रविवार, 16 दिसंबर 2012

गुमशुदा लोगों की लंबी होती लिस्ट

जब आप सुबह उठते हैं
ब्रुश-पेस्ट से लेकर साबुन मलते हैं
जबड़े तले कुछ चबा कर

ऑटो, मेट्रो या फिर अपनी-अपनी गाड़ियों में
अपने ऑफिसों का रुख करते हैं
रेडलाइट की रुकावट पर खीजते हैं
बढ़ी हुई आबादी , आगे वाले की बेवकूफी
और पीछे से आती पों पों पर सुलगते हैं
ऑफिस के कंप्यूटर पर रह रह कर आंखे तरेरते हैं
दर्जनों चाय और कॉफी की प्यालियों में
भीतर के कसैलेपन को घोलने की असफल कोशिश करते हैं
फिर शरीर के तमाम कलपुर्जों को समेटकर
घर वापस आते हैं
दोस्तों के साथ दर्द बांटते हैं
या फिर उनका दर्द बढ़ाते हैं
टीवी चैनलों पर सास-बहू के झगड़े
और जेठालाल की बेवकूफियों में खुशी तलाशते हैं
और फिर रात-सुबह-शाम के उसी चक्र में गुम हो जाते हैं
यदि यह नॉर्मल होना है
तो फिर एबनॉर्मेलिटी क्या है ?
खैर गुमशुदा लोगों की फेहरिस्त नॉर्मल इंसानों से भरी-पूरी दिखती है।

गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

तो इसमें नया क्या है ?


हंसने का मतलब हमेशा खुशी नही होती
हमेशा दर्द और जख्म ही आंसू नही पैदा करते
कुछ हंसोड़ होते हैं
बेसाख्ता हंसते मिलते-पाए जाते है
बिना किसी वजह के
आप उन्हें पागल कह सकते हैं
और खैर खुशी के आंसुओं के बारे में हमने सुना ही है
बिछड़े रिश्तेदारों से मिल पाने की खुशी
बिछुड़े जमीन पर फिर से पांव पड़ने का उल्लास
ट्रॉफी को जीतने का उन्माद
आंसूओं के अविरल प्रवाह में भी तब्दील होता है
कल जब क्लास में
शिक्षक महोदय को पराजीनी इंसान की कल्पना करते सुना
कि हंसी का जीन दर्द में भी हंसी पैदा करेगा
और दर्द और आंसू का जीन खुशी में भी चेहरा गमगीन रहेगा
तो एकबारगी लगा
कि इसमें नया क्या है ?


मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

नींद के पार उम्मीद ...

जब दिमाग के नसों की दीवारें
रक्त के तेज प्रवाह से चोटिल होती हैं
या फिर निर्वात की स्थिती सी बन जाती है
नसों की तरावट पर शुष्कता भारी पड़ने लगती है 
आंखों के तंतु देखने की बजाय
सोचने की प्रक्रिया से जुड़ जाते हैं
कुछ अतीत, कुछ वर्तमान और कुछ भविष्य के
दृश्यों-कल्पनाओं में उलझ जाते है
जब नींद बेहतर विकल्प लगता है
आप इसे पलायन कह सकते हैं

लेकिन एक उम्मीद भी जुड़ी होती है
कि शायद नींद के पार कुछ नया दिखे
कोई नया रास्ता मिले...

मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

उम्र के गणित होने के खिलाफ ...

उम्र बढ़ती है , बढ़ती जाती है
उम्र घटती है , घटती जाती है
कुछ कहते है बढ़ रही है
विपक्षी खेमे वाले घटने का हो-हल्ला मचाते हैं
बढ़ने और घटने के भ्रम के पीछे
उम्र का आंकड़ा होना बड़ा सच है
उम्र आंकड़ा है
आधुनिक समय का रिवाज
जो दर्ज होती रहती है
जनगणना रिपोर्टों में
पोलियो, टिटनेस ,डिप्थिरिया
उम्र की दुरुस्ती के लिए अस्पतालों में दी जाने वाली टीकों के समय
शादी, जमीन और नौकरी के कागजातों में
भांति-भांति के प्रमाण पत्रों में
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है
उम्र का इतिहास में दर्ज होना
और उसके पन्नों के पलटने 
और हवाओं से उपजी उसकी खड़खड़ से निकलकर
 सांय सांय करना
धमनियों में प्रवाहित मंथर रक्त को गति देना
आंकड़े और इतिहास के बीच
उम्र की जद्दोजहद पहचान पाने की कबायद है
और होनी चाहिए ।

शनिवार, 10 नवंबर 2012

लगभग 29 बरस का जीभ ... चटकारी-खट्टकारी यादें ...

क्वालालम्पुर के इंस्टीट्यूट ऑफ स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज से बुलावा आया था। आने-जाने के बिजनेस क्लास टिकट के साथ एक फॉर्म भी भरने को था। डायटरी रिस्ट्रीक्शन यानि खाने में मनाही की वस्तु के आगे मैने बीफ भर दिया, प्रीफरेंस का कॉलम खाली ही छोड़ दिया। वैसे भी क्या भरता ? चावल-दाल-चोखा , रोटी-सब्जी और कभी-कभार मटन-चिकेन-अंडा के अलावा कुछेक ही चीजें है जो मुझे अच्छी लगती है। कह सकते है कि एक तो इनकी आदत सी हो गयी है और दूसरा कि अब मैं इन आदतों का लगभग गुलाम हो गया हूं। नेपाल के अलावा किसी विदेशी धरती से अब तक मेरा पाला नही पड़ा था , ऐसे में खान-पास से जुड़े जोखिमों के बारे में अंदाजा भी नही था। वैसे भी खाने का जुड़ाव मेरे मामले में पेट से ज्यादा मन से ही अधिक रहा है।

पालम हवाई अड्डे से उड़ान भरने के साथ ही खाने और पीने की तमाम सामग्रियां सामने से आने-जाने लगी। एक नमकीन सी दिखने वाली चीज लगभग मैं अपनी जीभ को समर्पित ही करने वाला था कि कहीं से पोर्क शब्द उछल कर मेरे कानों में छलांग लगाता हुआ पहुंचा। दिमाग को मानो लकवा मार गया और जीभ से उत्सर्जित तरल एकबारगी अंतर्ध्यान हो गया। खैर आगे के करीब 5-6 दिन कमोबेश ऐसे ही रहे। आइटीनरी में कमोबेश हर सुबह-शाम क्वालालम्पुर के मशहूर पांच सितारा होटलों और मशहूर भोजनालयों में भोजन कराए जाने का इंतजाम था , लेकिन अक्सर जूस, ब्रेड और अंडे से ही काम चलाना पड़ता। संयोगवश मंडेरिन ओरियंटल ,जहां हमारे रहने का इंतजाम था , उनके मेन्यू में स्टीमड राइस और दाल तड़का का इंतजाम था ,जो अक्सर पूरे दिन की मीटिंग , सेमीनार और भ्रमण के बाद शरीर को संभाले रहता। खैर तीन-चार दिनों के बाद पेट को तब सुकून मिला जब वहां एक दक्षिण भारतीय रेस्तरां में राइस-रसम खाने को मिला और वो भी देशी स्टायल में, वरना तो पांच सितारा होटलों में खाने के साथ तमाम लटके-झटकों से दो चार होना पड़ता ।मलेशिया में तमिलों की आबादी अच्छी-खासी है, और लगातार उनकी संख्या में इजाफा भी हो रहा है। जब नई नवेली खुबसूरत राजधानी पुत्राजाया में हमलोगों की मुलाकात मलेशियाई प्रधानमंत्री से हुई तो पता चला कि हजारों की संख्या में ऐसे तमिल यहां है जो वीजा की वैद्यता खत्म होने के बाद भी अभी भी मलेशिया में हैं ।एक बार मैक्डोनाल्ड भी गया और बर्गर-फ्रैंच फ्राइ के टेबल पर आगमन के साथ ही न जाने कहां से कहीं पढ़ा याद आ गया कि भारत को छोड़कर अन्य जगहों पर मैकडोनाल्ड वाले बीफ से जुड़े किसी प्रोडक्ट का इस्तेमाल करते है। बर्गर-फ्रैंच फ्राय को टेबल पर ही छोड़कर खिसकना पड़ा। खैर इस मलेशियन ट्रैजेडी में मुझे दिल्ली और खासकर दलसिंहसराय की याद अक्सर आती। ऐसे में जबकि वजन खतरे के निशान से थोड़ा ही ऊपर है खाने में थोड़ा भी झोल-झाल खूब अखरता है।

अब जबकि जीभ-उदर और बाकी शरीर के साथ मैं 29 साल की दहलीज पर हूं और लगभग आधी उम्र निकल चुकी है गाहे-बेगाहे इस जीभ को दलसिंहसराय से दूर होना खटकता है। मदन का समोसा-सिंघारा और आलू की चटनी, चमन लाल का रसकदम, परदेशी झाल-मूढ़ी, लक्ष्मी कचड़ीवाले का आलूदम , बोढ़न का भूंजा और महीने-दो महीने पर समस्तीपुर मार्केट से आयातित समोसे की याद जीभ पर अविरल तरल प्रवाह पैदा करती है।

सबसे पहले बताता चलूं कि रसकदम दलसिंहसराय की खासियत है । कवरेज के सिलसिले में खूब घूमना हुआ है, लेकिन रसकदम की उपस्थिति को कहीं और दर्ज कर पाने में असफल ही रहा हूं । ऐसे में तिरुपति के लड्डू, धारवाड़ का पेडा और हैदराबादी हलीम की तरह दलसिंहसराय के रसकदम का ज्योग्राफिकल इंडिकेशन के रुप में पंजीकृत होने का मेरे लिहाज प्रॉपर हक बनता है। छेना के ऊपर शुद्ध खोए की मोटी परत और फिर उस पर लिपटा पोस्ता दाना यानि तीन स्तरों पर निर्मित इस मिष्टान्न के अद्भुत स्वाद ने न जाने कितने जीभों को जीवंत किया है। हालांकि दलसिंहसराय में रसकदम कई दुकानों पर सजे मिल जाएंगे, लेकिन चमनलाल की चमक के सामने सब फीके है। रसकदम का विशुद्ध अनुभव चाहिए तो आपको कम से कम 24 घंटे पहले ऑर्डर करना पड़ेगा। आगमन से पहले ही उनकी विदाई का मुहुर्त निकल चुका होता है।

वैसे लक्ष्मी की दुकान के आलूदम ने भी जीभ को सिसकारी लेने पर कम मजबूर नही किया है। छोटे-छोटे उबले आलू पर मिर्च पाउडर और मसाले की परत अलौकिक स्वाद से भरपूर होती। कई लोगों को सुबह-सुबह रोटी साथ ले जाकर आलूदम के साथ चटकारे लगाते देखा। मसाले का संतुलित मिश्रण और मिर्च के तीखेपन के चार्म से बच पाना संभव भी नही था। वैसे बोढ़न के आलूदम में भी खासा दम था। स्कूल में टिफीन की छुट्टी में हम भागकर सीधे उसी की रेहड़ी पर धावा बोलते । हालांकि मसाले में उतना तीखापन नही होता , लेकिन स्वाद लाजवाब होता।

अब के जमाने में स्वदेशी क्या और परदेशी क्या , ग्लोबलाइजेशन और लिबरलाइजेशन का जमाना जो है , लेकिन परदेशी के नाम पर हमारे यहां कुछ था तो वो था- परदेशी झाल-मूढ़ी। झाल-मूढ़ी के मार्केट में परदेशी झालमूढ़ी ने दलसिंहसराय और आस-पास के इलाके में कोई कम क्रांति नही मचाई। नीबूं का अचार, करारी-तीखी मिर्च , मूंगफली, झिल्ली और तमाम प्रकार के मसालों के साथ जब झाल-मूढ़ी तैयार हो रही होती तो परदेशी झाल-मूढ़ी के ठेले पर भीड़ खिंचने लगती। कह सकते है कि झाल-मूढ़ी के स्टैंडर्डाइजेशन में परदेशी की भूमिका हमारे इलाके में एतिहासिक रही है। अगल-बगल के इलाकों में जब भी लोग जाते तो झाल-मूढ़ी सेवन के समय सामने वाले पर कटाक्ष करते नही चूकते- अरे इसमें परदेशी वाली बात कहां। वैसे चुनौती परदेशी को भी कोई कम नही मिली , मुकाबले में स्वदेशी झाल-मूढ़ी के ठेले ने ताल ठोका , लेकिन परदेशी के सामने जो भी आया टिक नही सका। आरएसएस के कैडरों को भी अक्सर परदेशी झाल-मूढ़ी को प्रीफर करता पाया।

औऱ फिर मदन-रतन का समोसा और उसके साथ मिलने वाली आलू की चटनी की भी याद कोई कम नही आती। इस 29 साला सफर में आलू की चटनी की जगह मैदे से बनी लाल चटनी खाने का दुख भी झेलने को भी मिला। लेकिन क्या किया जाय समोसा मजबूरी जो ठहरी और जमाने की चाल से चाल तो मिलानी ही पड़ेगी न।


वैसे दो और चीजों की याद किए हुए बिना बात अधूरी ही रह जाएगी। हमारे ही मोहल्ले के सुधो हलवाई के हाथों का बना स्वादिष्ट पेड़ा और बंका जी की बिस्किट फैक्ट्री का बॉबी बिस्कुट। मंगलवार को जब सवा रुपया हनुमान जी के प्रसाद के लिए हाथ में आता तो बाकि सलाहों की परवाह के विपरीत पेड़ा ही मेरी पहली पसंद होती।

यादें और भी है , लेकिन उनकी चर्चा अगली बार।

गुरुवार, 8 नवंबर 2012

उस अपहरण का चश्मदीद हूं मैं... जिसकी कहीं कोई खबर नही...

इंद्रविहार से मुखर्जी नगर के रास्ते पर था। रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। हवा में हल्की-हल्की ठंडक थी। दूसरे दिनों के मुकाबले मैनें ऑटो के बजाय पैदल चलना ही बेहतर समझा... और वैसे भी इस वक्त इस तरफ इक्का-दुक्का ही ऑटो नजर आते हैं, और वो भी अक्सर भरे हुए। सड़क पर चहल-पहल काफी कम हो चुकी थी और मुखर्जी नगर बाजार के शुरु होने के एन पहले वाले मोड़ पर मैं लगभग पहुंचने को था। एकाएक विपरीत दिशा से तेजी से सरपट भागती एक ऑटो महज कुछ मीटर दूर रुकी। इंजन की गुर्राहट अभी भी बनी हुई थी, ड्राइवर के हाथ अब भी हैंडल पर थे। ऑटो से दो लोग उतरे , बिजली की तेजी से बगल में तफरीह मार रहे कुत्ते को उन्होंने अपने लपेटे में लिया, ऑटो में बैठे तीसरे शख्स ने कुत्ते को पैरों के नीचे दबाया... किसी भी प्रतिरोध को कुचलने की नीयत से ...और फिर वो चलते बने। घटना कुल जमा बीस-पच्चीस सेंकेंड में आयी-गयी हो गयी। अब फिर वही शांति और वही ठंडी-ठंडी हवा , लेकिन दिमाग पर एक कुलबुलाहट जम गयी।

मेरे दिमाग पर कुत्ते की शक्ल उभर आयी और फिर उसके चेहरे पर के भाव। आखिर वो भौंका क्यों नही ...और फिर उठाइगिरी की इस पूरी प्रक्रिया में उसके अंग-प्रत्यंग असामान्य रुप से इतने शांत क्यों थे... कोई प्रतिरोध नही... मानो खामोशी के साथ उसने इसे अपनी नियती तय मान ली हो। फिर दिमाग में आशंकाओं-कुशंकाओं के अनगिनत रेशे आपस में एक-दूसरे से उलझते चले गए। पहला ख्याल तो यह आया कि हो सकता है इस अचानक के आदमीय आघात के लिए वो कुत्ता बिल्कुल भी तैयार न हो। फिर ख्याल आया कि कुत्ता की जगह कोई आदम होता तो शायद उसकी भी यही हालत होती। वैसे भी उसके भौंकने पर क्या होता, शायद कुछ कुत्ते जुट जाते। और फिर वो कुत्ते भी जुट कर क्या कर लेते ? आखिर रफ्तार ऑटो के कब्जे में थी। उसके भौं-भौं से उसके बचाव में किसी आदमी-औरत के जुटने की कोई गुंजाइश भी नही है, शायद यह वो जानता होगा। वैसे भी दिल्ली में हर साल सैकड़ों की तादाद में बच्चे गुम होते है, उनमें से कितनों की खबर वापस मिल पाती है। वैसे भी अक्सर हम ऐसे सुझावों और पोस्टरों से दो-चार होते है कि – आपके जान-माल की जिम्मेवारी आपकी है। दो दिनों से दिल्ली की सड़कों पर औरतों के हाल पर द हिंदू की एंकर स्टोरी पढ़ रहा हूं, और खैर बीच के पन्नों की तो पूछिए मत...। दिन की, रात की, घर की, घर के बाहर की... सिक्योरिटी की श्योरिटी कहीं भी नही दिखती... और हां अनजाने चेहरे और जाने-पहचाने चेहरे दोनों ही इस मामले में एक दूसरे को टक्कर देते दिखते हैं।

खैर फिर लगा कि आखिर कुत्ते इनके निशाने पर क्यूं ? मन में तमाम तरह के ख्यालों ने घर करना शुरु कर दिया। अक्सर लोगों को कहते सुना है कि उत्तर-पूर्व और खासकर नागा लोग जहां रहते हैं, उनके मुहल्ले के कुत्तों पर जान की आफत बन जाती है। मेरे कई मित्र उत्तर-पूर्व के हैं और मैनें कई बार उनसे पूछा भी और यह भी एक सालों साल चलने वाली कहानी ही निकली, जिसकी जड़ में पीछे तथ्यों की बजाय पूर्वाग्रही मानसिकता निकली। अक्सर जब भी चुनाव होता था और पारा- मिलिट्री का पहरा लगाया जाता तो सुनने को मिलता कि फलां गावं में नागा बटालियन ठहरी और कुत्तों का कत्लेआम हो गया। हालांकि सब अलां गाव- फलां गाव का जिक्र करते, ऑथेंटिसिटी सिरे से गायब रहती। खैर इस मामले में इतना तो साफ था कि न तो ऑटो का ड्रायवर और न ही बाकी के तीन लोग दूर-दूर तक कहीं से भी उत्तर-पूर्व के हों। उन चारों शख्सों की शक्लो-सूरत और संरचनात्मक बनावट-बुनावट उनके उत्तर भारतीय होने की गवाही दे रही थी।

फिर ख्याल आया कि हो सकता है क्लिनिकल ट्रायल के लिए बेचारे को पकड़ लिया गया हो। अक्सर सुनने को मिलता है कि दवाओं के परीक्षण के लिहाज से भारत बड़ी प्रयोगभूमि के रुप में विश्वपटल पर उभर कर सामने आया है।... और फिर इंसानों पर जब मनमाने तरीके से एक्सपरिमेंट-ट्रायल हो रहे हों तो फिर इन कुत्तों की क्या बिसात और तिस पर सड़कों पर के...। दो घटनाएं एकाएक दिमाग की नसों में घुस गयी... नसें फूलनें लगी। पहला कि आंध्रप्रदेश में महिलाओं पर गर्भाशय के कैंसर से संबंधित दवाओं के क्लिनिकल ट्रायल की और दूसरा कॉमनवेल्थ खेलों को चमक देने के लिए सड़कों-स्टेशनों पर रहने को मजबूर लोगों को दिल्ली के बाहर ले जाकर छोड़ देने की। लगा जब इंसानों की जान यहां इतनी सस्ती है तो फिर कुत्तों की क्या और क्यों डिमांड ?

फिर अचानक करीब सवा दर्जन भर साल पहले की याद अचानक से दिमाग में तैर गयी। हुआ यूं था कि खेल-खेल में मुहल्ले के कुत्ते ने खेल भावना का परित्याग कर दिया। मेरा पैर उस कुत्ते की दांतों की जद में आ गया। ऐसे में सलाहों की बाढ़ आ गयी। जड़ी सुंघाए जाने से लेकर एक प्रख्यात चमत्कारी बाबा के द्वारा पीठ पर थाल सटाने तक की। फिर मोटे-मोटे निड्ल वाले सुइओं के अपने दर्दनाक अनुभवों से भी तीन-चार लोगों ने मेरा परिचय करवाया। इन सुझावों के बीच एक सुझाव यह भी आया कि सात दिनों तक उस कुत्ते पर नजर रखिए । यदि कुत्ते का देहावसान न हो या फिर उसके आचरण में कोई बदलाव न हो तो मानिए कि आप सुरक्षित है। मुझे लगा शायद इन चारों में से कोई या फिर इनका कोई सगा-संबंधी शायद उस कुत्ते के नख-दंत का शिकार हुआ हो औऱ ऐसे में किसी ने उसको भी ऐसी ही सलाह दी हो। फिर लगा कि दिल्ली कोई दलसिंहसराय तो है नही... और फिर सरकारी अस्पतालों में यहां इंजेक्शन भी मुफ्त उपलब्ध है। (वैसे सभी सुझावों को दरकिनार कर मैने डॉक्टर के शरण में ही जाने में भलाई समझी और संयोगवश पतले निड्ल वाली इंजेक्शन से ही पाला पड़ा।)

इसके अलावा और भी कई आंशकाओं को टटोला-खंगाला, लेकिन जिस आंशका का दावा सबसे ज्यादा दमदार लगा वो बताता हूं।... हालांकि बता दूं कि मैं कोई कुत्तों का एक्सपर्ट नही हूं कि उसकी आंखों में झांककर उसके पितृपक्ष और मातृपक्ष की सात पीढ़ियों या फिर उसके खानदान को उलट-पलट कर रख दूं , लेकिन इस बात की पूरी संभावना बनती दिखी कि कुत्ता जरुर चालू अर्थों में खानदानी रहा होगा, यानि ब्ल्यू ब्लड। हालांकि आप भी इस पर सहमत हो यह जरुरी नही। हमने अक्सर बड़े-बुजुर्गों को कुत्ते के साथ टहलता या उन्हें टहलाता देखा होगा और आए दिन बड़े-बुजुर्गों पर हमले की खबरों को भी देखा-पढ़ा है। मुझे लगा कि ऐसी ही किसी घटना और छीना-झपटी में यह कुत्ता पट्टे के बाहर की आवारा दुनिया में भटक आया होगा, और फिर ऑटो में मौजूद उन चारों शख्स में से किसी की पारखी नजर पर उसका खानदान खटक गया होगा। अब आप और हम जानते ही है कि दुनिया पैसों की है, ऐसे में किसी पैसेवाले को कुछ पैसे की एवज में उसने उसकी गर्दन थमा दी हो।

मंगलवार, 6 नवंबर 2012

`मेमोरी प्लस` वक्त की जरुरत है ...

सबसे पहले ही यह डिस्क्लेमर दे दूं कि न तो मैं मेमोरी प्लस का कोई ब्रैंड एंबेसेडर हूं और न ही मुझे पता है कि यह किस कंपनी का प्रोडक्ट है। सुनता-पढ़ता और विज्ञापनों में देखता आया हूं, इसलिए यहां मेमोरी प्लस का जिक्र किया है। वैसे आप कोई और भी मेमोरी एन्हांसिंग उत्पाद खाने-खिलाने (या फिर दूसरों को इसके खाने खिलाने की सलाह देने) के लिए स्वतंत्र है।

टीवी-अखबार से नजदीकी रिश्ता-नाता है इसलिए अक्सर ऐसे किसी प्रोडक्ट के इस्तेमाल की गुंजाइश या कहे तो जरुरत की आशंका बनी रहती है। आजकल या कहे तो बीते कई सालों से जब भी अखबार पलटता हूं या फिर चैनल चैंज करता हूं खुद को कंफ्यूज महसूस करता हूं। हमने औऱ आपने अक्सर किताबों में पढ़ा होगा कि भारत गांवों का देश है और बहुसंख्यक आबादी गांवों में रहती है। लेकिन यहां अखबार पलटिए, चैनल खंगालिए गांव तो कमोबेश गायब ही मिलता है। गांव अगर थोड़ा-बहुत कहीं बचा है तो वो भी दूरदर्शनी कोने में सिमटा-चिपटा है। वैसे भी अगर टीवी-अखबारों-बहसों में कहीं गांव मौजूद दिखा तो समझिए कि या तो जरुर किसी सिंचाई घोटाले या फिर जमीन घोटाले की बात हो रही होगी, उस पर भी स्टोरी का ट्रीटमेंट ऐसा कि मानो गांव योजना की शक्ल में दिल्ली-मुंबई के मंत्रालयों से निकला और घोटालों की शक्ल में फिर वापस दिल्ली-मुंबई में ही चक्कर काटने लगा। कुछ फाइलों में दफन हो गया और कुछ मॉलों-अपार्टमेंटों में, और फिर थोड़ा बहुत टीवी-अखबार की बहसों में ताकि सामाजिकता और सरोकार के थप्पे का पर्दा भी बना रह जाय। ...और वहां भी नेताओं और विशेषज्ञों से बात बाहर जा ही नही पाती, किसान-मजदूर की चर्चा होती है लेकिन उनके चेहरे नही होते और अगर गलती से हों भी तो आवाज गायब मिलती है।

अभी हाल में प्रकाश झा की चक्रव्यूह देखी, लेकिन वहां भी चक्रव्यूह के बंवडर के बीच चकरघिन्नी के माफिक कंपित होते किसानों-मजदूरों का चेहरा तो दिखा लेकिन आवाज सुनने को नही मिली। नक्सलियों-पुलिस-कॉरपोरेट के अलावा शायद ही किसी के हिस्से में कोई डायलॉग आया हो।

पूरे देश की खबर देने का दावा करने वाले तमाम राष्ट्रीय चैनलों पर अवतरित होने वाले चेहरों को उंगलियों पर गिना जा सकता हैं। वही गांधी परिवार, आडवाणी-गडकरी-मोदी, मुलायम-मायावती और उनके घोषित-अघोषित प्रवक्ता और घोषित-अघोषित विरोधी। चैनलों पर तालिबान-स्वात, ओबामा-रोमनी-सैंडी की खबरें तो खूब दिख जाएंगी, लेकिन दंतेवाड़ा-गढ़चिरौली या तो गायब मिलेगा या फिर घिसे-पिटे फुटेज को ही महीनों तक दोहराया-तिहराया जाता रहेगा।

वैसे करप्शन के इसी ठेलमठाल वाले जमाने में जबकि तमाम आकार-प्रकार के करप्शन `तमसो मां ज्योतिर्गमयउच्चरित करते हुए एक दूसरे से गुत्थमगुत्था है तो मेमोरी प्लस और एनासिन तो इस वक्त की अनिवार्य आवश्यकता ही बन जाती है। अब आप ही देखिए बीते दो-तीन सालों से एक मामला खत्म होता नही कि दूसरा उसके सर पर चढ़ा-धमका होता है। सीडब्ल्यूजी, टू जी, आदर्श जैसे घोटालों की बारीकियों में लोग उलझे ही थे कि लवासा और तमाम रिएल एस्टेट घोटाले नमूदार होने लगे। घोटालो-घपलों से ऐसे में माथा बजबजाने लगा है... और आप ही बताइए लोग किस-किस को और किन-किन चीजों को याद करे। वैसे भी सुशील शिंदे कोलगेट पर प्रतिक्रिया देते हुए कह चुके है कि बोफोर्स की तरह इसे भी भूल जाएगी जनता।

पोस्ट-स्क्रिप्ट-- सालों पहले दिल्ली में बेरसराय अपने चाचा जी से मिलने जाना हुआ। संयोगवश चाचाजी तो कमरे पर नही थे, लेकिन उनका रुम पार्टनर मौजूद था। चेहरा जाना-पहचाना लग रहा था, लेकिन कहीं मिले हो इसकी गुंजाइश कम ही थी। आखिर दिल्ली आए हुए कुछ ही दिन हुए थे। रह-रह उनके चेहरे पर नजर चली जाती, आखिर कहां देखा हैं मैने इन्हें। काफी समय तक दिमाग को झकझोरने के बाद भी चेहरा पकड़ में न आया। उनके रुम पार्टनर भी इस बात को ताड़ चुके थे। उन्होंने कहा कि लगता है आपको मेमोरी प्लस की जरुरत है। इतना सुनते ही दिमाग पर लगा ताला खटाक से खुल गया। अरे इनका ही चेहरे तो द हिंदू अखबार के क्लासिफाइड सेक्शन में मेमोरी प्लस के डब्बे के साथ अपीयर होता है। इस बात का एलान करते हुए कि- पहले मुझे कुछ भी याद नही रहता, मेरा खुद पर भरोसा उठ गया था, मेरा आत्मविश्वास डगमगाने लगा था, फिर एक दोस्त की सलाह पर मैने इसका सेवन किया, अब मैं दुगुने उत्साह के साथ तैयारी कर रहा हूं दी। शायद उनका नाम सुनील जैन था, एकदम कंफर्म नही कह सकता। ऐसे में आप मुझे मेमोरी प्लस खाने की सलाह दे तो कोई आश्चर्य नही।

नोट- कृप्या अपने रिस्क पर किसी भी याद्दाशत बढ़ाउ उत्पाद का सेवन करें

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

झूठ इतने बुरे भी नही होते ...

कल बातचीत के क्रम में सुनने को मिला कि राजेंद्र प्रसाद जो भारत के प्रथम राष्ट्रपति होने के अलावा एक अच्छे खासे वकील भी थे, अपने एक मुव्वकिल के साथ नाव से गंगा नदी पार कर रहे थे। मुव्वकिल अपने जमा किए तथ्यों को लगातार बताए रहा था और फिर यह प्रक्रिया जब लगभग समाप्ति के कगार पर थी, हवा के एक तेज झोंके ने उन कागजातों पर कहर बरपा दिया, कागजात मां गंगा की भेंट चढ़ गए। अब मुव्वकिल हैरान-परेशान, जिन तथ्यों-सूचनाओं को जुटाने में उसने सालों लगा दिए, वो पवन देवता की अठखेलियों की बलि चढ़ गए। लेकिन राजेंद्र प्रसाद के चेहरे पर आश्वस्ति का भाव था। उन्होंने उसे कागज-कलम लाने को कहकर चिंतामुक्त हो जाने को कहा... औऱ फिर क्या था रांजेद्र बाबू सूचनाओं-तथ्यों को मुव्वकिल के बताए अनुसार उच्चरित करते रहे और मुव्वकिल लिखता चला गया।

हालांकि मैंने भी दो-एक कहानियां राजेंद्र बाबू के बारे में सुन रखी थी ... लेकिन उन सबमें सबसे अव्वल तो यह था कि संविधान लिखा जा रहा था, सैकड़ों चर्चित चेहरे चर्चा में जुटे थे। महीनों तक काम चला, मगजमारी-माथापच्ची के बाद संविधान लिखा गया। लेकिन संविधान लिखे जाने के बाद अचानक से कहीं खो गया, काफी ढूंढ़ा-ढ़ांढ़ी के बाद भी हाथ न आया। सारे लोग माथा पकड़ कर बैठ गए। इतने महीनों और इतने लोगों की मेहनत पर पानी फिरता दिखता रहा था। ऐसे में राजेंद्र बाबू ने इस राष्ट्रीय समस्या से राष्ट्र को उबारा। उन्होंने हूबहू संविधान को उच्चरित कर पूरी संविधान-सभा की मेहनत पर फिरते पानी को सोख लिया, न एक कोमा इधर, न एक कोमा उधर। खैर एक दूसरी सुनी-सुनायी कहानी भी सुना ही दूं ... कहानी के मुताबिक वाकया कोलकाता के प्रतिष्ठित प्रेसीडेसी कॉलेज में उनके पढ़ाई के दौरान का है। हुआ यूं कि परीक्षाएं चल रही थी और किसी कारणवश रांजेद्र बाबू को परीक्षा हॉल पहुंचते-पहुंचते दो घंटे की देर हो गयी। परीक्षा हॉल में घुसते ही मॉनीटरिंग करते अध्यापक ने उनसे कहा कि क्या फायदा है अब एक्जाम देने का। राजेंद्र बाबू के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान तैर गयी, फिर उन्होंने तंबाकू अपनी हथेली पर ठोका और फिर परीक्षा समाप्त होने से पांच मिनट पहले ही तंबाकू चुभलाते हुए एक्जामिनेशन हॉल से बाहर निकल गए। अब कहानी सुनाने वाले एक अल्पविराम लिया, अब उसके चेहरे पर उर्जा का ब्रॉडबैंडीय प्रवाह साफ-साफ टपक रहा था... हमसे भी उसी अनुपात में जिज्ञासा की डिमांड करता हुआ। कहानी के मुताबिक कॉपी चेक करने वाले एक्जामीनर ने उनकी परीक्षाकॉपी पर एक टिप्पणी दर्ज की एक्जामिनी इज बेटर देन इक्जामनर। कहानीकार का कहना था कि यह कॉपी अब भी कॉलेज के डिस्प्ले बोर्ड पर है।

खैर कहानियां केवल राजेंद्र बाबू के बारे में ही नही सुनी। लाल बहादुर शास्त्री के बारे में सुना कि वो स्ट्रीट लाइट में पढ़ा करते थे। जब भी चश्मायुक्त उनकी तस्वीर नजर आती तो लगता चश्मे के पीछे का अपराधी जरुर उसी स्ट्रीट लाइट से निकलने धुंधला प्रकाश-प्रवाह होगा।खैर तमाम लोगों के बारे में तमाम कहानियां पढ़ी सुनी। ... और मां बाप भी ऐसी कहानियां सुनाकर सालों तक अपने बच्चे को कोंचते और अक्सर ठुकाई भी कर डालते।

खैर ये तो हुई महापुरुषों की बात, मेरे एक बड़े भाई इंजिनयरिंग कॉलेज में थे और उस समय हम बमुश्किल तीसरे-चौथे में होंगें। मम्मी को जब भी हमें पीटना होता तो उनका उल्लेख बारंबार होता। देखो वो होस्टल में रहता है , क्लास वाले उसको पढ़ने नही देते, परेशान करते हैं। उसे पढ़ाई से दूर करने के लिए उस जबरदस्ती फिल्म देखने पर मजबूर करते है... ऐसे तमाम तरह के किस्से। मेरा उद्देशय उनके संघर्ष को कमतर आंकना नही है, लेकिन आप ही बताइए कि किस होस्टल में ऐसी घटना-परिघटना नही होती।

बचपन से हमलोगों ने न जाने कितने झूठ सुने होगें... और अक्सरहां बालपन में उसे सच भी मान बैठते है। खैर बालपन को बख्श भी दे तो आप उम्र के किसी भी पड़ाव पर हो, रक्त-तंतुओं, अस्थि-मज्जा तक में जो एक इनकी घुसपैठ हो जाती है, लगातार बनी-बहती रहती है। ...लेकिन इन निर्दोष झूठों को खारिज करने की इच्छा भी नही होती। जितनी बार सुनता हूं,  दिमाग को रेस्ट देकर दिल को इस मोर्चे पर लगाता हूं। ऐसे ही न जाने कितने मिथक है जो सच्चाई और तथ्यपरकता की कसौटी पर भले ही खरा न उतर पाएं लेकिन उनके पॉस्टमॉर्टम से परहेज करने का मन करता है। ...और वैसे भी सच कौन जानना चाहता है ...कम से कम मैं तो नही।

बुधवार, 31 अक्टूबर 2012

चुक्का, चौकी और पंचिग मशीन ...

बचपन के दिन थे, कब कौन सी चीज मन को लुभा जाय इस पर दिमाग का आतंक वैसे भी नही रहता। कब फुक्के पर आंख फफकने लगे और कब चींटी देखकर दिल चहकने लगे ,कहना मुश्किल ही होता है। वो तर्क की बेवजह आवाजाही पर लगाम के दिन होते हैं, अनुभव बिल्कुल प्योर होता है, और ग्रे एरिया की कोई गुंजाइश भी नही होती। खैर तब ज्यादातर अल्युमीनियम के पैसों से ही हमारा पाला पड़ता था, लोहे के पैसे भी चव्वनी-अठन्नी से ज्यादा पॉकेट में रहते नही थे और फिर वो टिकते कहां थे। 

उन दिनों हमारे चाचा की दुकान पर एक पंचिग मशीन यानि स्टेपलर हुआ करती थी, जो फट चुके पैकेटों को स्टेपल करने के काम आता था। जब भी कभी चव्वनी के तकादे में वहां जाता, स्टेपलर की खट-खट मन मोह लेती। काम के बाद स्टेपलर के सुस्ताने की जगह दुकान का गल्ले था, जो थी हमारी पहुंच से दिल्ली दूर। स्टेपलर की तरफ मन में एक खिंचाव सा पैदा हो गया और दिन-ब-दिन यह आकर्षण बढ़ता ही चला गया। गाहे-बेगाहे उस पर मालिकाना हक के सपनें देखा करता।स्टेपलर के इस मोह ने कुछ ऐसा करने पर मजबूर कर दिया, जिसे याद कर अब ठहाके लगाने का जी करता है। खैर अब सपनें भी स्टेपलर के ही आने लगे... कभी अपनी किताब के फटेहाल होने को कल्पित करता और खटाखट खट-खट कर उसे ठीक करने की। कभी अलग-अलग पन्नों पर लिखा-पढ़ी कर उसे पंच कर किताब की शक्ल देने के सपने देखता। यानि उसके उपयोगिता की तमाम संभावनाओं को मन एक-एक कर और निरंतर एक्सप्लोर करने में अक्सर जुटा होता। 

उन दिनों चुक्के का खूब चलन था, मिट्टी से बने ये चुक्के लगभग हर परिवार में बच्चों की संख्या के मुताबिक होते, जिनका इस्तेमाल सिक्कों को जमा करने में होता, जिसे मेरे दादा जी बैंक कहा करते थे।... और सच में वो किसी बैंक से कम भी नही था। अक्सर मां-पिताजी बच्चों के किसी डिमांड पर उसे सिक्का थमाते और फिर बच्चों के हाथों ही सिक्का उस चुक्के को समर्पित करवा देते। बच्चों को आश्वस्त किया जाता अरे तुम्हारा ही तो पैसा है। बच्चे जब भी किसी चीज की जिद करते तो घर वाले कहते, अरे सौ सिक्के तो हो जाने दो, फिर खरीद लेना। लेकिन ऐसा भी नही था कि चुक्के पर मालिकाना हक बच्चे का ही हो। कभी घर में पर्याप्त पैसा न होने की हालत में या फिर पापा से बिना पूछे किसी सामान की खरीद में वो चुक्का बड़े काम का होता। कह सकते हैं कि ऐसे मौकों पर पहली नजर चुक्के पर ही लोगों की पड़ती... और हां चुक्के से पैसे के बाहरी दुनिया में निर्गमन में  तार या फिर जीभ साफ करने वाले जीविया की खूब मदद ली जाती, और इस मामले में अक्सर हर कोई अपने को दूसरे पर बीस समझता।

खैर महीनों विचार-विमर्श के बाद नकदी के दूसरे श्रोतों की अनुपस्थिति में हमारी यानि मेरी और मेरे भाई की नजर इसी चुक्के पर गयी। हम प्लानिंग में जुट गए, क्या कैसे करना है इस पर हमने कई सप्ताह विचार-विमर्श किया। स्टेपलर की कीमत दो-तीन दुकानों पर पता की, कहीं कोई कुछ स्टेपल कर रहा होता तो उस पर भी खूब गौर फरमाया जाता।... और हां उन दिनों हमारे मोहल्ले में उपकार सामान्य ज्ञान की किताब भी खूब चलन में थी। एक पतली वाली और दूसरी मोटी वाली- डायजेस्ट (शायद उस फॉर्मेट में आनी अब बंद हो गयी है, बहुत दिनों से देखी नही है। ), ऐसे में हमने चुक्का फोड़कर इन दोनों अविलंब जरुरतों को पूरा करने का फूलप्रूफ खाका तैयार किया। हमने अपने सोने वाली चौकी के नीचे जमीन पर गड्ढ़ा खोदा और और एक प्लास्टिक की थैली में चुक्के से निकले पैसे को वहां के धुप्प अंधेरे में समर्पित कर दिया। अब उस कमरे में हर दिन झाडू-बहारु का जिम्मा हमने अपने मासूम कंधों पर ही ले ली थी। 

हमारे कस्बे में स्टेशनरी की एक मानी हुई दुकान थी- लाइट हाउस हमने वहां से स्टेपलर तो ले ली, लेकिन अब पकड़े जाने का डर दिलो-दिमाग पर हावी हो गया। खैर दो-तीन बाद चुक्के की अनुपस्थिति को हमारे दादा जी की पारखी नजर ने ताड़ लिया, अब हर रोज सुबह-शाम चुक्का पुराण शुरु रहता। दादा जी चुक्के की खोज के मिशन पर जुट गए थे। हर एक की गतिविधि पर उनकी पैनी निगाह होती। खैर बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी वाली स्थिति थी, पकड़ा जाना था और हम पकड़े गए। आखिरकार एक दिन पंचिग मशीन की खट-खट की आवाज उनके कानों को खटक गयी। ... और फिर उसके बाद के अनेकानेक दिन हमारे शामत के दिन थे। उस दिन की हमारी धुलाई-सफाई के बाद भी कई दिनों तक हम धुलते-धुनाते रहें।

सोमवार, 29 अक्टूबर 2012

ये अंदर का मामला है ...

पहले ही कहता चलूं कि ऐसा नही है कि बाकी जगहों पर बेटें-बेटियां-बीवियां, भाई-भतीजे-भौजाइंआ नही है, लेकिन यहां मामला उन सार्वजनिक पदों का है, जिस पर आसीन होने की गलियों और रास्तों का लोकतांत्रिक होने का दावा किया जाता रहा है, और लोकतांत्रिक होना जरुरी भी है, ऐसे में सवाल उठने लाजमी है और जरुरी भी है। हालांकि राजनीतिक दलों का जिक्र संविधान में नही है और न ही इस संबंध में किसी बनावट-बुनावट को प्रीस्क्राइब किया गया है, लेकिन उद्देशिका, संविधान की भावना-भाव-भंगिमा और अब मूल ढ़ांचे के तहत उसके लोकंतांत्रिक होने की उम्मीद तो की ही जा सकती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विशाल आकार और जनसंख्या वाले देशों में राजनीतिक दलों के कंधों पर ही लोकतंत्र को प्रतिष्ठित करने की जिम्मेदारी आन पड़ती है, ऐसे में स्वाभाविक है कि राजनीतिक दलों की धमनियों में लोकतंत्र के प्रवाहित होने की उम्मीद लोग किया करते हैं, पाल बैठते हैं। हालांकि ऐसा नही है कि मंत्रिमंडल विस्तार कोई पहली बार हुआ है, और सियासी रसूख वाले खानदानी परिवारों की इसमें बड़ी दखल कोई पहली-पहली दफा है, लेकिन इस को यह कर चर्चा से परे नही किया जा सकता कि ये तो चलता ही है या इसमें नया क्या है। वैसे इंसान उम्मीद ही छोड़ दे , सवाल न करे तो फिर तो फिर आखिर क्या बचा रह जाएगा ? पाश की एक महत्वपूर्ण कविता भी है- सबसे खतरनाक है सपनों का मर जाना।

कुछ दिनों पहले जेएनयू की लाइब्रेरी की दीवार पर उदय प्रकाश की एक कविता चस्पां दिखी थी, जिसका एक हिस्सा था-

कुछ नही सोचने और कुछ नही
बोलने पर
आदमी
मर जाता है

खैर ... यूपीए-2 मंत्रिमंडल की इस तीसरे फेरबदल या विस्तार में 7 काबीना स्तर और 11 लोगों को राज्यमंत्री के रुप में शपथ दिलायी गयी। ऐसा में सोचा कि एक बार नजर डालूं कि आखिर बहू-बेटों-बेटियों की कितनी तादाद है इस बार।

मानव संसाधन मंत्रालय का पदभार संभालने वाले और आंध्र प्रदेश के काकीनाडा से सांसद एमएम पल्लम राजू के पिता एम एस संजीवी राव 1982-84 तक इंदिरा गांधी मंत्रिमंडल में केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं और एम एम पल्लम राजू नौंवी लोकसभा में सबसे युवा सदस्य थे। वैसे राजनीति में अक्सर युवाओं को भागीदारी देने की बात की जाती रही है, लेकिन राजनीति में युवाओं की खेप का गलियारा अक्सर राजनेताओं के आंगन से ही निकलता मालूम होता है। पल्लम राजू अकेले नही है जिनके नाम राजनीति में युवापन के प्रतीक है, दिल्ली विधानसभा के अब तक के सबसे युवा विधानसभा अध्यक्ष अजय माकन भी सियासी रसूख रखने वाले खानदानों में से है। उनके चाचा और दक्षिणी दिल्ली से पूर्व सांसद ललित माकन का भी खासा जलवा था। बताते चले कि ललित माकन पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा के दामाद थे। ललित माकन की हत्या के बाद अजय माकन अपनी खानदानी जिम्मेवारी निभा रहे है। ललित माकन के दामाद अशोक तंवर अभी सिरसा से लोकसभा के सांसद है ।

नई संस्कृति मंत्री की जड़े राजघरानों से होकर गुजरती है। जोधपुर राजघराने में जन्मी चंद्रेश कुमारी कांगड़ा के कटोच राजघराने की बहू है। हिमाचल में वीरभद्र सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में मंत्री भी रही और अब कहा जाता है कि हिमाचल न लौटने के एवज में उन्हें कैबिनेट में जगह मिली है। विधि और न्याय के कैबिनेट मंत्री का पदभार संभालने वाले अश्विनी कुमार भी पंजाब के मशहूर राजनीतिक परिवार से है । उनके पिता प्रबोध चंद्र पंजाब विधानसभा में अध्यक्ष के पद पर आसीन रहे हैं। सूचना एवं प्रसारणमंत्री का स्वतंत्र पदभार संभालने वाले मनीष तिवारी के नाना सरदार तीरथ सिंह जहां पंजाब (पेप्सू) के कांग्रेस सरकार में जहां मंत्री रह चुके हैं वही पिता वी एन तिवारी भी राज्यसभा में मनोनीत सांसद थे।

बिहार के कटिहार संसदीय क्षेत्र से पूर्व लोकसभा सांसद और अब महाराष्ट्र से राज्यसभा सांसद कृषि राज्य मंत्री तारिक अनवर भी सियासी रसूख वाले परिवार से आते हैं। उनके दादा बैरिस्टर शाह मोहम्मद जुबैर तीस के दशक में बिहार-उड़ीसा प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष थे और पिता शाह मुश्ताक अहमद बिहार विधानसभा के सदस्य। रेलवे राज्यमंत्री के रुप में नियुक्त और रायलसीमा इलाके के कर्नुल सीट से सांसद कोटला जय सूर्यप्रकाश रेड्डी के परिवार का भी राजनीतिक इतिहास रहा है। उनके पिता कोटला विजयभास्कर रेड्डी दो बार आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। सूर्यप्रकाश रेड्डी जब पहली बार लोकसभा के लिए 1994 में चुने गए थे तो उनके पिता विजयभास्कर रेड्डी मुख्यमंत्री पद पर आसीन थे।

आदिवासी मामलों के मंत्रालय की राज्यमंत्री बनी रानी नाराह के पति भरत नाराह वर्तमान तरुण गोगोई सरकार में मंत्री है। असम की तरफ से क्रिकेट खेल चुकी रानी नाराह बीसीसीआई में विलय तक वुमेंस क्रिकेट असोशिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष पद की शोभा भी बढ़ा चुकी है। वैसे रक्षा राज्य मंत्री के पद पर नियुक्त लालचंद कटारिया की भी खेलों से जुड़ी पृष्ठभूमि रही है और वो कबड्डी के राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी रह चुके हैं। लालचंद कटारिया भी विधायक रह चुके अपने पिता रामप्रताप कटारिया की राजनीतिक विरासत संभाल रहे हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री अबु हाशिम खां चौधरी जहां कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे ए बी ए गनीखां चौधरी के भाई हैं वहीं दीपा दाशमुंशी पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी की पत्नी है। प्रियरंजन दासमुंशी अभी कोमा में है, ऐसे में उनकी विरासत अब उनकी पत्नी संभाल रही है। वैसे कुछ अन्य नामों पर गौर करें तो केंद्रीय मंत्रिमंडल में संचार और सूचना प्रौद्योगिकी राज्यमंत्री के रुप में नियुक्त श्रीकाकुलम से सांसद किल्ली कृपरानी की अनेक उपलब्धियों से से एक उनकी किताब `हंड्रेड ईयर सागा ऑफ नेहरु फैमिली` भी है। वो तेलगूदेशम पार्टी के हैवीवेट येर्रन नायडू को हरा कर लोकसभा के लिए चुनी गयी है। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री के रहमान खान कभी लोकसभा से नही चुने गए और बीते दो दशकों से राज्यसभा के सदस्य है। वो राज्यसभा के उप-सभापति भी रह चुके हैं।

अन्त में ... साल 1981 में प्रकाश मेहरा के निर्देशन में और अमिताभ-जीनत अभिनीत एक फिल्म आयी थी, जिसका एक मशहूर गाना था मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है ...। आज के राजनीतिक परिदृश्य यह लाइन फिट बैठती है... आखिर यह बेटे-बेटियों, भाई-भतीजों का ही आंगन तो है।

पोस्ट-स्क्रिप्ट--- नए श्रम और रोजगार राज्यमंत्री और केरल के मावेलीकारा से चुने गए के. सुरेश के निर्वाचन को केरल उच्च न्यायालय ने स्कूल-सर्टिफिकेट में उनके ईसाई धर्मालंबी (उन्होंने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था) दर्ज होने के बावजूद दलितों के लिए आरक्षित सीट पर चुनाव की वजह से खारिज कर दिया था, लेकिन एक साल बाद सर्वौच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश को इस आधार पर खारिज कर दिया कि वो पुनर्धर्मातंरण के बाद ईसाई नही रह गए थे।

गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

डफली-वाले , काजोल और दुर्गा-पूजा ...

दुर्गा-पूजा की दशमी के दिन चाहे-अनचाहे सिनेमाघर जाता रहा हूं , कम ही बार हुआ है कि नही गया होउंगा। अव्वल तो हमारे यहां पर्व-त्योहारों पर नयी-नयी फिल्में सिनेमाघरों में लगती थी और दूसरी बात यह कि सिनेमा हमारे परिवार में बीमारी जैसी मानी जाती थी। लोग सिगरेट, शराब के बाद व्यसन की श्रेणी में अगला नाम सिनेमा का ही लेते थे। ऐसे में दुर्गा-पूजा और छठ ही कुछ ऐसे गिने-चुने मौके थे जब सिनेमा के मसले पर थोड़ी-बहुत ढ़ील मिल जाती थी। दूसरी वजह यह भी कि परिवार में अधिकांश लोगों की दुकान होने की वजह से कम ही ऐसे मौके आते थे जब सिनेमा के लिए लोगों को फुर्सत मिल पाती थी। सातों दिन सुबह से रात दुकान पर बैठने और सिनेमा और वो भी रात का शो ,जो किसी टैबु की ही तरह ही था इन मौकों को काफी खास बना देता था। कह सकते है यह वो जमाना था जब सिनेमा किसी उत्सव की तरह था औऱ एक शो का टिकट न मिलने पर तीन घंटे रुककर अगले शो की टिकट के लिए लाइन में लगने से भी लोगों को परहेज नही था। चूंकि इन मौकों पर अगल-बगल के गांवों से लोग मूर्तियां देखने, समोसा-चाट खाने और फिर सिनेमा देखने के त्रिआयामी लक्ष्य के साथ भी जुटते तो फिर ठेलमठाल भी गजब भी होती।

दुर्गा पूजा पर कई फिल्में देखी- अभिषेक-करीना की रिफ्यूजी से लेकर मिथुन की देवता तक। भीड़ इतनी कि एक-दो बार डीसी का टिकट लेकर बेंच पर बैठना पड़ा और न तो पीठ-पीठ का अंतर रहा और न पसीने-पसीने का। ककड़ी पर छिड़का नमक घुलकर बगल वाले के पनियाबरफ से टपकते रंगीन तरल के साथ घुल जाने वाली स्थिति कह सकते हैं आप।

प्रकाश झा की चक्रव्यूह फ्रायडे अवतरण के सिनेमाई संस्कार के उलट दशमी के दिन रीलिज हो रही थी तो सोचा चलो परंपरा भी निभाता ही चलूं। बतरा पहुंचा तो पाया कि चक्रव्यूह का पोस्टर चिपका होने के बावजूद स्टूडेंट ऑफ द ईयर ही पर्दे को प्राणवान कर रही थी। टाइमिंग ऐसी कि कहीं दूसरी जगह जाने का स्कोप भी नही था। सोचा करण जोहर के डायरेक्शन में सालों बाद कोई फिलम आयी है , ठीक ठाक ही होगी। हालांकि फिल्म उनके पुराने फिल्मों की सस्ती नकल निकली। एक ऐसा स्कूल जिसमें पढ़ने के अलावा सारे कर्म और कांड होते हैं , एक ऐसा बाप जो अपने बेटे की पराजय की संभावना पर जहरीली मुस्कान बिखेरता है और एक ऐसी मां जो अपनी बेटी को अपने सहपाठी को रिझाने के लिए पुश-अप ब्रा से लैस करने की मानसिकता रखती है । ... औऱ सबसे अव्वल तो स्टूडेंट ऑफ द ईयर की ट्रॉफी जो पढ़ाई पर कम और ट्राइथॉलोन की कसौटी पर फिट होने की ज्यादा डिमांड रखती है मानो इवी लीग यूनिवर्सिटी में जगह पाने की बजाय ओलंपिंक के लिए क्लाविफाइंग मुकाबला हो।

हालांकि सालों बाद काजोल को पर्दे पर देखना सुखद था , भले ही सीन कुछ सेकंड का हो ,और एक बात और, `कुछ-कुछ होता है` में शाहरुख की बेटी अंजली इस फिल्म में बतौर सहायक हीरोईन एपीयर हुई है। वैसे डीन के रुप में रिषी कपूर भी डफली बजाते हुए देखे जा सकते हैं - वैसे इस बार उनकी डफली के निशाने पर मदमाती जया प्रदा की जगह माचोमैन रोनित रॉय हैं।

बुधवार, 24 अक्टूबर 2012

वो बक्सा अब भी किसी कोने में हैं ...

उस बक्से की पेट में काफी कुछ था- स्प्रिंग की गर्दन और रुई की दाढ़ी वाला बूढ़ा जो गाहे-बेगाहे हिलते गर्दन से रह-रह अपनी उपस्थिति का अहसास कराता था, टिन की कमानी और उससे जुड़ी लाल-पीली चिड़ियानुमा आकृति जो कमानी दबाए जाते ही चांय-चांय करती थी, काले शरीर और सफेद चोंच वाली चुटपुटिया बंदूक जिसकी 25 गोलियों का एक पैकेट 25 पैसे में ही मिलता था, जो ट्रिगर की खट-खट के साथ पट-पट का साउंड करती थी, एक कालिया वाला पीपुह जिसे ओठों के बीच दबाते ही नाक के अगल-बगल प्लास्टिक की मूंछ उभर जाती और फूंकने पर पी-पी की आवाज निकलती ... और भी न जाने कितना कुछ।

पर्व-त्यौहार उस बक्से का वसंत होता, उसे नई-नई खुराक मिलती, नए-नए खिलौने पुरानों के बीच जगह बनाते और हमारी हलचलों के चक्रवात के केंद्र में यह बक्सा होता। दो कमरों के किराए के घर में भी उस बक्से की अपनी एक खास जगह थी और स्कूल के बाद की दौड़ इस बक्से वाले कोने पर ही जाकर खत्म होती।

दुर्गा-पूजा इस बक्से के लिहाज से खास था, आखिर दस दिनों तक मेला जो लगता था। एक तो अच्छी-खासी छुट्टियां उस पर से गांव-कस्बा-जिले के हाट-मेलों में जाने का बारंबार मिलने वाला मौका । अष्टमी-नवमीं को गांव जाना होता और मेले का मजा गांव से बेहतर कहीं होता भी नही था। दस पैसे में लोहे के छल्ले से चौकी पर बिखरे सामानों पर निशाना लगाते... चेक-मार्गो साबुन से लेकर सौ रुपए के नोट तक पर, पानी भरी बाल्टी के तल पर रखे गुल के डिब्बे की ओर दूने की उम्मीद में सिक्का तैराते, बंदूक से बैलून पर निशाना लगाते और सर कटे आदमी, चार हाथ-चार पांव वाले अजब-गजब आदमी को देखते। कभी-कभार मौत के कुएं में झांककर बाइक पर स्टंट देखने का आनंद भी मिलता... और फिर रात को जग्गा डाकू वाला नाटक भी देखते। उन दिनों जबकि पॉकेट खर्च चव्वनी के लगभग हुआ करती थी, दुर्गा पूजा- दशहरे पर इस चव्वनी की जगह अठन्नी-रुपए हाथ आते। जनसंख्या की राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय समस्या के विपरीत चाचाओं-फूफाओं-फूआओं-मौसे-मौसियों की अच्छी खासी संख्या हम बच्चों के लिए वरदान हुआ करती। दोपहर से ही हम चाचाओं की दुकानों पर तगादे पर पहुंच जाते और चव्वनी-अठन्नी हाथ में आने के बाद ही विदा लेतें और फिर किसी बुआ से 5 रुपए का नोट मिल जाता तो समझिए की चांदी ही चांदी। उस पर से साथ में अगर घूमने निकले तो झिल्ली-कचड़ी का बोनस अलग से।

इसी मेले में पहली बार जीके यानि सामान्य ज्ञान की एक पतली-दुबली किताब भी ली थी। अब आप ही कहिए जब बेचने वाला लगातार बताए जा रहा हो कि कौन पेड़ इंसानों जैसा दहाड़ मार कर रोता है , किस मछली के दो दिल होते है और किस पेड़ से करंट निकलती है के जवाब इस किताब में है तो ऐसे में कोई भी जिज्ञासु विद्यार्थी क्या करें, सो हमने भी पढ़ाई में अपनी दिलचस्पी का हवाला दे-देकर किताब अपनी मम्मी से खरीदवा कर ही मानी।

खैर बात अब उस बक्से की, जिसकी बात से बात शुरु हुई थी। उस बक्से के साथ अपना रिश्ता काफी पुराना था। कह सकते हैं उस जमाने से जब चमचमाते रग-बिरंगे प्लास्टिक-रेक्सीन के स्कूल बैग कुछ चुनिंदा पीठों पर ही विराजमान होते। बच्चें उन दिनों टीन, अल्यूमीनियम और स्टील के बक्से में किताब-कॉपियां-पेंसिल-कलम और कॉमिक्स स्कूल ले जाते। टिफीन के समय इन बक्सों को गेंदों से मारधाड़ खलते समय अपना ढ़ाल बनाते और बारिश होने पर छाते की तरह इससे सर ढ़ांपते। उस पर न जाने कितनी कीलें ठुक चुकी थी, टिन के पत्तर के दो-तीन पैबंद भी उस पर उग आए थे लेकिन छठी क्लास तक हमारा और उस बक्से का साथ रहा।

खैर स्कूल बैग के साथ कड़ी टक्कड़ में ये बक्सें आउटडेटेड करार दिये गए, लेकिन इस बक्से ने हार नही मानी। उसके जीवट की दाद देनी होगी , नई परिस्थितियों में भी उसने अपने लिए जगह बना ली है। अब उस बक्से में दुकान के पुराने पुरजें पड़े रहते हैं और अब भी एक कोने में पड़ा है, शायद दुर्गा-पूजा की याद उसे भी आ रही होगी मेरी तरह ही। 

सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

पवित्र लीलाओं का पुर्नपाठ जरुरी ...

रामलीलाओं की लीला फिर अपने उफान पर है। अभी दिल्ली में हूं और इन दिनों जिधर से भी गुजरता हूं, पंडाल तना - मंच बना मिलता हैकभी गहराती रात के समय विचरण करें तो अधिकांश पार्क और खुले स्थान अयोध्या, किष्किंधा या फिर लंका में तब्दील मिलेंगें। राम `तुझे देखा तो यह जाना सनम` की बैकग्राउंड पर रोमांटिक उतारु हुए दिख सकते हैं और रावण `नायक नही खलनायक हूं मैं` की तर्ज पर अट्टाहास करते हुए देखा जा सकता है। बुराई पर अच्छाई की विजय अक्सरहां हमारी संस्कृति के मूल में, इन परंपरा-कहानियों में बताई-समझायी जाती रही है... और इसमें कोई बुराई भी नही है। समस्या इस बात की है कि इन लीलाओं में इन मूल्यों के प्रतिनिधि शायद ही वर्तमान परिस्थितियों में अच्छाई और बुराई के नवीन मानदंडों पर ठठ पाए, अग्निपरीक्षा से साबुत निकल पाए। 

बीते दिनों फेसबुक पर एक पिता-पुत्री संवाद खूब चर्चा में रहा प्रसंग अपनी संभावित संतान के सिलसिले में बेटी से एक पिता की बातचीत है। इस बातचीत के क्रम में बेटी रावण जैसा भाई की चाहत बताती है। एकबारगी हास्यास्पद लगने वाली इस चाहत के पीछे के तर्क किसी को भी सोचने को मजबूर करने वाले हैं। छाया जैसी साथ निभाने वाली गर्भवती निर्दोष पत्नी का त्याग करने वाले राम और बहन के अपमान और अंग-भंग के बाद शत्रु की स्त्री को हरण करने के बाद भी स्पर्श न करने वाले रावण के बीच का चुनाव शायद बेटी के लिए ज्यादा मुश्किल भी नही होगा। चौदह साल वनवास और अपहरण की भीषणता के बावजूद सीता की अग्निपरीक्षा आखिर किन मर्यादाओं का सूचक है। ऐसे में मर्यादापुरुषोत्तम का तमगा यूरोपीय यूनियन या फिर ओबामा को शांति के लिए नोबल पुरुस्कार के तुल्य ही मालूम होता है। 

कुछ दिनों पहले नोम चोमस्की का लिखा पढ़ा कि द जेनरल पीपुल डॉन्ट नॉ व्हाट्स हैप्पनिंग, एंड इट डज नॉट एवन नो दैट इट डज नोट नॉ। आजकल वैसे भी आस्था पर कोई भी सवाल लोगों की आंखो और हाथों की खुजलाहट बढ़ाती दिखती है, ऐसे में आस्थाओं-मान्यताओं से जुड़ी धमनियों और शिराओं का शुद्धीकरण तंत्र जो पहले से ही खस्ताहाल था, और भी सिकुड़ता दिख रहा है। जब चरित्र और घटनाएं आस्था की देहरी में सिमट जाते हैं या सिमटने लगते हैं तो पाप-पुण्य की जोड़ी भी एक के साथ एक फ्री की तर्ज पर इससे जुड़ी-गुंथी मिलती है और इन सबसे भी आगे जाकर जब यह पहचान करार दे दिए जाते हैं तो समाज-समुदाय न केवल वैज्ञानिकता-तार्किकता की बलि ले लेता है बल्कि असहिष्णु और अलोकतांत्रिक हो जाता है। बदलते समय को बदमिजाज करार देकर खारिज करने की प्रवृति से परहेज करते हुए आस्था के इन किलों की पवित्रता पर संदेह की जरुरत है, नवीन समतावादी मूल्यों की कसौटी पर इन पवित्र पात्रों-परंपराओं को कसने की जरुरत है। सालों पहले स्टीवन ल्यूक्स के शक्ति के तृतीय आयाम के सिंद्धांत को स्पष्ट करते हुए राजनीति विज्ञान की एक टीचर ने प्रेमचंद के ठाकुर का कुंआ कहानी को उद्धृत किया था। दलितों का कुंआ सूख जाने के बाद की परिस्थिति में बीमार पति के गले को तर करने किए एक दलित औरत रात के सन्नाटे में ठाकुरों के कुंए में बाल्टी डालने की हिम्मत तो जुटाती है, लेकिन पानी नही निकाल पाती । वजह हिम्मत का अभाव नही बल्कि उसके मन में इस सवाल की उत्पत्ति थी कि कहीं उससे कोई पाप तो नही हो रहा ?

पोस्ट स्क्रिप्ट कुछ साल पहले एक पत्रिका में रावण-वध के असर से जुड़ी एक रोचक सामग्री पढ़ने को मिली। ब्राह्मण रावण की क्षत्रिय राम के हाथों मृत्यु के बावजूद जिन ब्राह्मणों ने ब्राह्मणहंता राम की पूजा की, उन्हें तडीपार कर दिया गया ( सरयू के पार) ... और पंडितो की यह वैरायटी सरयूपारीण ब्राह्मण कहलायी। पत्रिका के मुताबिक ब्राह्म्णो के बीच सरयूपारीण को ज्यादा सम्मान से नही देखा जाता, जिसकी वजह ब्राह्मण समाज का अपने समुदाय के इस हिस्से का यहि सदियों पुराना बहिष्कार है।