शनिवार, 30 जून 2012

उठापटक

भाईसाहब मन कुलबुला रहा है... जैसे, जब पानी को प्यूरीफाई करने के लिए ब्यॉल किया जाता है न, वैसे ही... पानी खदबद करता रहता है , बुलबुला बनता-फूटता है , बर्तन की तलहटी पर कुछ ठोस जैसा जमा होता है... वैसा ही कुछ मन में भी खदबद हो रहा है। 

मैं जानता हूं कि सच वो नही जो अक्सर मैं मान बैठता हूं , लेकिन बात ऐसी है कि मन और मस्तिष्क के बीच की उठापटक में मन हमेशा बीस ही पड़ता दिखता है । ... 
आजकल सुबह और दोपहर के बीच का फासला कुछ कम सा हो गया है, दोपहर सर पर चढ़ा सा रहता है... बिल्कुल जिंदगी के माफिक... 
दिन और रात दिमाग के भी फेर होते हैं... कभी `शोर` सुकून भी देता है... सब हेरा-फेरी है... 

अक्सर तारों को उलझा हुआ पाकर आश्चर्य होता है- अरे अभी अभी तो ठीक ठाक था, रखे-रखे कैसे उलझ गया। दिमाग के तार भी कुछ ऐसे ही उलझ पड़े हैं। 
घूम-फिर के फिर वहीं आ पहुंचता हूं, जहां से आगे जाने को निकलता हूं... हां इतना तो है कि केंद्र भले ही पिछला वाला रहा हो, परिधि हर अगली बार बड़ी हुई है... 

पता नही क्यूं 
लेकिन अक्सर ऐसा होता है
जब भी
चालें बदलता हूं
पासे पटकता हूं
तब खेल दूसरा शुरु हो जाता हैं
कुछ दूसरा ही ... 

दिल और दिमाग में सौतिया डाह होता है, हमेशा बेवजह लड़ते-झगड़ते रहते है... और लगातार आपसी मार-कुटाई के बावजूद भी अक्सर किसी कन्क्लूजन पर पहुंचते नही दिखते... गजब की इनर्जी है भाई इन दोनों की... आदमी भले ही थक जाए ये नही थकते... नींद और सपने की प्राचीर और परकोटे को भी भेद ही डालते हैं... 
जागती आंखों से हम अक्सर सपना देखते हैं और ये सपनें हमें सोने नही देते... और नींद में हम इन सपनों के एक्सटेंशन में जीते है, उसके विस्तार में... तमाम लाव-लश्कर, भव्यता के साथ और कल्पना की उड़ान भड़ते हुए सपने, विस्तारित सपनें... दुनियावी सीमाएं जहां सपनों की सीमा नही तय करती और संभव-असंभव, सच-झूठ जिसकी परिधि से परे होते हैं... सपनें वास्तविकता की कठोरता को नम करते है और इससे पार पाने की उर्जा देते हैं और फिर नयी वास्तविकता जन्म लेती है और नए सपने भी... 

जब आप अंधेरे भरे अंतहीन से लगने वाले सफर में चाहे-अनचाहे यात्री होते हैं तो पाते हैं कि अंधकार के नख-दंत भी धीरे-धीरे भोथरे हो जाते हैं... उसकी मारक-दाहक क्षमता भी उतनी कंटीली नही रह पाती... गहन अंधकार में हम पहले अपने अगल-बगल की चीजों को टटोलते हैं , अनुमान लगाते है , अपने सुभीते को तलाशते है... सेफ प्लेस ढूंढ़ते है... आहट, पदचाप और तमाम ध्वनियों को लेकर भी हमारी समझ का विस्तार होता है... फिर अंधकार की अदृश्यता भी उतनी नही रहती, चुभन कम हो जाती है... सच में न तो सुख और न ही दुख दोनों ही कभी संपूर्ण और स्थिर होते हैं या रह पाते हैं । 

कभी कभी शून्य आप पर हावी होने लगता है और चुनौती उसे तोड़ने और बदलने की होती है... 
कई बार सिरे से शुरुआत की जरुरत होती है... 

सीढ़ी पर फिसलकर सिर के बल गिर गया, बावजूद इसके कि चोट अच्छी-खासी आई दोस्तों ने कहा चलो इसी बहाने शायद दिमाग `ठिकाने` पर आ जाए... नई मुख-मुद्रा में आशा आश्चर्यभाव जगा रही थी और तर्कों से परे थोड़ी-बहुत उम्मीद भी पैदा कर रही थी... 

(29Apr2012)

गुरुवार, 28 जून 2012

अनडेमोक्रेटिक फेसबुक

जब भी फेसबुक पर पोस्ट की गयी किसी तस्वीर,कमेंट या किसी भी सामग्री पर `लाइक` का आप्शन देखता हूं, तो फेसबुक भी अनडेमोक्रेटिक सा लगता है।ये `लाइक` वाला आप्शन नन-आप्शन सा मालूम होता है, अग्रेजी में एक टर्म है- होब्संस च्वाइस, बिल्कुल वैसा ही। फेसबुक से तो अपील यही है कि वो अनलाइक का भी आप्शन दे, डेमोक्रेटिक प्रोसेस में सहमति की चापलूसी औऱ ठकुरसुहाती ,और बहुमत की शांति के बीच असहमति की जगह भी बनी रहनी चाहिए। 

मेरे ख्याल से यदि फेसबुक अनलाइक का ऑप्शन देता, तो कुछ लाइक वाले दूसरे पाले में देखने को मिलते... ऐसे लोगों के साथ पूरी पूरी सहानुभूति है जो फेसबुक की इस संरचनात्मक खामी की वजह से अनलाइक की जगह किसी पोस्ट को लाइक करने को मजबूर होते है... लाइक कई फेसबुकियों के लिए मजबूरी सरीखा है ,या कहें तो उनकी उंगलिया लाइक के बटन को रेसिस्ट ही नही कर पाती और ऐसा स्वाभाविक भी है, आखिर दैनदिनी की थकान , एकरसता के बीच लाइक का बटन दबाना लोगों को गतिवान, उर्जावान होने का अहसास जो कराता है... 

(10Dec2011)

बुधवार, 27 जून 2012

लोकपाल पर कुश्ती

लोकपाल पर संसदीय ड्रामे में कांग्रेसियों की लचर कोरियोग्राफी से इतना तो साफ है कि उसे `सियासी फराह-सरोज खानों` की सख्त जरुरत है... अंतिम घंटे में बचे-खुचे इंप्रेशन की वाट लग गयी... अव्यवस्था की आउटसोर्सिंग राजद-राजनीति को सुपुर्द कर दी गयी थी, जिनके बिल फाड़ने के अंदाज में तल्खी कम नाटकीयता ज्यादा थी , वहीं टकटकी लगाकर पिछले तीन दिनों से टीवी स्क्रीन पर नजरें जमायी जनता को नारायणसामी की चिल्ल-पौ , पवन बंसल की धारहीन और सभापति की अटकती आवाज और अंदाज के सुपुर्द कर दिया गया था। 

इतने हो-हंगामे और सियासी घमासान के बावजूद यदि लोकपाल अधर में ही लटकी रहेगी तो निश्चित रुप से आने वाला समय आंदोलनों के स्वास्थ्य के लिहाज से ठीक नही होगा... अपने-अपने में सिमटते-सिकुड़ते व्यक्ति और समाज के बीच से अंकुरित ये आंदोलन किसी आश्चर्य से कम नही था... भले ही सप्ताहंत हो या फिर दिन में कुछ चंद घंटे , इंडिया गेट न सही मोहल्ले का चौराहा ही सही , अच्छी खासी तादाद में लोगों ने नितांत नीजि से उपर भी कुछ सोचा-किया, नई पीढ़ी भी अपने कुएं से बाहर ताक-झांक करती दिखी ... इसमें कोई शक नही कि `लोकतंत्र` लोकपाल का भविष्य तय करेगी, लेकिन इसमें भी कोई दो राय नही कि लोकपाल के भविष्य से इस बात को टटोला जा सकेगा कि भारतीय लोकतंत्र का असली चेहरा क्या है ? ... 

सीपीसीबी और दूसरी सक्षम एजेसिंयों को इस बात की जांच करनी चाहिए कि राज्यसभा में `शोर ` कितने डेसीबेल तक पहुंच गया था , जिसकी बुनियाद पर सभापति ने सदन अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दी। अतीत से आंकड़े इकट्ठे करने की जरुरत है कि शोर के इस स्तर पर सदन अतीत में कितनी बार स्थगित किया गया है,.... और वो भी लोकपाल जैसे अहम कानून पर । लगता है शोर हामिद अंसारी साहब के दिलो-दिमाग में ज्यादा था और उनके लगातार अटकने से लगभग साफ ही था कि सियासी कुहासे के बीच रायसीना हिल का रास्ता ढ़ूंढ़ा जा रहा था। 

(30Dec2011)

सोमवार, 25 जून 2012

अब हंसी भी नही आती

अब हंसी भी नही आती
और गुस्सा भी
हंसी और गुस्सा
दोनों चूकने लगे है
और शायद
अब इनके होने का
कुछ मतलब भी नही
कामनवेल्थ खेलों के नाम पर
मची लूट
और
लूटने की खुली छूट
और फिर 
अजब-गजब सियासत
केवल गुस्सा
अब नपुंसकता है
और कुछ भी नही
कभी कभी लगता है
डेमोक्रेसी नपुसंक बनाने की कोशिश है
एक सफल कोशिश 

(04Aug2010)

और मैं दुखी हूं...

दुख तब नही होता
जब कोई वजह होती है
आजकल हालत ऐसी है कि
दुखी होता हूं
क्योंकि कोई वजह नही होती...

कोई वजह होती
तो उनसे लड़ता
बोरियत तो मिटती
दिमाग काम कर रहा होता
लड़ने के तरीकों पर दिमाग में
विमर्श चल रहा होता

लेकिन
अभी
सन्नाटा पसरा है
दिमाग के धरातल पर
मानो सूखा पड़ा हो
और इस पर दरारें पड़ गयी हो
उग आयीं हों
और मैं दुखी हूं...

(22AUg2010)

अजीब `मौसम` है ये

अजीब `मौसम` है ये , बिखरा-बिखरा बिगड़ा-बिगड़ा सा...

मौसम किसी का भी मूड बिगाड़ने की काबिलियत खुद में समेटे है। कॉमेडी , ट्रेजेडी, रोमांस का ये दमघोंटू कॉकटेल पंजाब के मल्लूकोट, कश्मीर , अहमदाबाद, स्कॉटलैंड और स्विटजरलैंड के बीच दर्शकों को चकरघिन्नी के माफिक नचाती है।पंकज कपूर की इस चिरप्रतिक्षित फिल्म से लोगों को किसी भी मौसम और मूड में निराशा ही हाथ लगेगी, अभिनय के महारथी पंकज कपूर फिल्म निर्देशन के अखाड़े में पस्त हो गए। पंजाब और कश्मीर से शुरु हुआ फिल्म का सफर अहमदाबाद जाकर ही खत्म हुआ । शाहिद और सोनम के गंगा-जमुनी प्यार की गाड़ी जब भी रफ्तार पकड़ती , जहरीला जमाना अयोध्या , बंबई, कारगिल , 9/11 की शक्ल में प्यार के इन पंछियों को मानो साजिशन विपरीत दिशा में उड़ने को मजबूर कर देता... खैर मासूम रज्जो के अनवरत प्रेम ने भी कुछ कम नुकसान नही पहुंचाया । अन्त तक आते आते दर्शकों का दिल घबड़ाने लगा कि शाहिद-सोनम के अटूट प्यार को दिल्ली हाइकोर्ट की नजर न लग जाए... पंकज कपूर को धन्यवाद कि आशंका आशंका ही रही और शाहिद-सोनम के प्यार को दिल्ली की नजर नही लगी।हकीकत फिल्म के एक मशहूर गाने की लाइन है- कहीं ये वो तो नही , लेकिन दर्शकों के सामने दूर-दूर तक ऐसा कोई कंफ्यूजन नही। दर्शक पंकज कपूर से काफी कुछ ज्यादा की उम्मीद लगाए थे, और खासकर तब जबकि मुख्य किरदार के चोले में खुद उनके सुपुत्र हों ।

पोस्ट स्क्रिप्ट-- कुछ घोर टाइप के दर्शक गौरी, गजनबी, मुगल और सन सैंतालीस की कमी महसूस करते दिखे और सुनाई भी दिए 

(24Sep2011)

बिखराव, पलायन और छठ...

बचपन में अभिकेंद्री और अपकेंद्री बल (सेंट्रीपीटल और सेंट्रीफ्यूगल फोर्स) के बारे में पढ़ा था , शायद क्लास छह में ... केंद्र की तरफ और विपरीत दिशा में गति को पारिभाषित करते ये शब्द महज भौतिकी विषय के कुछ नियम-कायदों को ही नही व्यक्त करते, हमारी जिंदगी को भी काफी कुछ डिफाइन करते हैं... अपनी-अपनी जड़ों से दूर होती जिंदगी या फिर कठोर शब्दों में कहें तो मौजूदा जड़विहिन से समय और काल में अपकेंद्री बल को ही ज्यादा प्रभावी होते हुए देखा-पाया है... विभिन्न रुपों में अपनी जमीन और संस्कृति हमसे दूर हुई है और फासला बढ़ता ही दिखा है, महसूस किया है...बिखराव, पलायन, विस्थापन के मौजूदा समय में छठ का त्योहार अभिकेंद्री बल सरीखा है, अपनी जमीन और संस्कृति की तरफ खींचती हैं, अपनों के बीच लाती है ,अपनों से जोड़ती है... और हां प्रकृति से भी... नितांत व्यक्तिगत होते समय में जबकि संयुक्त परिवार जैसी चीजें अतीत और समाजशास्त्र की किताबों तक सिमटती दिख रही है, छठ परिवार और समाज के लिए फेविकोल या फिर क्विकफिक्स से कम नही...

(02Nov2011)

डाक-टिकट और पोस्टकार्ड

सालों बाद आज डाक-टिकटों से आमना-सामना हुआ, फिलाटेली एक्जीबिशन कवर करने गया था। लगा फिर से अपने मोहल्ले के उस पोस्ट-ऑफिस पहुंच गया हूं, जहां सालों पहले डाक-टिकट, पोस्टकार्ड, लिफाफा और अंतर्देशीय पत्र खरीदने जाता था। लाख मशक्कत की , समय को रिवाइंड मोड में डाला, स्मृति विलोप सा हो गया, याद ही नही आया कि अंतिम बार डाक-टिकट लिफाफे पर कब चिपकाया था । खैर उन दिनों सुरभि पर पूछे सवाल का जवाब हर हफ्ते भेजना अनिवार्य सा था। पहले पंद्रह पैसे का पोस्ट कार्ड खरीदा, फिर पच्चीस पैसे का और फिर मंहगे प्रतियोगिता पोस्टकार्ड । पचहत्तर पैसे का अंतर्देशीय पत्र मिलता था जो अब तो लुप्त सा ही हो गया है ।जिन लोगों को पोस्टकार्ड के खुलेपन से परहेज था, अंतर्देशीय खरीदते।लिफाफें भी अक्सर इस्तेमाल में आते, मैगी का लोगो कतर कर कंपनी के पते पर भेजते, कंपनी वालों के किसी छोटे-मोटे खिलौने के ऑफर के चक्कर में। ... और हां बैरन या बैरंग जो भी हो उसके आने पर लोगों को काफी कोफ्त होती, भेजने वाले की कंजूसी की लानत-मलामत करते दुगुना पैसा देकर उसे छुड़ाया जाता।... तकनीक संवाद के तरीके बदल रही है और ये डाक-टिकटें भी बचपन की मधुर स्मृति का हिस्सा बनकर रह गयी हैं। 

सुरभि की याद मानो बचपन को अतीत से ढ़केलकर आंखों के सामने खड़ी कर देती है... कार्यक्रम के अंत में अनाउंस किए जाने वाले टूर पैकेज और गिफ्ट हैम्पर हमेशा लुभाते रहे... आंखें अंत तक पोस्टकार्ड के ढ़ेर और कान सिदार्थ काक और रेणुका शहाणे की मधुर आवाज पर टिकी होती, इस उम्मीद से कि शायद इस बार मेरा ही नंबर आ जाए ... हालांकि खुद के लकी बनने की हसरत अधूरी ही रही... 

(06Nov2011)

सत्यकाम

सालों पहले दूरदर्शन पर एक फिल्म देखी थी-सत्यकाम , धर्मेंद्र और संजीव कुमार अभिनीत। भ्रष्टाचार से संघर्षरत सत्यप्रिय आचार्य (धर्मेंद्र) कैंसर से जूझता मर जाता है। पूरी जिंदगी करप्शन से दो-दो हाथ करने वाला शख्स अपनी आखिरी घड़ी में फर्जी बिल पर अपने हस्ताक्षर कर दम तोड़ देता है। दृश्य मार्मिक है, रुला देना वाला। ये कहना कठिन सा है कि सत्यप्रिय आचार्य कैंसर से मरा या फिर करप्शन से। कैंसर अवेयरनेस डे पर एम्स का चक्कर लगाया तो फिल्म के आखिरी क्षणों के सत्यप्रिय आचार्य का चेहरा फिर से दिमाग में घूम गया । सालों तक लेख और भाषणों में कैंसर करप्शन के मेटाफर के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा, हो सकता है कि इस मेटाफर के मूल में ऐसे ही दृश्यों को ख्याल में रखा गया हो। हालांकि समय के मुताबिक मेटाफर में भी तब्दीली आई और अब करप्शन एड्स सरीखा भी बताया जाने लगा है। दो चीजें हाल में देखने को मिली है, जहां कैंसर इन दिनों पड़ोस और परिवार के बीच बड़ी उपस्थिती दर्ज कराती दिखी है, वहीं करप्शन का मुद्दा भी बरास्ते जनपथ राजपथ पर हलचल मचाए हुए है। उम्मीद करनी चाहिए कि करप्शन और कैंसर दोनों को ही इनके खिलाफ चल रही लड़ाई में मात मिलेगी, ठीक उसी तरह जैसा कि सत्यप्रिय आचार्य के फर्जी दस्तावेज पर हस्ताक्षर और फिर मौत के बाद उसकी पत्नी अपने हाथों ही उस दस्तावेज को टुकड़े टुकड़े कर देती है। 

(7Nov2011)

मास और क्लास

कहते हैं दुनिया दो हिस्सों में बंटी है- मास और क्लास, कल्चर और टेस्ट के मामले में। जब अपने कस्बे में था तो वहां के चारों थिएटरों में मिथुन की या फिर जलती और चढ़ती जवानी टाइप फिल्में लगी रहती थी , दिल्ली आया तो पता लगा कि ये तो बी और सी-ग्रेड सिनेमा है। हालांकि श्याम बेनेगल, गोविंद निहलाणी के नाम से परिचय पहले भी था, लेकिन कुमार साहनी जब राजनीति और फिल्मों के घालमेल पर पढ़ाने आए तो न्यू वेव सिनेमा के नाम से भी परिचित हुआ। पता चला ये क्लास टाइप मामला है। उन्होंने एक अपुष्ट कहानी सुनायी कि कैसे मनमोहन देसाई ने उनकी फिल्म कुछ देर देखने या कहें झेलने के बाद टीवी के स्क्रीन पर अपना गुस्सा उतारा। तमाम लोगों से सुनने को मिला कि सलमान ज्यादा मास के और आमिर ज्यादा क्लास के करीब है। फिर कॉमर्शियल, ऑफबीट और आर्ट सिनेमा की शब्दावली से देर-सवेर परिचित होता रहा। क्लास और मास की छवि मेरे मन-मानस पर बहुत इन्हीं के जरिए अंकित हुई। वैसे राजनीति विज्ञान में सत्ता को मद्देनजर रखते हुए एक ऐसा ही वर्गीकरण है - इलीट और सब-अल्टर्न , बुर्जुआ और सर्वहारा। हालांकि मोटा-मोटी माना जा सकता है कि मास और क्लास के ये खांचें तथा इलीट और सब-अल्टर्न वाले खांचे काफी कुछ एक दूसरे को ओवरलैप करते हैं। रॉकस्टार फिल्म देखी तो दिलो-दिमाग पर एक कंफ्यूजन तारी हो गया। लगा फिल्म न मास के लिए हो सकी , न क्लास के लिए, हालांकि मास और क्लास दोनों के लिए टुकड़ो- टुकड़ों में काफी कुछ था। अच्छी लगी या अच्छी नही लगी के बीच मन झूलने लगा, मन में अजीब सी खिचड़ी पकने लगी, ठीक वैसी ही जैसी खिचड़ी इम्तियाज अली ने भूत, वर्तमान, भविष्य को मिलाकर पकायी है। कब कौन सा काल, समय उपस्थित हो जाए, अंदाज लगाना नामुमकिन हो जाता है। मास के क्लास में शामिल होने की जिद हो या क्लास के अपने दायरे से बाहर गंध फैलाने की दबी हुई कामना ..., जनार्दन के जिम हैरिसन बनने की हसरत और हीर के जलती जवानी देखने की ख्वाहिश मास और क्लास के खांचों के इंसानी बुनावट होने का एलान सा करती हुई दिखती है । मास और क्लास ने न जाने क्यों जेहन को जकड़ सा लिया, शायद इसलिए कि जमुनापार में फिल्म देख रहा था और जमुनापार की हंसी उड़ी थी फिल्म के एक दृश्य में। वैसे लगता है इम्तियाज अली अभी भी अपने कॉलेज के जमाने से निकल नही पाए हैं। न तो जमुना पहले जैसी रही और न जमुनापार। रॉकस्टार से जुड़ी कई रिपोर्ट और पोस्ट पढ़कर गया था, बहुत सारी उम्मीदें लिए। फिल्म उन बढ़ी हुई उम्मीदों पर खरा नही उतर पायी। हालांकि रणबीर जब भी जॉर्डन के चोले में दाखिल होते हैं, उनके दिलो-दिमाग के भीतर का शोर अपना सा ही लगने लगता है। अस्त-व्यस्त और बेतरतीब से रणबीर जब मंच पर गिटार बजाते हैं तो मानो दृश्य में जान फूंक देते हैं। ऐसे में माकूल गीत और संगीत दोनों ही खासा असर छोड़ती है ।
पोस्ट-स्क्रिप्ट— शादी से पहले हीर जब अपने गंध फैलाने के मिशन पर निकलती है तो सु-सु करते हुए लोगों को परेशान करने के साथ टिंग लिंग लिंग लिंग बजना शुरु हो जाता है और फिर कतिया करूं , कतिया करुं। मेरी भाषा उतनी समृद्ध नही है , लेकिन टिंग लिंग लिंग और सु-सु करते लोगों को तंग करने की फिट बैठती टाइमिंग से आखिर क्या अर्थ और भाव निकाला जाए ??? 

(13Nov2011)

उत्तरप्रदेश के चार राज्य

बचपन से ही सामान्य ज्ञान की किताबों को घोंटने में लगा रहा। कुछ पल्ले पड़ा और कुछ ने हमेशा ही अपना दामन हमसे झटक लिया। आविष्कार-आविष्कारक, स्मारक-निर्माता की लंबी सूची तोतारटंत संस्कृति के पदचिह्नों पर कंठस्थ करने में कोई कोर-कसर बाकी नही रखी और किसी भी दूसरे कस्बाई छात्र की तरह परंपरा का बखूबी निर्वहन करता रहा... लेकिन इन आविष्कारों ,निर्माणों के पीछे की कथा-कहानी का पाठ न के बराबर ही रहा,किया। कहने में कोई गुरेज नही कि अध्ययन सतही था और सतह को कुरेद कर- खुंरच कर न देखने की पूर्ववर्ती छात्रों-विद्यार्थियों की परंपरा को मासूमियत और पवित्रता से निबाहा। सफलता और सफल लोगों की लंबी सूची को रटने में कोई कोर-कसर बाकी नही रखी , आखिर हमें भी सफल जो होना था। खैर पर्दे के पीछे और सतह के नीचे की कथा-कहानियां समय के प्रवाह में अक्सर पीछे छूट जाती है, और सफल लोगों के सुभीते के लिहाज से मुड़ती-तुड़ती , बनती-बिगड़ती रहती है। सफलता के श्रीचरणों में सच्चाई यानि कहानी अपने संपूर्ण रुप में हमेशा ही ऑक्सीजन की कमी से जूझती रही है ,और इक्का-दुक्का ही समय,परंपरा,संघर्ष,परिस्थिति और इतिहास के दुर्गम-दुर्दांत पथ-परिस्थिति में ठठ पाती हैं। उत्तरप्रदेश के गरमाते राजनीतिक माहौल में मायावती के चार राज्यों के निर्माण के फैसले ने सालों से दिमाग में चल रही इस कशमकश को फिर से पृष्ठभूमि से सतह पर लाने का काम किया कि निर्माण, सफलता, नायकों-खलनायकों की पूरी कहानी आखिर इतिहास की किताबों में दर्ज क्यों नही हो पाती, आखिर इतिहास की किताबें ग्रहण का शिकार क्यूं हो जाती है। ये सोचने वाली बात है कि भविष्य में जब ये राज्य अस्तित्व में आएंगें तो कितने लोगों की याद्दाशत में सत्ता का स्वार्थ और वर्तमान परिस्थितियां याद आ पाएंगी। बात केवल मायावती और इन राज्यों के निर्माण की नही है, सफलता-असफलता के हर गली-मोहल्ले में कहानियों के कब्र मिलेंगें, उन कहानियों के जिनकी बलि इतिहास ने सफलता की ठकुरसुहाती में ले ली। समय के साथ स्मृति से ओझल हो चुकी इन कहानियों की कब्रगाहों पर डली मिट्टी न केवल हटाने की जरुरत हैं, बल्कि नायकों-खलनायकों, सफल-असफल लोगों के लिटमस टेस्ट किए जाने की जरुरत भी है। देवी-देवताओं, सुर-असुरों, परंपराओं-मान्यताओं को तर्क की कसौटी पर कसे जाने की जरुरत है, पुनर्पाठ पुनर्मूल्कांयन की जरुरत है। तकनीक और तर्क के इस युग में राम-रावण से लेकर वर्तमान जमाने के नायकों-खलनायकों को फिर से पढ़ा जाना चाहिए, और हां आंख मूंदकर श्रीगान से बचना चाहिए, परहेज करना चाहिए।.... 

(19Nov2011)

सजीले कुत्तों का निराला मामला

अगर सजीले कुत्तों को किसी शैक्षणिक संस्थान के स्टेटस में चार चांद लगाने की जिम्मेदारी दे दी जाए तो फिर कैसा लगेगा ???... हतप्रभ और हंसी दोनों से ही जूझने की नौबत आ जाएगी। इंटरनैशनल मूट कोर्ट कंपीटिशन के चक्कर में अमिटी के नोएडा कैंपस गया तो अमिटी के कई सुरक्षा-गार्डों को सजीले-भड़कीले कुत्तों के साथ चहलकदमी करते या फिर बिल्डिंगों के बाहर बुत बना पाया। जिज्ञासा हुई तो चलते-चलते एक गार्ड से पूछ-ताछ कर ही डाली, गार्ड का गर्वीला अंदाज नोटिस किए जाने लायक था। पता चला नोएडा कैंपस में ऐसे सजीले कुत्ते दस की संख्या में है औऱ मनेसर कैंपस में इससे पांच गुना यानि पचास। गार्ड ने अपनी खाकी वर्दी का जिक्र भी खास तौर पर किया , साथ ही ये बताने से भी नही चूका कि मालिक को खाकी वर्दी के लिए प्रशासन से कितनी लंबी जंग लड़नी पड़ी। इन सजीले कुत्तों ने एकबारगी ये सोचने को मजबूर कर दिया कि एक शैक्षणिक संस्थान आखिर किन वजहों से पहचाना जाता है, आखिर उसकी धाक की वजह क्या होती है... कई पत्र-पत्रिकाओं के सर्वे पर सालों से नजर डाल रहा हूं... रिसर्च, फैकल्टी, परीक्षा पद्धति, आधारभूत ढ़ांचा तमाम कारक गिनाए जाते है, औसत अंक निकाले जाते है और फिर इन मानकों के आधार पर सूची तैयार होती है। वैसे अक्सर संस्थान अपने मन-माफिक सर्वे भी निकालते हैं, या फिर किसी सर्वे को तोड़-मरोड़ कर सूची में अपने अव्वल होने का स्वांग भी भरते है। खासकर एक संस्थान तो अक्सर पत्र-पत्रिकाओं में चमकीले पन्नों और होर्डिगों में विदेश यात्रा और शीशमहलनुमा संस्थान की इमारत के जरिए विद्यार्थियों को लुभाने के लिए मशहूर है... और भी संस्थान है इसके नक्शेकदम पर और ये कोई अकेला नही। ... इस `समथिंग डिफरेंट` के चक्कर ने सालों पहले की याद ताजा करा दी। उस समय हमारे यहां बच्चे यहां तो जमीन पर चटाई बिछाकर गुरु-ज्ञान लेते थे या फिर आड़ी-तिरछी बेंचनुमा सी आकृति पर बैठकर। चटाई-स्कूल के बच्चों के लिए `हिन्दी माध्यम से कॉन्वेंट एजुकेटेड करने वाले टूटपुजिंया स्कूल` के बच्चों की एलास्टिक वाली टाई और टीन की बैच ईर्ष्या की वजह होती थी। फिर हमारे यहां एक जीप वाला स्कूल अस्तित्व में आया और ईर्ष्या की वजह बना। बच्चों से लदालद-लबालब भरी खटारा जीप जब अपनी ही जैसी सड़क पर धूल-धक्कड़ उड़ाती निकलती तो लोगों को गुलाबजल के फुहारों सा अहसास होता। चटाई-स्कूल सहित दूसरे स्कूलों के बच्चे जीप-दर्शन और फिर धूल-धक्कड़ का आनंद लेने से खुद को रोक नही पाते। फिर तो बड़ी बस, कंप्यूटर और केरल से खासतौर पर अंग्रेजी पढ़ाने के लिए आयातित शिक्षक इस कड़ी में जुड़ते गए।... लेकिन इन सजीले कुत्तों का मामला निराला है, इसमें कोई संदेह नही। 

(19Nov2011)

लोकतांत्रिक थप्पड़

थप्पड़ पर बहस जारी है। लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विपरीत होने से लेकर इसे कायरों की कुंठा तक करार देने वालों की कमी नही, भाजपा से लेकर अन्ना के आदमी होने तक के आरोप लगे हैं हरविंदर पर। लेकिन इन तमाम बहसों के बीच आम आदमी को उस थप्पड़ के पीछे का क्रोध परिचित सा लग रहा है, अपना सा लग रहा है। थप्पड़ से असहमति रखने वाले भी इसके पीछे के गुस्से को खारिज नही कर सकते। और फिर अपेक्षा केवल आम आदमी से ही क्यूं रखी जाए, शीर्ष पर बैठे और सॉफिस्टिकेटेड तबके ने कब लोकतंत्र की मर्यादा का प्राणपण से पालन किया है। वैसे भी लोकंतत्र हमेशा शासकों के सुभीते के लिहाज से डिफाइन होती रही है। कमाल की बात ही है कि देश का शासन परिवार के कब्जे में है और उसी परिवार का होनहार लोकतंत्र का पाठ पढ़ा रहा है। विकल्प में ऐसे नेता की चर्चा है जिन्हें कभी उनकी पार्टी के ही शीर्षपुरुष राजधर्म निभाने की अपील कर चके हैं। स्थिति जब विकल्पहीनता की हो ... और फिर उसकी जड़ता तोड़ती विरोध की आवाज भी डिसक्रेडिट किए जाने की साजिश और तमाम सवालिया निशानों के बीच झूल रही हो तो आम आदमी कंफ्यूज्ड होगा ही । ऐसे में आम आदमी से लोकतंत्र के शास्त्रीय मर्यादाओं-मानदंडों के पालन की उम्मीद बेमानी ही है।... वैसे भी लोकतंत्र के चार पायों ने कौन सा आदर्श पेश किया है उसके सामने ? 

ये आम आदमी का थप्पड़ है, आखिर वो करे तो क्या करे...

(24Nov2011)