूद विभिन्न साभ्यातिक वृतों का आपस में कटान बिंदु क्या हो ?
जीरो माइल- नागपुर

साल 2009, आधुनिक भारत का सबसे बड़ा त्यौहार चुनाव दिल्ली से करीब डेढ़ हजार किलोमीटर दूर छत्तीसगढ़ में अपने परवान पर था। जगदलपुर के चांदनी चौक पर होटल बस्तरिया में यह मेरा तीसरा सप्ताह था। दीपावली गुजर चुकी थी और छठ दरवाजा खटखटा रहा थी। आम तौर पर प्रवासी बिहारी छठ को वापस अपने शहर-गांव एक नजर मारने का मौका नही चूकते। लेकिन दिल्ली से बने रहने के ऑर्डर की नाफरमानी कैसे कर पाता। छठ के दिन की शाम चाय की अनगिनत प्यालियों के साथ होटल के कमरे में ही कट गयी। लेकिन बेइंतहा इंतजार वाली सुबह इस बार अपने नसीब में नही थी, लेकिन सालों की आदत जाती कहां है। ब्रह्ममुहुर्त में ही नींद के प्राण उखड़ गये । अंधेरा छटने के इंतजार में शरीर कसमसाने लगा। दूसरे दिनों की तरह भांति-भांति के अखबार कोंचियाए आने को ही था कि अच्छी खासी संख्या में लोग छठ वाली दौरी सर पर रखे लौटते दिखे। मन ही मन माथा ठोकने लगा कि छठ अटैंड करने का एक खूबसूरत मौका अपनी हाथों से मैने कैसे आसानी से निकल जाने दिया। वो कहते हैं न कि सावधानी हटी , दुर्घटना घटी। यह तो पता था कि बिहारी मूल के लोग ठीक ठाक संख्या में यहां हैं , लेकिन छठ की बात दिमाग से गुजर नही पायी।





बस्तर दशहरा
वैसे भारत के नक्शे पर गौर फरमाए तो यह अंदाज लगाने में ज्यादा मुश्किल नही होगी कि जगदलपुर भारत के उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम के चौहारे पर जमा है। बगल के कोरापुट से ओडियाभाषी इलाका शुरु हो जाता है वहीं बस्तर कमिश्नरी और तेलुगूभाषी खम्मम भी अड़ोस-पड़ोस में है। वैसे व्यापार के सिलसिले में आए और फिर बस गए जैन/माड़वाड़ी व्यापारी भी अच्छी खासी तादाद में जगदलपुर और बस्तर कमिश्नरी के दूसरे छोटे-मोटे कस्बों में है। और जहां तक आदिवासी संस्कृति की बात है तो बस्तर इसके कुछ अंतिम पते-ठिकानों में से है। यानि कि जगदलपुर शहर में आपको हिंदी भाषा भाषियों के साथ, तेलुगू, ओडिया, मराठी और आदिवासी समाज के अनगिनत भाषाओं को बोलने वाले एक साथ ही मौजूद मिलेंगें।

करीब एक महीना नागपुर में रहा हूं और अच्छा खासा समय महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश और इससे सटे भारत के मध्य के इलाके में गुजार चुका हूं । ऐसे में कोई जिज्ञासु तमाम भारतीय सभ्यताओं के कटान बिंदु के बारे में मेरी राय ले तो मैं नागपुर से करीब 500 किलोमीटर पूर्व जगदलपुर पर ही मुहर लगाउंगा।


सोमवार, 14 अक्टूबर 2013

एक स्वर्णिम इतिहास की कब्र पर उगा जंगल है पटना ...

पटना की बीमारी के पीछे का पैथोजेन यानि रोगाणु हर नए टीके को भकोस लेता है , म्यूटेट हो जाता है  । टीका बेचारा चकमा खा जाता है, बीमारी है कि मौजूद रहती है , खिलखिलाती है ,बस उसका हुलिया बदल जाता है । दरअसल सामाजिक न्याय की कई तगड़ी खुराकों को पस्त कर देने का नाम है पटना।

साल 2005 , करीब पंद्रह साल के बाद पटना का हुक्मरान बदल दिया गया। वजह साफ थी , सालों पहले जिस चेहरे ने राज्य बदल देने की बात की थी , वो खुद ही बदल गया। बाकी देश जहां अर्थव्यवस्था के हवाई सफर पर था , बिहार बदहाली की नई कहानी रच रहा था। ब्राह्मणवाद का विरोध कर लालू पटना की गद्दी पर बैठे और बिहार को विकास का भरोसा दिलाया था। लालू की दूसरी पारी की पहली तस्वीर कई ब्राह्मणों से कई किलो फूलों का माला गले में गटक जाने की थी। सामाजिक न्याय के मसीहा की इस बदली तस्वीर ने मगध की चिरपरिचित शांति पर सामाजिक न्याय मार्का मुहर लगा दी। कोट और हैट पहने लालू बिहार की तरक्की के लिए विदेश फिरते तो दिखे, लेकिन जमीं पर तरक्की का कोई निशान भी न छोड़ पाएं। ... लेकिन मगध अपने चेहरे पर चिरपरिचित शांति लपेसे अपनी जगह पर जमा रहा। सामाजिक न्याय की नयी फसल इक्का दुक्का जाति ने अपनी मनमर्जी से काटकर अपने दरवाजे पर रख ली।

साल 2005 को पैदा हुई उम्मीद भी अब मूर्च्छित हो चली है। बीते कुछ सालों से अफवाह गर्म थी कि राज्य रास्ते पर चल पड़ा है । देश भर की अखबारें पटना में सूर्योदय की खबरों से पटी पड़ी थी। लेकिन अभी दशक भी नही गुजरा था कि लगने लगा कि मगध की चिरपरिचित शांति की लपटों ने पाटलिपुत्र का दामन नही छोड़ा है। अभी कुछ दिनों पहले की ही बात है , लक्ष्मणपुर-बाथे कांड के आरोपी पटना की ऊंची अदालत द्वारा बरी कर दिये गये। एक साल के नवजात से लेकर बुढ़े-बुर्जुगों तक की हत्या के मामले में प्रशासन अदालत की नजर में सही सबूत नही पाया। लक्ष्मणपुर बाथे का यह मामला और आरोपियों का बरी होना कोई अकेला मामला नही है। मियांपुर, बथानी टोला , नगरी जनसंहार में आरोपियों के बरी होने के मामले के साथ इसे देखा जाना जरुरी है। आखिर ऐसा क्यों हैं कि राज्य समाज के कमजोर तबके को न्याय दिलाने में नाकाम होती दिख रही है।

दरअसल मगध की शांति के नव महारथियों के तिकड़म उस वक्त नुमाया हो गए जब हजारों की भीड़ आतंक मचाती पटना पहुंची और पटना की छाती पर चढ़कर सत्ता को खुलेआम मुंह चिढ़ाया । पटना का प्रतिरोध नदारद था। पटना दब्बू साबित हुई, हुक्मरान नजर चुराते रहे। सत्ता के सीने पर उत्पात मचाती यह भीड यह वो भीड नही थी जेपी के बुलावे पर गांधी मैदान आ जमी थी। ना इस भीड़ का सचिवालय के सामने की उन आदमकद मूर्तियों से कोई साम्य था जो सन बयालीस के आंदोलन में आजादी के लिए होम हो गयी । इस घटना ने 2006 में पैदा हुई उम्मीदों के आगामी पराभव का संकेत दे दिया था। इस भीड़ की मौजूदगी पटना के बीमार होने का बयान था।  उस बीमार पटना का जिसके पैरो तले की जमीन उन सभ्यताओं और महामानवों की कब्रों से पटी पड़ी है जिन्होंने हजारों साल पहले दुनिया भर के लोगों को अचंभित कर दिया था। यह भीड़ उन मुखिया जी की मौत पर तांडव मचा रही थी जिन्होंने गर्भ में पल रहे बच्चों के कत्ल को यह कहकर जायज ठहराया कि इससे नक्सलियों की नई खेप पैदा होगी। यह महज दुर्संयोग नही है कि इन मुखिया जी के हत्यारे भी पाटलिपुत्र की जेल की बजाय हवा में है। दरअसल मगध की शांति सही और गलत के बीच चयन का जोखिम नही पाल सकती। वह तो क्षुद्र स्वार्थों से संचालित होती है।

आवासीय और प्रवासीय दोनों ही टाइप के बिहारी अक्सर बातचीत में बुद्ध, महावीर से लेकर चंद्रगुप्त , अशोक के बिहार की धरती से संबंद्ध होने का हवाला देते है। शिक्षा की चर्चा होती है तो नालंदा, विक्रमशीला पर गर्वान्वित होते हैं। दरअसल वर्तमान की बदतरी का दलदल उन्हें इतिहास का आश्रय लेने को मजबूर करता है। खुद को दिलासा देने और सामने वाले के सवाल से उबरने को वे इस डिफेंसिव मैकेनिज्म का इस्तेमाल करते हैं।

और वैसे भी उस पटना से क्या उम्मीद की जाय, जिसकी पहचान गोलघर है। सेना के लिए बना गोदाम , जिसके जन्मदोष ने उसे कहीं का न छोड़ा, दरवाजे बाहर की बजाय अंदर से खुलने वाले। कूपमंडूक पटना का सौ फीसदी सटीक प्रतीक है गोलघर।

बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

राइट टू रिजेक्ट का इस्तेमाल यानि कि आप कायर हैं ...

1.आप राहुल भैया को भी वोट नही देंगें , आप नरेंद्र मोदी के घोर विरोधी हैं , आप `आप` वाले केजरीवाल को किसी लायक नही मानते , आप सपा, बसपा को भी वोट नही देंगें , निर्दलीय पर भी मुहर नही लगाएंगें , आप राइट टू रिजेक्ट पर बटन दबाएंगें ... दरअसल आप पलायनवादी है ... आपको मुफ्त की खाने की बीमारी है ... जब इतना ही असंतोष है तो चुनाव में खड़े हो जाइए और यदि बचना ही चाहते हैं तो अपने आस पास के किसी शख्स को जो आपकी नजर में परफेक्ट हो उसको मैदान में लाइए ... वरना इतना याद रखिएगा राइट टू रिजेक्ट वाले बटन का इस्तेमाल आपकी कायरता का प्रमाण पत्र है, और कुछ भी नही ... इस थोथेबाजी का कोई मतलब नही कि कोई भी आपके मानदंडो पर खरा नही ... हम कम से कम इतना तो कर ही सकते है कि उम्मीदवारों की तुलना कर कम बुरे इंसान को लोकतंत्र के मंदिर में स्थापित करें । राइट टू रिजेक्ट वाला बटन नकारात्मकता का परिचायक है ... और आपके पास इसके लिए यदि समाज की बेहतरी का तर्क है तो फिर फिर इतना तो याद रखना ही होगा कि बेहतर समाज का निर्माण सकारात्मक प्रयासों से ही संभव है।

2.आप राइट टू रिजेक्ट वाला बटन दबाएंगें क्योंकि आपके मुताबिक सारे अयोग्य हैं , आप चुनावी मैदान में भी नही उतरेंगें क्योंकि आपके मुताबिक फिर आपको ब्लैक मनी के समंदर का गोताखोर बनना पड़ेगा (और आप तो ईमानदारी की प्रतिमूर्ति हैं न, ऐसा पाप कैसे कर सकेंगें) ... कोई नया मैदान में आएगा तो कहेंगें कि वोटकाटू हैं या फिर हो न हो यह भी अपनी गाड़ी का डीजल चुनाव के बाद वसूलेगा ... आप ही सोचिए आपके पास जब कुछ नही करने के अनगिनत तर्क है, अनेकों मजबूरियां हैं तो उनका क्या जो चुनावी दंगल में चित-पट में लगे हैं ... ऐसे में आपके राइट टू रिजेक्ट वाले बटन का इस्तेमाल आपके स्वार्थपने को साबित करेगा कि जो आजन्म ईमानदार दिखने का स्वार्थ भी पाले हुए है और सामने वाले को गरियाने-गलियाने का मौका भी नही छोड़ना चाहता ... राजनीतिक दल समाज से अलग किसी बियावान जगत की पैदावार नही है , वो आपकी इन्हीं छद्म ईमानदारी और स्वार्थपने की फसल काट रहे हैं ... इसलिए बेहतर उम्मीदवार पर मुहर ही एकमात्र विकल्प है ... और वो एक कहावत तो आप जानते ही हैं - आप बदलिए , जग बदलेगा ।

(फेसबुक पर किए दो अपडेटों का समुच्चय)

न्युरॉनों से मनुहार

तंत्रिका तंत्र के 
करोड़ों न्यूरॉनों के गुच्छों में
न जाने कौन सा गुच्छा
सुस्त हो गया है
या फिर सुप्त हो गया है
कि हंसी और हताशा 
दोनों ही हालातों को बयां करने में
चेहरा असमर्थ होता है

शरीर की भाव-भंगिमा
चेहरे का चाल-चलन
और मन के बीच का स्वाभाविक विद्युत-प्रवाह
समय के चक्रव्यूह में
अभिमन्यु बन चुका है

द्रोणाचार्य विपक्षी खेमे में है
अर्जुन को आवाज लगाई जा रही है।

सोमवार, 30 सितंबर 2013

चुनार बरास्ते मिर्जापुर – समय सुस्त , इतिहास पस्त

82.5 डिग्री पूर्वी देशांतर , मिर्जापुर, उल्टा प्रदेश , इंडियन स्टैंडर्ड टाइम वाली रेखा यहां से गुजर जाती है , बिना किसी हरहर खटखट के। लेकिन मिर्जापुर की सड़कों और गलियों में समय कमोबेश ठहरा सा ही लगा। उत्तर-पूर्व वाले न जाने कब से चिल्ला रहे हैं भाई कब करोगे बदलाव। न जाने कितने असंख्य घंटो की लाश बिछाई है यहां के घंटाघर ने । कहते हैं कि कलियुग है , कोई फरियाद नही , कोई न्याय नही और वैसे भी अमरीकी असीम न्याय से तो आप वाकिफ हैं ही। पिछले साल द वीक में रिपोर्ट पढ़ी मिर्जापुर के कलॉक टावर पर समय रुक गया है। यानि इस घंटाघर को इस घनघोर अपराध का दंड इसी जमाने में मिला। घंटाघर पर टंगी घड़ी मर चुकी है, अब कोई टिक-टिक नही , पिछले करीब दर्जन भर साल से। आश्चर्य कि हम अब भी इस मरी घड़ी के चक्कर में चकरा रहे है। खैर ... अपना अपना दुर्भाग्य।

दरअसल इतिहास में ताकाझांकी का लालच हमें मिर्जापुर खींच लाया था । मिर्जापुर मेरे लिए दरअसल वो टाइममशीन थी , जिसमें घुस जाउं , वर्तमान को गच्चा दूं और इतिहास में गोता लगाऊं। इतिहास कुछ मेरा वाला और कुछ राजा-महाराजा-बादशाहों-हाकिमों वाला। जिन लोगों ने नीरजा गुलेरी की चंद्रकान्ता से बचपन की शुरुआत की हो , चुनारगढ़ का जिक्र उनके मानवी शरीर में चुनचुनी या फिर खुजली तो जरुर पैदा करेगा। बात उस दिन की कर रहा हूं जब पता चला कि चुनार कुछ दर्जन भर किलोमीटर पर है। आपसे क्या छिपाना, खूंखार शिवदत्त, मासूम कलावती , चालू तारा , पंडित बदरी और सेनापति सोम सब खूबसूरत बचपन का हिसाब मांगते दिखे। कलावती का अथाह प्रेम , शिवदत्त-तारा का प्लैटोनिक रिश्ता , चाणक्य का चुनारी संस्करण बदरीनाथ , सोमनाथ की लॉएल्टी ... न जाने इनने दिल-दिमाग के कोनों को कितना एक्सपैंड किया , इसे कूतना सरासर नमकहरामी होगी ।

जब समझदारी शैशवावस्था में ही थी , हम मालवीय जी की बगिया बीएचयू में घुसपैठ कर बैठे। ठीक उसी दिन जब बैंडिट क्वीन वाली फूलन देवी कत्ल कर दी गयी। फूलन को बंदूक उठाए हमने अपने बचपन में तब देखा था जब दलसिंहसराय में लक्ष्मी कचड़ी वाले के सुबहिया दुकान पर आलूदम खाने पहुंचे। माथे पर लाल पट्टी लपेटे फूलन वाला पोस्टर कचड़ी-आलूदम के खोमचे से सटी दीवार पर चिपका पड़ा था। खैर बात यह है कि यह फूलन भी मिर्जापुर वाली है।

खैर बीएचयू में चर ही रहे थे कि पता चला बगल में ही नौगढ़, विजयगढ़, चुनारगढ़ विराजमान है। गर्दन के नीचे खुजली मचने लगी। एक सुबह आठ-दस दोस्त कूच कर गए शिवदत्त-तारा-कलावती की तलाश में। इतिहास ग्रेजुएशन में सब्जेक्ट था तो इतना तो पता चल ही गया अपने सासाराम वाले शेरशाह को दिल्ली का शाह बनाने में चुनार ने कोई कम कंट्रीब्यूट नही किया। ... तो हम मिर्जापुर की सड़क पर थे, चुनार वाले किले के पथ पर।

... और आप तो जानते हैं कि हमलोग अतुल्य भारत वाले हैं। खोदा पहाड़ निकली चुहिया मार्का। चुनार पहुंचे और सारी दिल-दिमाग की सारी चुनचुनी शांत हो गयी। दीवारें दरकी हुई, किले का कारागार मानवीय नायट्रोजन से गंधाया हुआ और आस-पास का हर 5 से 50 बरस वाला इतिहासकार इरफान हबीब । पहुंचने के साथ ही इतिहासकारों की युवा टोली ने चारों तरफ घेरा डाल दिया । हमलोग भी होशियार। पंद्रह रुपए के पैकेज में चुनार के इतिहास को समझाने-समझने का करार हुआ। अब देखिए एक पर एक गोला – फलां जगह पर धर्मेंद्र का घोड़ा हिनहिनाया , फलां जगह पर राजा साहब नाच देखते थे और फलां जगह पर रानी नहाती थी। शिवदत्त, कलावती और तारा तो खैर गायब थे ।लगा मानो चुनारगढ़ की चहारदीवारी के भीतर इतिहास का कत्ल हो चुका हो और लाश भी मौके से गायब कर दी गयी हो। इक्का-दुक्का संरचनाएं बची थी , और जो बची थी उनके कत्ल के भी पूरे इंतजामात थे।यानि कुल मिलाकर मामला ऐसा था कि चुनार के इतिहास, वर्तमान और रहस्य पर चूना पोता जा चुका था। (यादें)




बुधवार, 25 सितंबर 2013

गोलघर , तुम तो धोखेबाज निकले …

ईस्ट इंडिया कंपनी के इंजीनियर जॉन गार्स्टिन ने शायद सपने में नही सोचा होगा कि उसकी गलती को पटना अपने सर-माथे उठा लेगा। वारेन हेस्टिंग्ज भी नरक में बैठा हंस पड़ेगा, जब उसे मालूम होगा कि हजारों साल के समृद्ध इतिहास को समेटे पाटलिपुत्र की पहचानों में उसके द्वारा बनवाया गया अनाज का वो गोदाम भी है जो उसने सेना के लिए अनाज जमा करने के मकसद से बनवाया था । ... और खैर मेगास्थनीज तो अपना सर ही पीट लेगा , जो चंद्रगुप्त मौर्य के काल में पाटलिपुत्र पहुंचा और मगध की राजधानी की ठाठ-बाट देखकर दंग रह गया ।  आखिर आप ही बताइए दिल्ली का कुतुब मीनार और लाल किला , आगरा का ताजमहल , कलकत्ता का विक्टोरिया की तर्ज पर पटना की पहचान गोलघर से हो ,कितना जायज है।

जॉन गार्स्टीन
बचपन की बात है । जी. के. की किताबों में मन खूब रमता था। रट्टा मारकर राज्य राजधानी रटने से सफर जो शुरु हुआ वो अब भी बदस्तूर जारी है। समय के साथ सामान्य ज्ञान (जी के) की किताबें भी बदली। पहले वीणा बिहार दर्पण की जगह उपकार मिनी सामान्य ज्ञान , और फिर उपकार डायजेस्ट और फिर भारी भरकम सामान्य ज्ञान दिग्दर्शन और आगे न जाने कितने अगड़म-बगड़म । यानि बाहर की अनंत दुनिया ने शुरु से ही आकर्षित किया। लेकिन दो चीजें शुरुआत से ही जम गयी। पटना का गोलघर और कलकत्ता का विक्टोरिया। लेकिन तब दलसिंहसराय से बाहर की मंजिल या तो अपना पुश्तैनी गांव पान पतैली था या फिर नानीघर रोसड़ा यानि सारा मामला अपने जिले की चौहद्दी के भीतर का।

जब भी पटना दूरदर्शन पर शाम का बुलेटिन आता स्क्रीन पर गोलघर लटकता दिखता, रोजाना के इस दूरदर्शनी दर्शन के बीच गोलघर के लिए आकर्षण तीव्र से तीव्रतर होता गया। भांति-भांति की बातें सुन रखी थी इस मुए गोलघर के बारे में । सुन रखा था कि गोलघर पर चढ़िए तो पूरा पटना साक्षात दिखता है। हालांकि पटना कितना दिखता है , इस पर भिन्न-भिन्न संप्रदायों के अलग-अलग दावे थे। किन्हीं का आधा तो किंन्ही का पूरा दिखने का दावा , और वो भी पूरे प्रामाणिक आंकड़ों के साथ। इन्हीं परिस्थितियों में एक दूर के रिश्ते के जीजा जी अवतरित हुई , जिनके भाई साहब पटना में डॉक्टर बनने को कोशिशरत थे। मौका माकूल था , हम भी पटना गमन के लिए उनके साथ संलग्न हो गए।

अब पटना तो पहुंच गए लेकिन गोलघर ले जाने से हमारे जीजा जी मुकर गए। मामला सरासर धोखे का था, लेकिन आखिर फरियाद किससे की जाय। तीन-चार दिन गुजर गए। सामने के कब्रिस्तान को देख-देखकर दिमाग मुरझाने लगा। हालांकि इतना बड़ा कब्रिस्तान भी मेरे लिए किसी अजूबे से कम नही था। आखिरकार जीजाजी के भाई के रुम पार्टनर को मुझ पर तरस आ गया। एक दोपहर कब्रिस्तान को घूर ही रहा था कि अचानक गोलघर के लिए कूच के दिव्य वचन उनके मुख से फूट पड़े । कमरे के कोने में पड़ी सायकिल को पुचकारा गया। हैंडल और सीट के बीच की पाइपनुमा पर टंगकर न जाने कितनी गलियों से गुजरकर पहले गांधी मैदान और फिर गोलघर पहुंचा। गर्मी के दिन थे। धूप आसमान से बरस रही थी। मुश्किल से दर्जन भर दर्शनार्थी होंगें। कुछ सीढ़ियों पर, कुछ गोलघर के ऊपर तुलसी-चौरा जैसी बनी संरचना के इर्द-गिर्द और एक-दो मलाई बरफ वाले ठेले के आस पास धूप से झोंटा-झोंटी करते। बालू और ईंटें इधर-उधर बिखरी हुई थीं। धूप ने पहले ही दिमाग के तरल को सोख लिया था, लेकिन सालों से जो इच्छा मन में कुलबुला रही थी उसने इन कमजोर क्षणों में ग्लूकोन-डी की खुराक दी।

किसी तरह ऊपर चढ़ा , धूप का तीखापन त्वचा को पारकर हड्डियों तक पैठ गया। नजर इधर-उधर की, एक तरफ गंगा मैया लहरा रही थी तो एक तरफ गांधी मैदान पसरा हुआ था। तुलसीचौरा जैसी सरंचना पर शरीर टिकाकर गोलघर को महसूस करने लगा । इस स्तूपाकार संरचना के शीर्ष पर बैठा-बैठा इतिहास और वर्तमान को मथने लगा। फिर खुद ब खुद भीतर से सवाल फूटा- आखिर गोलघर की जिद किस लिए ? ठग लिये जाने का भाव दिल-दिमाग में उफान मारने लगा, जैसे आपने दाम तो दूध वाली कुल्फी के दिए हों लेकिन कुल्फी वाला आपको रंगीन पानी वाला थमाकर चला गया हो। आखिर क्या है इसमें ऐसा कि पटना की पहचान गोलघर से की जाय । पांव के अगल-बगल गुटखेबाजी के निशान जमकर थे। मधु और शिखर की पन्नियां बिहार में प्रचलित ब्रांडों का एलान कर रही थी। सीढ़ियां मरम्मत की मांग कर रही थी। गोलघर की दीवारें पुताई को तरस रही थी। अंदर जाने का दरवाजा न जाने किस जमाने से बंद था। अगल-बगल की हालत किसी दूरदराज के गांव के प्राइमरी स्कूल की याद दिला रहा था।


गोलघर के हाथों मिले इस धोखे ने मन खट्टा कर दिया । वो कहते हैं न, रहा भी न जाय और सहा भी न जाय , वही वाली बात हो गयी। यानि बिल्कुल शादी का लड्डू टाइप वाला मामला ठहरा , खाए तो भी पछताए और न खाए तो भी पछताए।

सोमवार, 23 सितंबर 2013

हर कब्र पर रखा पत्थर सफेद क्यूं हैं ?

अभी ज्यादा दिन नही गुजरे जब अमेरिका के पैट्रिक और कैथरीन रैडिक ने अपनी मां की मौत पर खुशी जाहिर की । अखबार में अपनी `श्रद्धां`जलि में उन्होंनें लिखा कि मां की मौत के बाद उन्होंने `डिंग-डौंग, द विच इज डेड` गाकर जश्न मनाया । आपकी हमारी पहली प्रतिक्रिया  इस पर क्या होगी ?  शायद हम उन्हें मनोरोगी करार दें। हममें से अधिकांश लोग ऐसे होंगें जो किसी मृतक के दर्शनोपश्चात सीने पर दांया हाथ रखकर बुदबुदाते हैं कि भगवान इनकी आत्मा को शांति दें। फिर आखिर क्या वजह होगी इन रैडिक भाई-बहनों ने बकायदा अखबार में प्रकाशित करवाया कि उनकी मृत्यु पर हम जश्न मनाते हैं और दुआ करते हैं उनकी मां मौत के बाद के जीवन में हर उस दुख को झेले जो उनने अपने बच्चों यानि उन पर ढ़ाए। यह `श्रद्धां`जलि दरअसल इनके लिए इन पर ढ़ाए गए जुल्मों के बदले के समान था। पैट्रिक रैडिक के मुताबिक यह `श्रद्धां`जलि चाइल्ड एब्यूज के खिलाफ उनकी अभिव्यक्ति है। इस चर्चित `श्रद्धां`जलि की बात दुनिया भर में फैली। आखिर लिपे-पुते , ऑल वाज वैल मोड वाले श्रद्धांजलियों के प्रचलन के बीच यह अजूबे जैसा जो था।

इस श्रद्धांजलि ने कई प्रश्न भी खड़े किए हैं। किसी की मौत के बाद मूल्यांकन का तरीका क्या हो ? क्या इतिहास  पर चूने की सफेदी मार देनी चाहिए ? भले-बुरे, सही-गलत को एक ही तराजू से तौलना कितना सही है ?  लीपा-पोती मार्का श्रद्धांजलि क्या बुराई को प्रोत्साहित नही करेगी और अच्छाई हतोत्साहित नही होगी ? और फिर ईमानदारी की मांग करते इस वैज्ञानिक समय में किसी के बारे में आखिरी विचार व्यक्त करते वक्त बेईमानी क्यूं बरती जाय ?

बीते साल की बात है, बाल ठाकरे जी गुजर गए। श्रद्धासुमन अर्पित करने वालों की भीड़ उमड़ पड़ी। शवयात्रा कई चैनलों से लाइव टेलीकास्ट की गयी। मातोश्री से इंटरनेटी दुनिया तक लोग इस `महामानव` की दर पर मत्था टेकते नजर आए। लेकिन श्रद्धांजलियों के इस समंदर में इस इतिहास को मानो डुबो दिया गया कि किस तरह दक्षिण से लेकर पूरब तक के गरीब मजदूर-टैक्सीवाले-रेहड़ीवाले इनकी वजह से कष्ट झेलने को मजबूर होना पड़ा।

अभी कल ही की बात है। समाजवादी पार्टी के नेता मोहन सिंह इस दुनिया से कूच कर गए। कई लोगों ने उनकी ईमानदारी से लेकर उनकी समाजवादी शख्सियत के गुण गाए। लेकिन आप ही बताइए आय से अधिक संपत्ति का मामला हो या बेशर्म परिवारवाद का , रिटेल में एफडीआई पर मुहर हो या न्युक्लियर डील को समर्थन , जो शख्स इसके बावजूद भी नेताजी का अनुगामी या सहकर्मी रहा हो क्या उसका समाजवाद संदिग्ध नही हो जाता।

ऐसे में बड़ा सवाल है कि आखिर लीपा-पोती मार्का श्रद्धांजलि का यह दौर कब तक चलता रहेगा और ईमानदार मूल्यांकन की शुरुआत कब होगी।

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

रामाधीरों को रास्ता खाली करना होगा ...

"बेटा तुमसे ना होगा" ... सुनते-सुनते जे पी सिंह के कान-दिमाग पक गए। रामाधीर बरगद बना बैठा था, उस जमाने में भी जबकि धर्मेंद्र-देवानंद जलवा बरपा रहे थे सिनेमा से परहेज करता था। जे पी सिंह नए जमाने का था , लेकिन रामाधीर उसका बाप था जो उसी सामंती परंपरा का हिस्सा था , जहां बाप चिता में गुम हो जाने तक `बाप` बने रहने की जिद पाले रखता है। यह मामला महज जे पी सिंह बनाम रामाधीर सिंह का नही है , यह पीढ़ियों के बीच का संघर्ष है जहां बाप समय के साथ परिधि पर जाने से सिरे से इंकार कर देता है और बेटा संस्कारों की संकरी गली में घुटता रहता है । जे पी सिंह विद्रोही निकला जिसने संस्कारों के आगे घुटने टेकने से इंकार कर दिया। यह महज बाप-बेटे का भी मामला नही है , यह गुरु-चेले के बीच का मामला भी हो सकता है। यह हर उस परिस्थिति की परछाई है जिसमें पुराना अपने पांव अंगद के माफिक जमा रखना चाहता है , वरिष्ठता की चाबुक बरसाता रहता है और सामने वाले से उफ तक न कहने की उम्मीद रखता है । वासेपुर की दुनिया किसी मंगल ग्रह की छाया नही है , हमारे बीच की कहानी है। ताजा मामलों में बीजेपीपुर में इसकी परछाई दिखाई दे रही है तो कोई आश्चर्य नही। आखिर जे पी सिंह के सामने विकल्प कौन-कौन से थे ?  आखिर कब तक संस्कारों के चक्रव्यूह में अपनी महत्वाकांक्षा का गला घोंटता। ऑटोमेटिक हथियार, शार्प शूटर , शाहरुख-सलमान से लैस लेकिन रामाधीर की इच्छाओं पर कठपुतली की तरह नाचने को मजबूर।

राजनीति हो या कारोबार या फिर हमारा-आपका घर ... आखिर कब तक उन संस्कारों को ढ़ोए जो बदले जमाने के साथ आउटडेटेड हो गए हैं। ज्वाइंट फैमिली न्यूक्लियर फैमिली में कंवर्ट हो रही है जिसमें हर एक अपनी उड़ान अपनी मर्जी से तय कर रहा है, नयी कंपनियां स्थापित हो रही है जहां रिश्तों की बजाय प्रोफेशनलिज्म जगह पा रही है , बच्चें अभिभावकों की सार्वकालिक इच्छा डॉक्टर/इंजीनियर की बजाय नए क्षेत्रों में अपनी मर्जी से विचर रहे है, ऐसे में इतिहास पर प्रलाप भविष्य को बेहतर बनाने की बजाय बदतर ही करेगा।

आडवाणी कोपभवन है और चेले मान-मनौव्वल में जुटे हैं। यह तो आडवाणी जी को भी पता है समय किसी का इंतजार नही करती और न ही कहीं ठिठक सकती है। ऐसे में जिद की भी एक सीमा है , जिससे परे इतिहास भी धूमिल होगा , भविष्य की क्या कहिए ? उन्हें समझना होगा कि यह जे पी सिंह का समय है जो अपनी बारी के इंतजार में बुढ़ा रहा है।


नोट- इस पोस्ट का किसी भी खास विचारधारा से कोई लेना-देना नही है

बुधवार, 11 सितंबर 2013

भगवान मूच्छड़ क्यूं नही होते ?

बाल्यावस्था से ही रामानंद सागर के रामायण की खुराक मिलनी शुरु हुई और फिर रही सही कसर बी.आर. चोपड़ा की महाभारत के हैवी डोज ने पूरी कर दी। बाकी जय हनुमान , जय गणेश , गंगा मैया तो थी हीं । बात बचपन की है , लेकिन सवाल अभी भी अपनी जगह है। जब भी राम-लक्ष्मण के सफाचट चेहरे को देखता तो एक बार दिमाग में जरुर घूम जाता कि क्या शंकर सुपर सैलून टाइप (दलसिंहसराय का तत्कालीन टीप-टॉप सैलून) के दुकान जंगलों में भी पाये जाते हैं ? …  या फिर अयोध्या से चलते समय इन्होंने अपने झोले में उस्तरा भी रख लिया था। जंगल में तप करने वाले विचरण करने वाले साधु-सन्यासिंयों की बढ़ी हुई दाढ़ी-मूंछ के विपरीत भगवान राम का दाढ़ी-मूंछ विहीन चेहरा खटकता था। ज्यादा दिमाग दौड़ाता तो लगता कहीं पाप तो नही कर रहा। वैसे भी दादी से पूछा गया हर सवाल इस ब्रह्मउत्तर के बाद अपना अस्तित्व खो देता कि – अरे भगवान जी हतिन  !!! ऐसे में उनसे इस सवाल के जवाब की उम्मीद क्या करता। चुप ही रहा। साल शुरु होते ही कैलेंडरों को जमा करने का खूब जोश हम बच्चों में खूब रहता। कमरे के कोने-कोने को हम देवता-देवियों की तस्वीरों से पाट देते। उन तस्वीरों में भी अक्सर दाढ़ी-मूंछ तलाशने पर निराशा ही हाथ लगती। हां कुछ बुजुर्ग टाइप के देवताओं की बात दूसरी थी। मसलन ब्रह्मा जी बढ़ी हुई दाढ़ी-मूंछ के साथ दिखते, लेकिन आप ही बताइए राम, कृष्ण , विष्णु , शिव जी के सामने उनकी क्या बिसात। एक बात और , अधिकांश दानवों के चेहरे दाढ़ी-मूंछ से भरपूर होते। अब ऐसा तो है नही कि उनके यहां नाईयों ने हड़ताल कर दी हो। और फिर क्या असुरों की पत्नियों ने अपने पतियों के चेहरे पर उगे घोंसलों पर आपत्ति नही की? कभी-कभी लगता है कि हो सकता है आपत्ति की हो , लेकिन असुर तो असुर ठहरे। लेकिन फिर देवता भी तो पारिवारिक जीवन में कोई खास डेमोक्रेटिक नही थे। लक्ष्मी जी हमेशा विष्णु जी के चरणों में ही नजर आती हैं , माता सीता के कष्टों को कौन नही जानता।

समय बीता , उम्र बढ़ी।  धार्मिक धारावाहिकों की जगह शांति , स्वाभिमान का ट्रेंड शुरु हुआ और फिर तो टीवी पर तिकड़मी सासों-बहुओं ने कब्जा जमा लिया। यह सवाल भी कहीं किसी कोने में दुबक गया। एम.ए. प्रीवियस के दौरान की बात है। बड़ौदा स्कूल के नामी-गिरामी चित्रकार गुलाम मोहम्मद शेख के साथ दिल्ली में नैशनल गैलेरी ऑफ मॉर्डन आर्ट घूमने का मौका मिला। कई चित्रों को बकायदा बैकग्राउंड के साथ समझाया उन्होंनें। मिथिला पेंटिंग , कालीघाट पेंटिंग , बंगाल स्कूल आदि को। कुछ पल्ले पड़ा कुछ भविष्य पर भरोसा कर सिर पर से गुजर जाने दिया। इसी दौरान भगवान शिव की एक पेंटिग पर नजर टिक गयी। अपने चिरपरिचित नीले शरीर , कमर पर मृगछाला, सिर पर जटाजूट तो था ही , लेकिन जो चीज खास थी , वह थी चेहरे पर मूंछ की मौजूदगी। दिमाग उछलने लगा। झट से शेख सर से यह सवाल पूछ डाला। फिर पता चला कि पहले की तस्वीरों में भगवान को मूंछे हुआ करती थी। फिर लगा कि यह सारा गड़बड़झाला भगवान के भक्तों का पैदा किया हुआ है।

आखिर क्या वजह हो सकती है मूंछ-दाढ़ी के गायब हो जाने की ? सच कहूं तो भगवान के भक्तों के इस घोटाले को अब तक समझ नही पाया हूं। शायद आपके पास इसका जवाब हो ?  यदि हो तो बताइएगा जरुर।

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

जय गुरु`देव` !!!

5 सितंबर आते ही उन्माद सा आ जाता है। गली की मुंडेर पर मास्टर साहब को ढ़ेला मारने को तैयार रहने वाले छात्र भी मुंह में घास दबाए नजर आते हैं। तंबाकू मलने वाले मास्टर से लेकर व्यापारिक बुद्धि वाले टीचर भी गुरुदेव की मुख-मुद्रा धारण कर लेते हैं। हाथ चौबीसों घंटे आर्शीवाद की मुद्रा में होता है और चेहरा-आंखें मौसमी नरमी और नमी की चपेट में आ जाते हैं। एकबारगी किसी को भी लग सकता है कि पूरा भारत गुरुकुल में बदल गया है। बस जंगलों और पशु-पक्षियों की जगह बिल्डिंगें उग आयी हों। लेकिन संस्कार की इस सतह को थोड़ा छीलिए तो लगेगा कि मामला चोंचलेबाजी ज्यादा है , हकीकत कम ।

वैसे मन तो कल ही चुलबुला रहा था कि अपने कुछ `महान` गुरुजनों को याद किया जाय। लेकिन क्या किया, इच्छा बाकियों की तरह सामाजिक संस्कारों की भेंट चढ़ गयी। हांलाकि जहां तक कुछ सीखने की बात है ,तो इन महान मास्टरों का भी योगदान कुछ कम नही है। अनुभव और कल्पना-शक्ति दोनों ही समृद्ध हुई हैं , इससे कोई इंकार नही है।

कुछ दिनों पहले की बात हैं। राजनीति-विज्ञान के हमारे एक मास्टर साहब थे जिन्होंने भारतीय संस्कृति की रक्षा का जिम्मा अपने कंधों पर उठा रखा है। अब भारतीय सभ्यता-संस्कृति तो महान ठहरी , ऐसे में टीचरी लगभग पार्टटाइम मामला था उनका । चेहरा देखने को तरस जाते थे विद्यार्थी।  कुछ दिनों पहले उन्होंने संस्कृति की रक्षा को समर्पित एक अपडेट किया। पूर्व-छात्र ने मौका अच्छा समझा और गरियाया कि क्लास करने तो आते नही थे , चले हैं संस्कृति की रक्षा करने। गुरुदेव ने झट से कमेंट डिलीट किया कि छात्र का यह कमेंट भारतीय परंपरा-संस्कृति को दूषित न कर दे।

अब इतिहास की चर्चा कर रहा हूं तो इतिहास के अपने एक मास्टर साहब का जिक्र कर ही दूं। मध्ययुगीन इतिहास का चैप्टर शुरु होता और वह मास्टर साहब इतिहास में बिला जाते। चेहरा लाल हो जाता , बॉडी का ब्लड-सर्कुलेशन तीव्र हो जाता । शिक्षक कम , संजय की भूमिका ज्यादा निभाते दिखते। ... एक तरफ मुगलों की विशाल सेना थी , दूसरी तरफ मुट्ठी भर राजपूत, लेकिन उत्साह की कोई कमी नही। राजपूतों की तलवारें चमक रही थी। भीषण युद्ध हुआ। हजारों हजार की संख्या में लोग लड़े , लाखों मरे , करोड़ों घायल गुए। और आप ही बताइए जब गुरु-चेला दोनों लड़ाई के मैदान में प्राणपण से घुस गए हो तो मैथमेटिक्स की मौत तो तय है।

अब बात एक और मास्टर साहब की । मास्टर साहब राजपूत थे और एक बेटी के बाप भी। छात्रों में से पहले राजपूत छांटते और फिर दामाद कि फलां उनकी बेटी पर फिट बैठेगा कि नही।... ऐसा हुआ कि एक दिन एक लड़का उनको जंच गया। सुदर्शन व्यक्तित्व और उज्जवल भविष्य से परिपूर्ण । लेकिन एक खटका था। लड़के का आना जाना एक दूसरे मास्टरनी साहिबा के यहां था , जिनकी भी एक बेटी थी। हालांकि मास्टरनी साहिबा जाति से राजपूत नही थी, लेकिन उनका चित हमेशा चिंतित रहने लगा । जब चिंता बर्दाश्त से बाहर हो गयी तो एक दिन लड़के को उन्होंने बुलाया। बेटी दोनों को चाय देने के लिए आई। बेटी के प्रस्थान पश्चात मास्टर साहब ने सवाल पूछा- पसंद है कि नही। लड़का न हां, न ना। तड़ से मास्टर साहब इतिहास में मानो विलीन से हो गए और थर्ड पर्सन के चोले में कहा- देखो बेटा ! राजपूत लड़के एश तो सब जगह करते हैं लेकिन शादी राजपूत में ही करते हैं।  ( क्रमश: )

शनिवार, 31 अगस्त 2013

कानून का घुटना कचक गया है ?

कभी-कभी लगता है कानून को कोई न कोई बीमारी जरुर है। हो सकता है कलर ब्लाइंडनेस का शिकार हो गया हो या फिर आर्थराइटिस का मरीज बन बैठा हो । मेरे हिसाब से हो न हो जोधपुर से इंदौर के बीच के सफर में कानून का घुटना जरुर कहीं न कहीं कचक गया होगा। अब `बेचारा` कानून दो-चार दिन बेडरेस्ट कर ले तो ऐसी क्या आफत आ जाएगी ? ज्यादा फायं-फायं कीजिएगा तो हो सकता है किसी प्रमाणित डॉक्टर का कोई स्वास्थ्य प्रमाण-पत्र आपको पकड़ा दे कि जनाब मामला जेनुइन है ।  और आप ही सोचिए... वो बेचारा और कितनों से पंगा ले , कुछ ही तो संगी-साथी हैं उसके । गिनती के लोग ही तो कानून के साथ चाय-चुक्कड़ कर पाते है, हंसी-ठिठोली कर पाते है । और तिस पर ये तो बाबा जी ठहरे।

अब बात थोड़ी पुरानी । राजा भैया जेल से छूटे । पोस्टर चिपका दिया उनके चंपूओं ने – सत्य परेशान हो सकता है , पराजित नही । अब बेचारे सत्य को उबकाई आने लगी । आखिर क्या करे ?  पहले ही दबा-कुचला था , अब तो खैर रही सही इज्जत भी नीलाम हो गयी । फिल्मों में अक्सर इस डॉयलॉग से आप दो-चार हुए होंगें जब जमाने की जंजीरों में जकड़ा बाप बच्चों को अपनी मुर्दानी शक्ल में रो (कह) रहा होता है  – बेटा हम गरीबों के पास केवल इज्जत ही तो है। मतलब सत्य की बची-खुची इज्जत पर भी डाका डाल दिया भैया जी के छुटभैयों ने ।

इन दिनों आशाराम बापू के तर्कवान चंपू यह तर्क स्खलित कर रहे दिखते हैं कि कानून को अपना काम करने देना चाहिए । (बापू माफ करना , मजबूरी है, जमाना ही चिरकुट है, लोग पहले ही बापू, भैया, मां जोड़कर पूरी दुनिया को अपना खानदान बना डालते हैं)  मीडिया को रह-रह कर गरिया-गलिया रहे हैं, लपड़ा-थपड़ा रहे हैं, मानो बेचारा कानून मीडिया की वजह से मूर्च्छित पड़ा है , अपना काम नही कर पा रहा ।

तरंग घोटाले में आरोपी राजा जी जेल से हाल ही में निकले । कानून पर पूरा भरोसा जताने से वो भी नही चूकते । यानि कि जिसको देखो सब कानून पर भरोसा जता रहे हैं। आखिर ऐसा क्या है इस देश की न्याय व्यवस्था में और कानून में जो राजा भैया से लेकर पप्पु यादवों तक को और ए-बी-सी राजाओं से लेकर आशाराम भगंदरों तक को खूब रास आ रही है ?

अक्सर लिखा हुआ देखता हूं कि कानून के हाथ लंबे होते हैं , भगवान के घर में देर है अंधेर नही, ऊपरवाले की चक्की बारीक पीसती है और अलां फलां । इन दिनों अक्सर लगता है ऊपरवाला यदि है तो पीकर पूरी तरह टल्ली है और कानून है कि सेल्फ-कांफिडेस के अभाव का मारा है।



बुधवार, 28 अगस्त 2013

अल्युमीनियम के वो सिक्के अब भी उछाले जाते हैं क्या ?

दोपहर के करीब बारह बजे थे। चाय की दुकान सुबह की पहली शिफ्ट के बाद खर्राटें ले रही थी। निराशा-हताशा के साथ वापस लौटने को था। अचानक सामने से एक लाश गुजरी। सारी सुस्ती के बावजूद शरीर में बसे संस्कार ने मरोड़ ली , बिना किसी कोशिश के हठात ही हाथ प्रणाम की मुद्रा में दंडवत था। फिर बड़े बूढ़ों का कहा याद आया। सुबह-सुबह लाश देखने से दिन शुभ होता है। पता नही दिन के बारह बजे की गिनती सुबह में की जाय या नही , दिमाग के किसी कोने में हलचल हुई। मुफ्त का माल बटोरने के लिए एकबारगी मस्तिष्क से तर्क उपजा – शहर की सुबह तो वैसे भी बारह बजे से ही होती है।

चाय की सामयिक खुराक के बिना आंतरिक कुलबुलाहट में उलझे तन-मन को सुबह की इस आखिरी यात्रा ने एक और नयी उलझन दे दी। आखिर इतना चुप-चुप क्यों ? अर्थी अब गली के आखिरी छोर पर थी। कंधे पर अर्थी लिए चार लोगों के अलावा मुश्किल से आधे दर्जन लोग और। सब के सब चुप।  कहीं किसी कोने से `राम नाम सत्य है` की ध्वनि-प्रतिध्वनि नही । बचपन और किशोरावस्था के दौरान की तस्वीरें मन-मस्तिष्क के सामने से गुजरने लगी। अपने या अगल-बगल के मुहल्ले या फिर किसी रिश्तेदार की मौत होती तो लोगों की अच्छी खासी भीड़ जमा होती। न जाने कितनी बार सिमरिया-चमथा हो आया हूं इस चक्कर में। फिर बांस का जुगाड़ होता और अर्थी बनाने वाले कारीगर का। यहां तो खैर रेडीमेड चचरी तैयार मिलती है मानो किसी के मरने के इंतजार में ही बैठी हो। अच्छी खासी संख्या में लोगों के साथ मृतक का आखिरी सफर शुरु होता। जिनके साथ रिश्ते जीवित जीवित रहते भी ठीक नही होते वो भी ऐसे समय में संवेदना प्रकट करने पहुंचते। एक-दो लोग किसी झोले में मखान और अल्यूमीनियम के पैसे लिए होते। `राम नाम सत्य है` के नारे लगाए जाते और मखान-सिक्के लिया हुआ शख्स उन्हें उल्टी दिशा में उछालता।

फिर लगा शहर में इतना सब संभव कहां ? दस बजे तक सबको ऑफिस पहुंच जाना है। जरा सा देर हुए नहीं कि बॉस की घुड़की। और बॉस भी बेचारा क्या करें उसे महाबॉस की घुड़की। ऊपर से मंदी का समय। नौकरी पर वैसे ही आफत बनी है। कोई कितना रिस्क ले ?

अंतिम बार मशहूर फिल्मकार मणि कौल के दाह संस्कार के समय दिल्ली  के एक क्रीमेटोरियम गया था। ऑफिस से अपना ताम-झाम समेट कर निकलने ही वाला था कि एसाइनमेंट डेस्क से वहां पहुंचने का आदेश हुआ। एम.ए. के दिनों की बात है फिल्मकार कुमार साहनी एक दफा क्लास लेने आए । न्यू वेव सिनेमा पर उन्होंने चर्चा की। मणि कौल के बारे में बताया । मणि कौल की दुविधा और कुमार साहनी की माया दर्पण भारत में न्यू वेव सिनेमा की शुरुआत कही जाती है । लगा कि काफी जमघट होगा । पहुंचा तो गिनती के लोगों को वहां पाया। जहां तक मुझे याद है गिनती के दो दर्जन से ज्यादा लोग नही होंगें। फिल्म, नाटक जगत के कुछ लोगों के साथ कुछेक रिश्तेदार । जब तक था, हमारे अलावा बस एक और चैनल का कैमरामैन ही दिखा।

दलसिंहसराय और अगल-बगल के इलाके में अक्सर दाह-संस्कार के लिए चमथा या सिमरिया का रुख किया जाता। हम बच्चों के लिए यह गम का कम, पिकनिक का समय ज्यादा होता। गंगा नदी के किनारे दाह-संस्कार, फिर गंगा स्नान और तब नजदीक के झोपड़ीनुमा होटल में पूरी-सब्जी-जिलेबी। गंगा किनारे बलुआही जगह पर हम बच्चें खूब धमा-चौकड़ी मचाते और बड़े-बुजुर्ग बकैती करते। कुछ दाह-संस्कार के एक्सपर्ट होते , जिनकी निगरानी में पूरी प्रक्रिया संपन्न होती। कुछ लोग पिछले श्राद्धों के जिक्र में जुटे होते तो कुछ मोहल्ले और परिवार की पॉलिटिक्स में। कुछ तो जीवन-दर्शन में गुम हो जाते,  देश-दुनिया तक को अपनी बतंगड़ी की जद में ले आते। ... और हां आते-आते लोग सिमरिया से अन्नानास लाना नही भूलते।


दिल्ली और दलसिंहसराय हालांकि अब भी करीब हजार किलोमीटर है लेकिन बीच की यह दूरी शायद एक भ्रम ही है। ऐसे में सवाल है कि – अल्युमीनियम के वो सिक्के अब भी उछाले जाते हैं क्या ?